Sunday, November 30, 2025

अध्याय ३.१६, श्लोक ३६–५०

योगवशिष्ट ३.१६.३६–५०
(एकाग्र भक्ति और पवित्रता की शक्ति)

श्रीसरस्वत्युवाच ।
निरन्तरेण तपसा भर्तृभक्त्यतिशालिना।
परितुष्टास्मि ते वत्से गृहाण वरमीप्सितम् ॥ ३६ ॥

श्रीराज्ञ्युवाच ।
जय जन्मजराज्वालादाहदोषशशिप्रभे।
जय हार्दान्धकारौघनिवारणरविप्रभे ॥ ३७ ॥
अम्ब मातर्जगन्मातस्त्रायस्व कृपणामिमाम् ।
इदं वरद्वयं देहि यदहं प्रार्थये शुभे ॥ ३८॥
एकं तावद्विदेहस्य भर्तुर्जीवो ममाम्बिके।
अस्मादेव हि मा यासीन्निजान्तःपुरमण्डपात् ॥ ३९ ॥
द्वितीयं त्वां महादेवि प्रार्थयेऽहं यदा यदा ।
दर्शनाय वरार्थाय तदा मे देहि दर्शनम् ॥ ४० ॥
इत्याकर्ण्य जगन्माता तवास्त्वेवमिति स्वयम् ।
उक्त्वान्तर्धानमगमत्प्रोत्थायोर्मिरिवार्णवे ॥ ४१ ॥
अथ सा राजमहिषी परितुष्टेष्टदेवता ।
श्रुतगीतेव हरिणी बभूवानन्दधारिणी ॥ ४२ ॥
पक्षमासर्तुकटके दिनारे वर्षदण्डके ।
क्षणनाभौ स्पन्दमये कालचक्रे वहत्यथ ॥ ४३ ॥
अन्तर्धिमाजगामास्याः पत्युस्तच्चेतनं तनौ ।
संदृश्यमानमेवाशु शुष्कपत्ररसो यथा ॥ ४४ ॥
रणखण्डितदेहेऽस्मिन्मृतेऽन्तःपुरमण्डपे ।
निर्जला नलिनीवासौ परां म्लानिमुपाययौ ॥ ४५ ॥
विषोष्णश्वसनध्वस्तसकलाधरपल्लवा ।
प्राप सा मरणावस्थां सशल्येव मृगी यथा ॥ ४६ ॥
प्राप सा तमसान्धत्वं तस्मिन्मरणमागते ।
दीपज्वालालवे क्षीणे सद्मश्रीरिव भूषिता ॥ ४७ ॥
कार्श्यमाप क्षणेनासौ बाला विरसतां गता ।
यथा स्रोतस्विनी स्रोतक्षये क्षारविधूसरा ॥ ४८ ॥
क्षिप्रमाक्रन्दिनी क्षिप्रं मौनमूका वियोगिनी ।
बभूव चक्रवाकीव मानिनी मरणोन्मुखी ॥ ४९ ॥
अथ तामतिमात्रविह्वलां सकृपाकाशभवा सरस्वती ।
शफरीं ह्रदशोषविह्वलां प्रथमा वृष्टिरिवान्वकम्पत ॥ ५० ॥


३.१६.३६:
श्री सरस्वती जी बोलीं −  
बेटी, तेरे निरंतर तप और पति के प्रति अटल भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जो वर चाहे माँग ले।

३.१६.३७–३८:
रानी चुडाला बोली −  
जय हो उस चंद्रमा जैसी देवी की जिसकी ठंडी किरणें जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु की जलन मिटाती हैं! जय हो उस सूर्य जैसी देवी की जिसकी तेज किरणें हृदय के घने अंधकार को दूर करती हैं! हे माँ, हे जगन्माता, इस दीन को बचाओ। हे कल्याणमयी, मैं जो दो वर माँगती हूँ, वे मुझे दे दो।

३.१६.३९:
पहला वर यह कि, हे अम्बिका, मेरे पति विदेह राजा का प्राण जब तक मैं जीवित हूँ, इस अन्तःपुर से कभी बाहर न जाए।

३.१६.४०: 
दूसरा वर यह, हे महादेवी, जब-जब मैं किसी बड़े वर के लिए आपको पुकारूँ, तब-तब आप मेरे सामने प्रकट हो जाना।

३.१६.४१–४२:
यह सुनकर जगन्माता ने स्वयं कहा, “तथास्तु” और समुद्र में उठी लहर की तरह फिर समा गईं। तब अपनी इष्ट देवता से पूर्ण संतुष्ट हुई रानी  
कृष्ण की बंसी सुनकर हर्षित हरिणी की तरह आनंद से भर गई।

३.१६.४३–४५:
इस प्रकार दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष चलायमान काल-चक्र पर बीतते चले गए। अचानक पति के शरीर से चेतना गायब हो गई, जैसे सूखे पत्ते से रस तुरंत चला जाता है। युद्ध में कटा हुआ मृत शरीर अन्तःपुर में पड़ा था, वह जलहीन कमल तालाब की तरह अत्यंत म्लान हो गई।

३.१६.४६: 
गर्म साँसों से होंठों की कोमलता नष्ट हो गई, वह तीर लगी हिरणी की तरह मृत्यु के द्वार पर पहुँच गई।

३.१६.४७–४९:
पति की मृत्यु होते ही वह घोर अंधकार में डूब गई, जैसे बुझते दीपक की अंतिम की रोशनी के साथ महल की सारी शोभा चली जाए। क्षण भर में वह जवान रानी दुबली और निर्जीव हो गई, जैसे जल-प्रवाह रुकने पर नदी खारी और धूसर हो जाती है।वियोगिनी पहले ज़ोर-ज़ोर से रोई, फिर अचानक मौन और गूँगी हो गई, वह मानिनी चक्रवाकी पक्षिणी की तरह मृत्यु की ओर बढ़ने लगी।

३.१६.५०: 
तब अत्यंत व्याकुल चुडाला को देखकर करुणा के आकाश में रहने वाली सरस्वती जी को बड़ी दया आई और जैसे सूखे तालाब में छटपथाती मछली पर पहली बारिश दया करती है, वैसे ही वे काँप उठीं।

उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक बताते हैं कि एकाग्र भक्ति और पवित्रता की कितनी बड़ी शक्ति है। रानी चुडाला ने वर्षों तक निरंतर तप और पति के प्रति पूर्ण समर्पण किया, जिससे स्वयं सरस्वती जी प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और कोई भी वर माँगने को कहा। इससे सिद्ध होता है कि सच्ची भक्ति और तप से सबसे ऊँची दिव्य शक्तियाँ भी प्रसन्न हो जाती हैं।

दूसरा उपदेश यह है कि सच्ची पतिव्रता स्त्री क्या माँगती है। चुडाला ने न धन माँगा, न अपनी लंबी आयु, न सौंदर्य। उसने केवल दो बातें माँगी − पति का प्राण उसके जीते जी कभी न जाए और जब भी पुकारे देवी तुरंत आएँ। यह पतिव्रता धर्म का सर्वोच्च आदर्श है जिसमें पति का जीवन ही अपना जीवन समझा जाता है।

तीसरा उपदेश है − समय और मृत्यु का नियम कोई रोक नहीं सकता। वर मिलने के बाद भी वर्ष बीते और युद्ध में राजा का शरीर नष्ट हुआ, प्राण चले गए। काल-चक्र के सामने कोई वर स्थायी नहीं। संसार की हर रचना नश्वर है।

चौथा उपदेश है − आसक्ति भले ही पवित्र वैवाहिक प्रेम ही क्यों न हो, वियोग में भयंकर दुख देती है। पति की मृत्यु होते ही चुडाला का सौंदर्य, हँसी, जीवन-शक्ति सब नष्ट हो गया। उसे सूखे तालाब, निर्जल नदी, तीर लगी हिरणी और वियुक्त चक्रवाकी से तुलना की गई है। इससे समझ आता है कि गहरी आसक्ति अंत में महादुख का कारण बनती है।

पाँचवाँ और अंतिम उपदेश है − दैवी माँ की करुणा असीम है। मृत्यु को स्थायी रूप से भले न रोका जा सके, पर चुडाला के अत्यंत दुख देखकर सरस्वती जी का हृदय पिघल गया और वे फिर मदद को तत्पर हुईं। जैसे पहली वर्षा सूखे तालाब की मछलियों पर दया करती है, वैसे ही सच्चे हृदय की पुकार पर ईश्वरीय कृपा अवश्य आती है, चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न हो।

Saturday, November 29, 2025

अध्याय ३.१६, श्लोक २४–३५

योगवशिष्ट ३.१६.२४–३५
(सच्ची साधना दिखावे की नहीं, प्रेम और सत्य की होती)

विप्रा उवाच: ।
तपोजपयमैर्देवि समस्ताः सिद्धसिद्धयः।
संप्राप्यन्तेऽमरत्वं तु न कदाचन लभ्यते ॥ २४ ॥
इत्याकर्ण्य द्विजमुखाच्चिन्तयामास सा पुनः ।
इदं स्वप्रज्ञयैवाशु भीता प्रियवियोगतः ॥ २५ ॥
मरणं भर्तुरग्रे मे यदि दैवाद्भविष्यति ।
तत्सर्वदुःखनिर्मुक्ता संस्थास्ये सुखमात्मनि ॥ २६ ॥
अथ वर्षसहस्रेण भर्तादौ चेन्मरिष्यति ।
तत्करिष्ये तथा येन जीवो गेहान्न यास्यति ॥ २७ ॥
तद्भ्रमद्भर्तृजीवेऽस्मिन्निजे शुद्धान्तमण्डपे ।
भर्त्रा विलोकिता नित्यं निवत्स्यामि यथासुखम् ॥ २८ ॥
अद्यैवारभ्यैतदर्थ देवीं ज्ञप्तिं सरस्वतीम्।
जपोपवासनियमैरातोषं पूजयाम्यहम् ॥ २९ ॥
इति निश्चित्य सा नाथमनुक्त्वैव वराङ्गना ।
यथाशास्त्रं चचारोग्रं तथा नियममास्थिता ॥ ३० ॥
त्रिरात्रस्य त्रिरात्रस्य पर्यन्ते कृतपारणा।
देवद्विजगुरुप्राज्ञविद्वत्पूजापरायणा ॥ ३१ ॥
स्नानदानतपोध्याननित्योद्युक्तशरीरिका ।
सर्वास्तिक्यसदाचारकारिणी क्लेशहारिणी ॥ ३२ ॥
यथाकालं यथोद्योगं यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
तोषयामास भर्तारमपरिज्ञातसंस्थितिः ॥ ३३ ॥
त्रिरात्रशतमेवं सा बाला नियमशालिनी।
अनारतं तपोनिष्ठामतिष्ठत्कष्टचेष्टया ॥ ३४ ॥
त्रिरात्राणां शते चाथ पूजिता प्रतिमानिता ।
तुष्टा भगवती गौरी वागीशा समुवाच ताम् ॥ ३५ ॥

३.१६.२४  
विप्रों ने कहा— हे देवि, तप, जप और यम-नियमों से सारी सिद्धियाँ मिल जाती हैं, पर अमरत्व कभी किसी को नहीं मिलता।

३.१६.२५–२९  
ब्राह्मणों के मुँह से यह सुनकर वह पुनः अपने मन में सोचने लगी, प्रिय के वियोग से डरकर स्वयं ही अपनी बुद्धि से शीघ्र विचार करने लगी ।यदि दैव से मेरे पति मेरे पहले मरेंगे तो मैं सारे दुःखों से मुक्त हो अपने आत्मा में सुख से रहूँगी। पर यदि हजार वर्ष बाद भी पति पहले मरेंगे तो मैं ऐसा करूँगी कि उनके प्राण इस घर से कभी बाहर न जाएँ। जब तक मेरे पति के प्राण इस शरीर में घूमते रहेंगे, मेरे इस शुद्ध अंतःकरण रूपी मंडप में वे मुझे नित्य देखते रहेंगे, मैं सुख से रहूँगी। आज से ही इस उद्देश्य से मैं ज्ञान-देवी सरस्वती को जप, उपवास और नियमों से पूजकर प्रसन्न करूँगी।

३.१६.३०–३३  
ऐसा निश्चय करके वह सुंदरी पति को बिना बताए शास्त्र के अनुसार अत्यंत कठोर नियम करने लगी। हर तीन रात में एक पारणा (उपवास-भोज) करके वह देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वानों की पूजा में तत्पर रहती थी। स्नान, दान, तप, ध्यान में सदा लगी रहती, सारी सदाचार करती और सब क्लेश दूर करती हुई। समय पर, पूरे उद्योग से, शास्त्र के अनुसार क्रम से पति को प्रसन्न करती रही, कोई जाने न पाया कि वह क्या कर रही है। इस प्रकार वह बालिका नियमों में लगी हुई तीन सौ रातों तक कष्टपूर्ण चेष्टा से निरंतर तप में लगी रही।

३.१६.३५  
तीन सौ रात पूरे होने पर भगवती गौरी (वागीश्वरी) पूजित और तृप्त होकर प्रसन्न हुईं और उससे बोलीं।

उपदेशों का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक योगवशिष्ठ के उस महान शिक्षण को दिखाते हैं कि शुद्ध एवं दृढ़ संकल्प वाली बुद्धि कितनी बड़ी शक्ति रखती है, खासकर जब वह निःस्वार्थ प्रेम से प्रेरित हो। चूड़ाला को पता चलता है कि बड़े-से-बड़ा तप-जप भी शरीर को अमर नहीं बना सकता। वह हताश नहीं होती, बल्कि तुरंत सोचती है—यदि पति पहले मरें तो मैं मुक्त हो जाऊँगी, पर यदि मैं पहले बची तो ऐसा उपाय करूँगी कि मृत्यु उन्हें छू भी न सके।

साधन से सिद्धियाँ मिलती हैं, पर अमरत्व केवल आत्मा का स्वभाव है। चूड़ाला व्यर्थ प्रार्थना नहीं करतीं; वे सरस्वती (ज्ञान-शक्ति) को जगाने का संकल्प करती हैं ताकि पति-पत्नी दोनों चैतन्य स्वरूप में स्थित होकर मृत्यु से परे हो जाएँ। यह बताता है कि सच्चा अमरत्व ज्ञान से ही मिलता है, तप से नहीं।

उनका तप अत्यंत कठिन था—हर तीन दिन में पूर्ण उपवास, फिर भी गुप्त रूप से, बिना किसी को बताए। पति की सेवा में भी कोई कमी नहीं आई। यह शिक्षा देता है कि सच्ची साधना दिखावे की नहीं, प्रेम और सत्य की होती है तथा बाहर की मधुरता और भीतर की अग्नि साथ-साथ चल सकती है।

केवल तीन सौ रात (लगभग तीन वर्ष से कम) में भगवती गौरी प्रसन्न होकर प्रकट हो गईं। इससे स्पष्ट है कि जब मन एकाग्र, निर्मल और निःस्वार्थ होता है तब दिव्य कृपा शीघ्र आती है। समय से ज्यादा भाव और तीव्रता मायने रखती है।

सबसे गहरा संदेश यह है कि मुक्ति का सबसे उत्तम प्रेरक शुद्ध प्रेम हो सकता है। चूड़ाला अपने लिए नहीं, अपने प्रियतम को अमर करना चाहती हैं। यही निःस्वार्थ प्रेम उनकी साधना को परम सिद्धि का साधन बना देता है। शुद्ध प्रेम ही ज्ञान और अमरत्व का सबसे छोटा और निश्चित मार्ग है।

Friday, November 28, 2025

अध्याय ३.१६, श्लोक १–२३

योगवशिष्ट ३.१६.१–२३
(संसार का सबसे उत्तम सुख भी अंत में मृत्यु-भय के कारण अपूर्ण रह जाता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भूतलाप्सरसा सार्धमनन्यदयितापतिः ।
अकृत्रिमप्रेमरसं स रेमे कान्तया तया ॥ १ ॥
उद्यानवनगुल्मेषु तमालगहनेषु च ।
पुष्पमण्डपरम्येषु लतावलयसद्मसु ॥ २ ॥
पुष्पान्तःपुरशय्यासु पुष्पसंभारवीथिषु ।
वसन्तोद्यानदोलासु क्रीडापुष्करिणीषु च ॥ ३ ॥
चन्दनद्रुमशैलेषु संतानकतलेषु च ।
कदम्बनीपगेहेषु पारिभद्रोदरेषु च ॥ ४॥
विकसत्कुन्दमन्दारमकरन्दसुगन्धिषु ।
वसन्तवनजालेषु कूजत्कोकिलपक्षिषु ॥ ५ ॥
नानारण्यतृणानां च स्थलेषु मृदुदीप्तिषु।
निर्झरेषु तरत्तारसीकरासारवर्षिषु ॥ ६॥
शैलानां मणिमाणिक्यशिलानां फलकेषु च ।
देवर्षिमुनिगेहेषु दूरपुण्याश्रमेषु च ॥ ७॥
कुमुद्वतीषु फुल्लासु स्मेरासु नलिनीषु च ।
वनस्थलीषु कृष्णासु फुल्लासु फलिनीषु च ॥ ८ ॥
सुरतैः सुरतारुण्यैः सुन्दरः सुन्दरेहितैः ।
ईहितैः पेशलान्योन्यघनप्रेमरसाधिकैः ॥ ९॥
प्रहेलिकाभिराख्यानैस्तथा चाक्षरमुष्टिभिः ।
अष्टापदैर्बहुद्यूतैस्तथा गूढचतुर्थकैः ॥ १० ॥
नाटिकाख्यायिकाभिश्च श्लोकैर्विन्दुमतिक्रमैः ।
देशकालविभागैश्च नगरग्रामचेष्टितैः ॥ ११ ॥
स्रग्दाममालावलितैर्नानाभरणयोजनैः ।
लीलाविलोलचलनैर्विचित्ररसभोजनैः ॥ १२ ॥
आर्द्रकुङ्कुमकर्पूरताम्बूलीदलचर्वणैः ।
फुल्लपुष्पलतागुञ्जादेहगोपनखव्रणैः ॥ १३ ॥
समालम्भनलीलाभिर्मालाप्रहरणक्रमैः ।
गृहे कुसुमदोलाभिरन्योन्यं दोलनक्रमैः ॥ १४ ॥
नौयानयुग्महस्त्यश्वदान्तोष्ट्रादिगमागमैः ।
जलकेलिविलासेन परस्परसमुक्षणैः ॥ १५ ॥
नृत्यगीतकलालास्यतालताण्डवमण्डनैः ।
संगीतकैः संकथनैर्वीणामुरजवादनैः ॥ १६ ॥
उद्यानेषु सरित्तीरवृक्षेषु वरवीथिषु ।
अन्तःपुरेषु हर्म्येषु फुल्लदोलावदोलनैः ॥ १७ ॥
सा तथा सुखसंवृद्धा तस्य प्रणयिनी प्रिया ।
एकदा चिन्तयामास सुभ्रूः संकल्पशालिनी ॥ १८ ॥
प्राणेभ्योऽपि प्रियो भर्ता ममैष जगतीपतिः ।
यौवनोल्लासवान्श्रीमान्कथं स्यादजरामरः ॥ १९ ॥
भर्त्रानेन सहोत्तुङ्गस्तनी कुसुमसद्मसु।
कथं स्वैरं चिरं कान्ता रमे युगशतान्यहम् ॥ २० ॥
तथा यते यत्नमतस्तपोजपयमेहितैः।
रजनीशमुखो राजा यथा स्यादजरामरः ॥ २१ ॥
ज्ञानवृद्धांस्तपोवृद्धान्विद्यावृद्धानहं द्विजान् ।
पृच्छामि तावन्मरणं कथं न स्यान्नृणामिति ॥ २२ ॥
इत्यानीयाथ संपूज्य द्विजान्पप्रच्छ सा नता ।
अमरत्वं कथं विप्रा भवेदिति पुनःपुनः ॥ २३ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१६.१: भूतल की अप्सरा (लीला) के साथ राजा पद्म एकमात्र प्रियतम पति बनकर सच्चे एवं नैसर्गिक प्रेम-रस का आनंद ले रहे थे।  

३.१६.२–८: वे दोनों उद्यानों, घने तमाल वनों, फूलों की गद्दियों पर, फूलों की ढेरी से बनी गलियों में, वसंत की डोलाओं पर तथा क्रीड़ा-सरोवरों में; चंदन के पर्वतों पर, फैले हुए केले के वृक्षों के नीचे, कदम्ब-नीप के कुटीरों में, परिभद्र वृक्षों के खोखल में; खिले कुंद-मंदार के मकरंद की सुगंध से भरे वसंत-वन-समूहों में, जहाँ कोकिल मधुर बोल रही थीं; अनेक वनों के कोमल चमकते घास के मैदानों पर, मोतियों जैसे फुहार बरसाते झरनों के पास; पर्वतों की माणिक्य-मणि की चट्टानों पर, देवर्षि-मुनियों के दूरस्थ पुण्य आश्रमों में; खिली हुई कुमुदवती नदियों में, मुस्कुराती हुई नील कमल सरोवरों में, फल-फूलों से भरी गहरी काली वन-स्थलियों में।  

३.१६.९–१७: सुंदर युवा काम-क्रीड़ा से, एक-दूसरे के प्रति कोमल घने प्रेम-रस से वे सुंदर जोड़ा विहार करता रहा। वे पहेलियाँ बुझाते, कहानियाँ सुनाते, पासा, अष्टापद, अनेक जुआ तथा गुप्त चतुर्थक खेल खेलते; नाटिकाएँ करते, आख्यायिकाएँ सुनाते, सुंदर श्लोक और चुटकीले वचन बोलते, देश-काल की बातें, नगर-ग्राम की चेष्टाएँ करते; फूलों की मालाएँ एवं नाना आभूषण पहनते, लीलापूर्ण चंचल चाल चलते, विचित्र रसों के भोजन करते; गीले कुंकुम-कपूर-तांबूल चबाते, फूलों की लताओं और गुच्छों से शरीर के नाखून के घाव छिपाते; एक-दूसरे को चंचलता से गले लगाते, मालाएँ फेंकते, महल में पुष्प-डोलाओं पर साथ-साथ डोलते; जोड़ी नावों, हाथी, घोड़ों, सधे ऊँटों आदि से आना-जाना करते, जल-क्रीड़ा करते, एक-दूसरे पर छींटे मारते; नाचते-गाते, मधुर लास्य-तांडव करते, संगीत करते, मीठी-मीठी बातें करते, वीणा-मृदंग बजाते; उद्यानों में, नदी-तीरों पर, सुंदर वृक्षों के नीचे, उत्तम गलियों में, अंतःपुरों में, महलों की छतों पर फूलों की डोलाओं में डोलते हुए।  

३.१६.१८–२२: इस प्रकार सुख से परिपूर्ण उस प्रणयिनी प्रिया ने एक दिन भौंहें सिकोड़कर, संकल्प से भरी हुई सोचा — “मेरे प्राणों से भी प्यारा यह जगत् का स्वामी मेरा पति है। युवावस्था से उल्लसित, श्रीमान् यह कैसे अजर-अमर हो सकता है? उन्नत स्तनों वाली मैं इस पति के साथ फूलों के महलों में सैकड़ों युग तक कैसे स्वच्छंद विहार करूँ? इसलिए मैं तप, जप और यम से पूरा प्रयत्न करूँगी जिससे चंद्रमुख यह राजा अजर-अमर हो जाए। ज्ञान, तप और विद्या में वृद्ध ब्राह्मणों से पूछूँगी कि मनुष्यों की मृत्यु कैसे न हो।”  

३.१६.२३: ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणों को बुलवाया, पूजा की और नतमस्तक होकर बार-बार पूछा — “विप्रो! अमरत्व कैसे प्राप्त हो?”

उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक दिखाते हैं कि संसार का सबसे उत्तम सुख भी अंत में मृत्यु-भय के कारण अपूर्ण रह जाता है। राजा पद्म और लीलाने हर प्रकार के भोग भोगे, परन्तु सुख शरीर पर निर्भर था, इसलिए उसमें मृत्यु का भय छिपा रहा। फूलों, संगीत, काम, खेल आदि का विस्तृत वर्णन इसलिए है कि कोई भी भोग चिरस्थायी नहीं है; जितना अधिक भोग, उतना ही अधिक खोने का डर।

लीला का अचानक पति की मृत्यु का विचार आना महत्वपूर्ण है। सारी सुख-सामग्री होने पर भी प्रेम के कारण मृत्यु का भय असह्य हो गया। यह सिद्ध करता है कि जितना गहरा लगाव, उतना ही गहरा दुख आने वाला है। योगवासिष्ठ यही सिखाता है कि प्रेम चाहे जितना पवित्र हो, यदि वह शरीर और संसार पर आधारित है तो दुख अवश्यम्भावी है।

लीला तुरंत पति को अमर बनाने का संकल्प करती है और तप-जप तथा ब्राह्मणों से पूछने का निश्चय करती है। यह मनुष्य का स्वाभाविक व्यवहार है — हम मृत्यु को शरीर के स्तर पर ही हराना चाहते हैं। परंतु योगवासिष्ठ आगे बताएगा कि शरीर को अमर बनाने का कोई उपाय नहीं, क्योंकि शरीर स्वप्न के समान है।

वास्तविक अमरत्व शरीर को सदा जीवित रखना नहीं, अपितु आत्मा की जागृति है जो कभी जन्मी ही नहीं, मरेगी भी नहीं। लीलाका प्रश्न “अमर कैसे हुआ जाए?” प्रत्येक साधक का प्रश्न है और वसिष्ठ इसका उत्तर ज्ञान से देंगे, न कि किसी यज्ञ-तप से।

इस प्रकार यह प्रकरण केवल प्रेम-कथा नहीं है; यह भोग से वैराग्य और वैराग्य से आत्म-जिज्ञासा की सुंदर यात्रा है। सुख अपने आप समाप्त होकर दुख बनता है, दुख से सच्ची खोज शुरू होती है और सच्ची खोज से मुक्ति मिलती है। यही योगवासिष्ठ का मूल उपदेश है।

Thursday, November 27, 2025

अध्याय ३.१५, श्लोक १८–३१

योगवशिष्ट ३.१५.१८–३१
(सर्वोत्तम जीवन भी केवल स्वप्न ही है)

श्रीराम उवाच ।
सद्बोधवृद्धये ब्रह्मन्समासेन वदाशु मे।
मण्डपाख्यानमखिलं येन बोधो विवर्धते ॥ १८ ॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अभूदस्मिन्महीपीठे कुलपद्मो विकाशवान् ।
पद्मो नाम नृपः श्रीमान्बहुपुत्रो विवेकवान् ॥ १९ ॥
मर्यादापालनाम्भोधिर्द्विषत्तिमिरभास्करः ।
कान्ताकुमुदिनीचन्द्रो दोषतृणहुताशनः ॥ २० ॥
मेरुर्विबुधवृन्दानां यशश्चन्द्रो भवार्णवे।
सरः सद्गुणहंसानां कमलामलभास्करः ॥ २१ ॥
संग्रामवीरुत्पवनो मनोमातङ्गकेसरी।
समस्तविद्यादयितः सर्वाश्चर्यगुणाकरः ॥ २२ ॥
सुरारिसागरक्षोभविलसन्मन्दराचलः ।
विलासपुष्पौघमधुः सौभाग्यकुसुमायुधः ॥ २३ ॥
लीलालतालास्यमरुत्साहसोत्साहकेशवः ।
सौजन्यकैरवशशी दुर्लीलावल्लिकानलः ॥ २४ ॥
तस्यास्ति सुभगा भार्या लीला नाम विलासिनी ।
सर्वसौभाग्यवलिता कमलेवोदिताऽवनौ ॥ २५ ॥
सर्वानुवृत्तिललिता लीला मधुरभाषिणी ।
सानन्दमन्दचलिता द्वितीयेन्दूदयस्मिता ॥ २६ ॥
अलकालिमनोहारिवदनाम्भोजशालिनी ।
सिताङ्गी कर्णिकागौरी जङ्गमेव सरोजिनी ॥ २७ ॥
लताविलासकुन्दौघभासिनी रसशालिनी ।
प्रवालहस्ता पुष्पाभा मधुश्रीरिव देहिनी ॥ २८ ॥
अवदाततनुः पुण्या स्पर्शनाह्लादकारिणी गङ्गेव गां गता देहवती हंसविलासिनी ॥ २९ ॥
तस्य भूतलपुष्पेषोः सकलाह्लाददायिनः ।
परिचर्यां चिरं कर्तुमन्या रतिरिवोदिता ॥ ३० ॥
उद्विग्ने प्रोद्विग्ना मुदिते मुदिता समाकुलाकुलिते ।
प्रतिबिम्बसमा कान्ता संक्रुद्धे केवलं भीता ॥ ३१ ॥

३.१५.१८: श्रीराम ने कहा — हे ब्रह्मन्! सच्ची समझ बढ़ाने के लिए शीघ्र ही मुझे संक्षेप में सम्पूर्ण मण्डप-कथा सुनाइए, जिससे बोध बढ़े।

३.१५.१९: श्रीवसिष्ठ जी बोले — इस पृथ्वी पर पद्म नाम का एक राजा हुआ जो खिले कमल की तरह सुन्दर, अनेक पुत्रों वाला, श्रीमान और विवेकी था।

३.१५.२०: वह सीमाओं का समुद्र, शत्रुओं के अंधकार का सूर्य, पत्नियों के कुमुदिनी वन का चन्द्रमा और दोष रूपी तिनकों को जलाने वाला अग्नि था।

३.१५.२१: वह देवताओं का मेरु, संसार-सागर का चन्द्रमा, सद्गुण हंसों का सरोवर और निर्मल कमलों का सूर्य था।

३.१५.२२: युद्ध में वीर-वृक्षों का पवन, मन-हाथियों का केसरी, समस्त विद्याओं का प्रियतम और सभी आश्चर्य गुणों का खजाना था।

३.१५.२३: वह दैत्य-सागर को मथने वाला मन्दराचल, विलास-पुष्पों के समूह का मधु और सौभाग्य के पुष्प-बाणों से सुसज्जित था।

३.१५.२४: वह लीला-नृत्य और उत्साह का केशव, सौजन्य के कैरव वन का चन्द्रमा और दुष्ट लीलाओं की लता को जलाने वाला अनल था।

३.१५.२५: उसकी पत्नी का नाम लीला था, अत्यन्त सुन्दर, विलासिनी और सभी सौभाग्यों से सम्पन्न, जैसे पृथ्वी पर खिला कमल।

३.१५.२६: वह हर काम में अनुगत, मधुर भाषिणी, आनन्द से धीरे-धीरे चलने वाली और दूसरा चन्द्रमा उगने जैसी मुस्कान वाली थी।

३.१५.२७: काले-काले बालों वाला मनमोहक कमल-सदृश मुख, गोरी देह, कर्णिका जैसी सुनहरी, चलती-फिरती कमलिनी थी।

३.१५.२८: लता जैसी चंचल, कुन्द-पुष्पों से चमकती, रस से भरी, पल्लव जैसे कोमल हाथों वाली, पुष्पों जैसी कान्ति और मधु-श्री की देहधारी थी।

३.१५.२९: अत्यन्त शुद्ध देह वाली, पुण्यवती, स्पर्श से आह्लाद देने वाली, पृथ्वी पर आई गंगा की तरह, हंसों से खेलती देहधारी थी।

३.१५.३०: इस भूतल के पुष्प-स्वरूप, सबको आनन्द देने वाले राजा पद्म की चिरकाल तक सेवा करने के लिए वह दूसरी रति की तरह समर्पित हो गई।

३.१५.३१: वह पति के उद्विग्न होने पर उद्विग्न, प्रसन्न होने पर प्रसन्न, व्याकुल होने पर व्याकुल हो जाती थी; वह प्रतिबिम्ब के समान थी, पर जब पति क्रोधित होते तो वह केवल डरती थी।

शिक्षाओं का सारांश:
ये श्लोक योगवाशिष्ठ के प्रसिद्ध “लीला-उपाख्यान” की शुरुआत हैं। राम वसिष्ठ जी से सच्चा बोध बढ़ाने वाली कोई कथा संक्षेप में सुनाने को कहते हैं और वसिष्ठ जी पद्म राजा और उनकी पत्नी लीला की कथा शुरू करते हैं।

राजा पद्म को असंख्य सुन्दर उपमाओं से आदर्श राजा के रूप में चित्रित किया गया है — बुद्धिमान, शक्तिशाली, गुणवान और हर उत्तम विशेषता से परिपूर्ण। इतनी प्रशंसा का एकमात्र उद्देश्य यह दिखाना है कि सबसे उत्तम सांसारिक जीवन भी माया के दायरे में ही है।

रानी लीला का वर्णन भी उतना ही सुन्दर है। वे आदर्श पत्नी के रूप में दिखाई गई हैं जो पति के हर भाव की छाया मात्र हैं — पति खुश तो वे खुश, पति चिन्तित तो वे चिन्तित, पति क्रुद्ध तो वे केवल भयभीत।

यह दाम्पत्य प्रेम और वैवाहिक जीवन का सर्वोत्तम आदर्श दिखाता है, पर आने वाली कथा यही सिद्ध करेगी कि यह सर्वोत्तम जीवन भी केवल स्वप्न है और पद्म-लीला दोनों अंत में स्वप्न की सत्यता समझकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जाएँगे।

इस प्रकार मंच तैयार होता है: जब इतने उत्तम राजा-रानी भी समझ जाते हैं कि उनका सारा संसार स्वप्न मात्र है और ज्ञान के लिए सब त्याग देते हैं, तो साधारण मनुष्य को तो आत्म-सत्य की खोज करने का और भी अधिक कारण है।

Wednesday, November 26, 2025

अध्याय ३.१५, श्लोक ११–१७

योगवशिष्ट ३.१५.११–१७
(जगत कभी सच्चे अर्थों में बना ही नहीं; वह शुद्ध चैतन्य में मात्र दिखाई देने वाला स्वप्न या मृगतृष्णा है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इदं त्वचेत्यचिन्मात्रं भानोर्भातं नभः प्रति ।
तथा सूक्ष्मं यथा मेघं प्रति संकल्पवारिदः ॥ ११ ॥
यथा स्वप्नपुरं स्वच्छं जाग्रत्पुरवरं प्रति।
तथा जगदिदं स्वच्छं सांकल्पिकजगत्प्रति ॥ १२ ॥
तस्मादचेत्यचिदूपं जगद्व्योमेव केवलम्।
शून्यौ व्योमजगच्छब्दौ पर्यायौ विद्धि चिन्मयौ ॥ १३ ॥
तस्मान्न किंचिदुत्पन्नं जगदादीह दृश्यकम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं यथास्थितमवस्थितम् ॥ १४ ॥
जगदेव महाकाशे चिदाकाशमभित्तिमत् ।
तद्देशस्याणुमात्रस्य तुलायाश्चाप्रपूरकम् ॥ १५ ॥
आकाशरूपमेवाच्छं पिण्डग्रहविवर्जितम् ।
व्योम्नि व्योममयं चित्रं संकल्पपुरवत्स्थितम् ॥ १६ ॥
अत्रेदं मण्डपाख्यानं शृणु श्रवणभूषणम्।
निःसंदेहो यथैषोऽर्थश्चित्ते विश्रान्तिमेष्यति ॥ १७ ॥

महर्षि वशिष्ठ जी बोले:
३.१५.११  
यह संसार केवल अचेत्य चेतन मात्र है, जो परम चैतन्य के प्रकाश में नभ की तरह दिखाई देता है, ठीक वैसे ही जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा का जल बादल के सामने दिखता है।

३.१५.१२  
जैसे स्वप्न में साफ-सुथरी नगरी जाग्रत की श्रेष्ठ नगरी के सामने दिखती है, ठीक उसी तरह यह जाग्रत जगत भी संकल्प से बनी काल्पनिक नगरी के सामने साफ-साफ दिखाई देता है।

३.१५.१३  
इसलिए जगत केवल अचेत्य चेतन रूप है, वह शुद्ध चित्त-आकाश ही है। “आकाश” और “जगत” ये दोनों शब्द शून्य के पर्याय हैं—दोनों चिन्मय हैं, दोनों एक ही हैं।

३.१५.१४  
इसलिए यहाँ कभी कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ—न जगत, न आदि, न कोई दृश्य वस्तु। यह अनिर्वचनीय, अभिव्यक्त नहीं हुआ, जैसा है वैसा ही स्थित है।

३.१५.१५  
जगत चिदाकाश में महाकाश ही है, उसकी कोई दीवार या सीमा नहीं है। उसमें जगह का एक कण भी या तराजू में तौलने की कल्पना भी कभी पूरी नहीं हो सकती।

३.१५.१६  
यह केवल आकाश-स्वरूप, स्वच्छ और ठोस पिंड से सर्वथा रहित है। आकाश में आकाश से बना हुआ एक अद्भुत चित्र संकल्प-नगरी की तरह स्थित है।

३.१५.१७  
अब एक सुंदर मंडप की कथा सुनो जो कानों का आभूषण है। इससे सारे संदेह मिट जाएँगे और यह अर्थ तुम्हारे चित्त में पूरी तरह विश्राम कर जाएगा।

उपदेश का सारांश:
ये सात श्लोक योगवासिष्ठ के मूल अद्वैत सिद्धांत को और गहराई से समझाते हैं कि जगत कभी सच्चे अर्थों में बना ही नहीं; वह शुद्ध चैतन्य में मात्र दिखाई देने वाला स्वप्न या मृगतृष्णा है।

जगत को मरुस्थल में दिखने वाला जल, स्वप्न में बनी नगरी और मन की कल्पना से बने शहर के समान बताया गया है। जैसे ये चीजें वास्तविक नहीं होतीं, उसी तरह जाग्रत संसार भी स्वतंत्र सत्ता नहीं रखता; वह केवल एकमात्र अनंत चैतन्य के प्रकाश से चमकता है।

बार-बार कहा गया है कि जगत “अचेत्य चिद्रूप” है और शुद्ध “चिदाकाश” मात्र है। “जगत” और “आकाश” दोनों शब्द एक ही शून्य को बताते हैं जो केवल चैतन्य से भरा है। कोई ठोस, भौतिक सृष्टि कभी हुई ही नहीं।

कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ, कोई प्रारंभ नहीं, कोई दृश्य वस्तु नहीं। वह अनिरवचनीय, अभिव्यक्त नहीं हुआ और हमेशा अपने मूल स्वरूप में अटल है। ठोसपन, सीमाएँ या मापने की कल्पना भी केवल मन का भ्रम है, जैसे खाली आकाश को तौलने की कोशिश करना व्यर्थ है।

अंत में वसिष्ठ जी एक मनोहर “मंडप-कथा” सुनाने का वादा करते हैं जो सारे संदेह दूर कर देगी और इस गहन सत्य को सुनने वाले के मन में पूरी शांति और स्थिरता के साथ बैठा देगी।

Tuesday, November 25, 2025

अध्याय ३.१५, श्लोक १–१०

योगवशिष्ट ३.१५.१–१०
(जैसे समुद्र की लहरें जल से अलग कभी नहीं होतीं, ठीक वैसे ही चेतना अपने भीतर ही हिलोरें लेती हुई जगत्-रूप बन जाती है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगदाकाशमेवेदं यथा हि व्योम्नि मौक्तिकम् ।
विमले भाति स्वात्मैव जगच्चिद्गगनं यथा ॥ १ ॥
अनुत्कीर्णै भातीव त्रिजगच्छालभञ्जिका ।
चित्स्तम्भेनैव सोत्कीर्णा नचोत्कर्तात्र विद्यते ॥ २ ॥
समुद्रेऽन्तर्जलस्पन्दाः स्वभावादच्युता अपि ।
वीचिवेगा भवन्तीव परे दृश्यविदस्तथा ॥ ३ ॥
जालान्तर्गतसूर्याभा जालाकाररजांस्यपि ।
जगद्भानं प्रति स्थूलान्यणुं प्रति यथाचलाः ॥ ४ ॥
जगद्भानं न भातीदं ब्रह्मणो व्यतिरेकतः ।
जालसूर्यांशुजालं तु व्यतिरेकानुभूतिदम् ॥ ५ ॥
अनुभूतान्यपीमानि जगन्ति व्योमरूपिणि ।
पृथ्व्यादीनि न सन्त्येव स्वप्नसंकल्पयोरिव ॥ ६ ॥
पिण्डग्रहो जगत्यस्मिन्विज्ञानाकाशरूपिणि ।
मरुनद्यां जलमिव न संभवति कुत्रचित् ॥ ७ ॥
जगत्यपिण्डग्राहेऽस्मिन्संकल्पनगरोपमे ।
मरौ सरिदिवाभाति दृश्यता भ्रान्तिरूपिणी ॥ ८ ॥
स्वप्नाद्दृश्येव जगतां तुलादेशेन केन च ।
तुलिता कलनोन्मुक्ता दृश्यश्रीर्व्योम जृम्भते ॥ ९ ॥
वर्जयित्वा ज्ञविज्ञानं जगच्छब्दार्थभाजनम् ।
जगद्ब्रह्मस्वशब्दानामर्थे नास्त्येव भिन्नता ॥ १० ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१५.१  
यह जगत् केवल आकाश ही है, जैसे आकाश में मोती दिखाई देता है। निर्मल चेतना में केवल अपना स्वयं ही चमकता है; जगत् भी ठीक वैसे ही चैतन्य आकाश के समान चमकता है।

३.१५.२  
तीन लोकों की मूर्ति बिना तराशे ही तराशी हुई-सी दिखती है। वह चेतना के खंभे से ही तराशी गई है, कोई दूसरा तराशने वाला कहीं नहीं है।

३.१५.३  
जैसे समुद्र में जल की लहरें स्वभाव से ही उठती हैं पर जल से कभी अलग नहीं होतीं, उसी तरह परम द्रष्टा (चेतना) में दृश्य जगत् प्रकट होते हैं।

३.१५.४  
जैसे झरोखे के जाल में से गुजरती सूर्य की किरणें जाल के छेदों का आकार ले लेती हैं और स्थूल-सूक्ष्म, स्थिर-चलायमान दिखती हैं, ठीक वही हाल जगत् के प्रकट होने का है।

३.१५.५  
ब्रह्म से अलग होकर यह जगत् चमकता ही नहीं। जाल में से निकली सूर्य-किरणों का जाल अलग अनुभव होता है, पर जगत् का प्रकाश ब्रह्म से अलग कभी नहीं होता।

३.१५.६  
ये सारे जगत् अनुभव में आते हैं, पर आकाश-सदृश चेतना में इनका अस्तित्व बिल्कुल नहीं — जैसे स्वप्न या कल्पना में पृथ्वी आदि तत्त्व सचमुच नहीं होते।

३.१५.७  
विज्ञान-आकाश रूप इस जगत् में पिंड ग्रहण (ठोस पदार्थ की धारणा) उतनी ही असंभव है जितनी मरुस्थल की नदी में जल।

३.१५.८  
जब इस जगत् को पिंड-रहित (ठोसपन-रहित) देखा जाता है, तब यह आकाश-पुरी जैसा लगता है और दृश्यता मरुभूमि में नदी की तरह भ्रम मात्र दिखती है।

३.१५.९  
जैसे स्वप्न के दृश्य किसी तराजू में कभी तौले नहीं जा सकते, उसी तरह कल्पना से मुक्त होने पर दृश्य-श्री केवल आकाश की तरह फैल जाती है।

३.१५.१०  
ज्ञाता और ज्ञान को अलग रख दो तो ‘जगत्’ शब्द का कोई अलग अर्थ ही नहीं रह जाता। जगत्, ब्रह्म और आत्मा — इन शब्दों के अर्थ में जरा-सी भी भिन्नता नहीं है।

शिक्षा का विस्तृत सारांश:
ये दस श्लोक (३.१५.१ से ३.१५.१०) योगवासिष्ठ के सर्वोच्च अद्वैत-सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं — जगत् का चेतना या ब्रह्म से अलग कोई अस्तित्व नहीं है।

पहला शिक्षण यह है कि जगत् केवल खाली आकाश है, जैसे आकाश में मोती का भ्रम होता है या बिना तराशे ही मूर्ति तराशी हुई-सी लगती है। एकमात्र निर्मल चेतना ही है, उसके बाहर कुछ भी नहीं। जगत् का ठोस दिखना केवल भ्रम है।

दूसरे, जैसे समुद्र की लहरें जल से अलग कभी नहीं होतीं और झरोखे के जाल में सूर्य-किरणें ही जाल का आकार ले लेती हैं, ठीक वैसे ही चेतना अपने भीतर ही हिलोरें लेती हुई जगत्-रूप बन जाती है। कोई दूसरा सृष्टिकर्ता नहीं, कोई अलग पदार्थ नहीं।

तीसरे, द्वैत का भान होते ही जगत् चमकने लगता है, पर वास्तव में वह कभी ब्रह्म से अलग होता ही नहीं। जाल में सूर्य-किरणों का अलग दिखना भ्रम है, वही भ्रम जगत् का भी है। भेद-बुद्धि हटाओ तो कुछ बचता ही नहीं।

चौथे, स्वप्न की नगरी या मरिचिका का जल जितना असत्य है, उतने ही असत्य ये अनुभव में आने वाले जगत्, शरीर और भूत हैं। शुद्ध चेतना-आकाश में ठोस पदार्थ की कल्पना नामुमकिन है। ठोसपन का भाव छूटते ही केवल खुला शांत आकाश शेष रह जाता है।

पांचवें और अंतिम शिक्षण — जब जानने वाला और जानना भी लीन हो जाए तब ‘जगत्’ शब्द का कोई अलग विषय ही नहीं रह जाता। जगत्, ब्रह्म और आत्मा — तीनों शब्द एक ही तत्त्व की ओर इशारा करते हैं। केवल ब्रह्म है, जगत् कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं। यही परम सत्य है।

Monday, November 24, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ७५–८६

योगवशिष्ट ३.१४.७५–८६
(संसार और शुद्ध चेतना में जरा सा भी अंतर नहीं है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगच्चित्पुष्पसौगन्ध्यं चिल्लताग्रफलं जगत् ।
चित्सत्तैव जगत्सत्ता जगत्सत्तैव चिद्वपुः ॥ ७५ ॥
अत्र भेदविकारादि नखे मलमिव स्थितम् ।
इतीदं सन्मयत्वेन सदसद्भुवनत्रयम् ॥ ७६ ॥
अविकल्पतदात्मत्वात्सत्तासत्तैकतैव च ।
अवयवावयविता शब्दार्थौ शशशृङ्गवत् ॥ ७७ ॥
अनुभूत्यपलापाय कल्पितो यैर्धिगस्तु तान् ।
न विद्यते जगद्यत्र साद्र्यब्ध्युर्वीनदीश्वरम् ॥ ७८ ॥
चिदेकत्वात्प्रसङ्गः स्यात्कस्तत्रेतरविभ्रमः ।
शिलाहृदयपीनापि स्वाकाशे विशदैव चित् ॥ ७९ ॥
धत्तेऽन्तरखिलं शान्तं संनिवेशं यथा शिला ।
पदार्थनिकराकाशे त्वयमाकाशजो मलः ॥ ८० ॥
सत्तासत्तात्मतात्वत्तामत्ताश्लेषा न सन्ति ते ।
पल्लवान्तरलेखौघसंनिवेशवदाततम् ॥ ८१ ॥
अन्यानन्यात्मकमिदं धत्तेऽन्तश्चित्स्वभावतः ।
समस्तकारणौघानां कारणादि पितामहः ॥ ८२ ॥
स्वभावतो कारणात्म चित्तं चिद्ध्यनुभूतितः ।
न चासत्त्वमचेत्यायाश्चितो वाचापि सिद्ध्यति ॥ ८३ ॥
यदस्ति तदुदेतीति दृष्टं बीजादिवाङ्कुरः ॥ ८४ ॥
गगन इव सुशून्यभेदमस्ति त्रिभुवनमङ्ग महाचितोऽन्तरस्याः ।
परमपदमयं समस्तदृश्यं त्विदमिति निश्चयवान्भवानुभूतेः ॥ ८५ ॥
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ८६ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१४.७५  
यह संसार शुद्ध चैतन्य रूपी फूल की सुगंध है। संसार चैतन्य रूपी लता पर लटकता हुआ फल है। संसार की सत्ता केवल चेतना की सत्ता है और चेतना का शरीर ही संसार की सत्ता है।

३.१४.७६  
इसमें भेद, विकार आदि नाखून के नीचे की मैल की तरह हैं। इसलिए यह तीनों लोक – सत-असत जो भी हों – केवल सत्स्वरूप ही हैं।

३.१४.७७  
क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है और यह सबका स्वरूप है, इसलिए सत और असत एक ही हैं। अवयव-अवयविता (अंश और पूर्ण) शब्द मात्र हैं, खरगोश के सींग जैसे – बिल्कुल असत्य।

३.१४.७८  
जो लोग अपनी अनुभूति को मिटाने के लिए जगत की कल्पना करते हैं, उन्हें धिक्कार है। सच में कोई जगत है ही नहीं – न पर्वत, न समुद्र, न नदियाँ, न पृथ्वी, न ईश्वर।

३.१४.७९  
चेतना एक ही है, वहाँ दूसरा भ्रम कहाँ से आएगा? पत्थर जैसा कठोर हृदय भी अंदर से खाली आकाश जैसा है। चेतना सदा निर्मल और स्वच्छ है।

३.१४.८०  
जैसे पत्थर सब कुछ अपने अंदर शांत भाव से रखता है, वैसे ही चेतना अपने आकाश में सारी वस्तुओं को रखती है। यह जो मैल दिख रहा है (जगत), वह इसी चैतन्य-आकाश से पैदा हुआ है।

३.१४.८१  
सत-असत, स्व-पर का आलिंगन कुछ भी नहीं है। यह पत्ते के अंदर की कोमल रेखाओं की तरह फैला हुआ है।

३.१४.८२  
अपने स्वभाव से ही चेतना सब “दूसरे” को अपने अंदर रखती है। यह सभी कारणों का भी कारण, सारे कारण-समूह का दादा है।

३.१४.८३  
स्वभाव से ही चेतना कारण है, अनुभव होने से चेतना है। चेतना के लिए असत या जड़ता शब्दों से भी सिद्ध नहीं हो सकती।

३.१४.८४  
जो सच में है, वही प्रकट होता है – जैसे बीज से ही अंकुर निकलता है।

३.१४.८५  
हे प्रिय, तीनों लोक इस महान चेतना के अंदर पूरी तरह खाली भेद की तरह हैं, जैसे आकाश में कोई भेद नहीं। अपनी अनुभूति से निश्चय कर लो कि यह सारा दिखने वाला जगत परम पद ही है।

३.१४.८६  
मुनि के ऐसा कहते ही दिन ढल गया, सूर्य अस्ताचल को चला गया। सभा ने नमस्कार करके स्नान करने चली गई, सूरज की किरणें भी नीले क्षितिज के साथ चली गईं।

शिक्षा का सरल सारांश:
ये श्लोक जोर देकर बताते हैं कि संसार और शुद्ध चेतना में जरा सा भी अंतर नहीं है। संसार चेतना का सुगंध, फल और शरीर ही है। संसार की जो सत्ता दिखती है वह चेतना की सत्ता है और चेतना का स्वरूप ही संसार है। वास्तव में कोई द्वैत है ही नहीं – जो कुछ दिख रहा है वह ब्रह्म ही है।

सारे भेद, परिवर्तन, अंश-पूर्ण, सत-असत, मैं-दूसरा – ये सब शब्दों की जादूगरी या पत्ते की रेखाएँ मात्र हैं। इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं। सृष्टि, कारण, देवता, पर्वत, समुद्र आदि सब केवल अपनी सच्ची अनुभूति को ढँकने के लिए कल्पना किए गए हैं। सच में इनमें से कुछ भी अलग से नहीं है।

चेतना एकमात्र सत्य है जो अपने आप सिद्ध है। वह सारे कारणों का भी कारण और सबसे पहला कारण है, फिर भी अपरिवर्तित और शुद्ध रहती है। चेतना के लिए कभी जड़ता या असत्य सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि वह अनुभव का आधार है। जो सच में है वही प्रकट होता है, असत्य कभी उत्पन्न नहीं होता।

तीनों लोक और सारी दिखने वाली चीजें महान चेतना के आकाश में बिल्कुल खाली भेद की तरह हैं – इनमें कोई पदार्थ नहीं। ज्ञानी व्यक्ति अपनी सीधी अनुभूति से निश्चय करता है कि यह सारा दृश्य जगत केवल परम निःद्वैत अवस्था ही है।

इस प्रकार वसिष्ठ जी यह उपदेश समाप्त करते हैं और दिन ढल जाता है – इसका अर्थ है कि जब यह ज्ञान का प्रकाश हो जाता है तो सारी दिखने वाली बहुरूपता अपने आप शांत हो जाती है, जैसे सूर्यास्त के साथ दिन की सारी हलचल समाप्त हो जाती है।

Sunday, November 23, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ६४–७४

योगवशिष्ट ३.१४.६४–७४
(ब्रह्मांड में आकाश, वायु, जल, प्रकाश, शरीर आदि सब कुछ केवल शुद्ध चेतना से अपने आप उत्पन्न होता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वयं विचित्रं स्फुरति चिदण्डकमनाहतम् ।
स्वयं विलक्षणस्पन्दं चिद्वायुरण्डजात्मकः ॥ ६४ ॥
स्वयं विचित्रं कचनं चिद्वारि न निखातगम् ।
स्वयं विचित्रधातुत्वं श्रेष्ठाङ्गमपि निर्मितम् ॥ ६५ ॥
स्वविचित्ररसोल्लासा चिज्ज्योत्स्ना सततोदिता ।
स्वयं चिदेव प्रकटश्चिदालोको महात्मकः ॥ ६६ ॥
स्वयमस्तं गते बाह्ये स्वज्ञानादुदिता चितिः ।
स्वयं जडेषु जाड्येन पदं सौषुप्तमागता ॥ ६७ ॥
स्वयं स्पन्दितयास्पन्दिचित्त्वाच्चिति महानभ ।
चित्प्रकाशप्रकाशो हि जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६८ ॥
चिदाकाशैकशून्यत्वं जगदस्ति च नास्ति च ।
चिदालोकमहारूपं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६९ ॥
चिन्मारुतपरिस्पन्दो जगदस्ति च नास्ति च ।
चिद्धनध्वान्तकृष्णत्वं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ७० ॥
चिदर्कालोकदिवसो जगदस्ति च नास्ति च ।
चित्कज्जलरजस्तैलपरमाणुर्जगत्क्रमः ॥ ७१ ॥
चिदग्न्यौष्ण्यं जगल्लेखा जगच्चिच्छङ्खशुक्लता ।
जगच्चिच्छैलजठरं चिज्जलद्रवता जगत् ॥ ७२ ॥
जगच्चिदिक्षुमाधुर्यं चित्क्षीरस्निग्धता जगत् ।
जगच्चिद्धिमशीतत्वं चिज्ज्वालाज्वलनं जगत् ॥ ७३ ॥
जगच्चित्सर्षपस्नेहो वीचिश्चित्सरितो जगत् ।
जगच्चित्क्षौद्रमाधुर्यं जगच्चित्कनकाङ्गदम् ॥ ७४ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१४.६४  
चेतना का अंडा (ब्रह्मांड) अपने आप ही नाना प्रकार से चमकता है, बिना किसी टक्कर के। चेतना की हवा खुद ही अनोखे ढंग से हिलती है और ब्रह्मांड का रूप ले लेती है।

३.१४.६५  
चेतना का जल बिना गिरे ही तरह-तरह से चमकता है। चेतना ने स्वयं ही सबसे अच्छे शरीर को भी अनेक अंगों सहित बना लिया है।

३.१४.६६  
शुद्ध चेतना की चाँदनी सदा स्वादपूर्ण उल्लास के साथ उदित होती है। चेतना ही स्वयं महान चेतना-प्रकाश के रूप में प्रकट होती है।

३.१४.६७  
बाहरी दुनिया के डूब जाने पर अपने ज्ञान से चेतना उदित होती है। फिर जड़ वस्तुओं को जड़ता देकर वह सुषुप्ति की अवस्था में पहुँच जाती है।

३.१४.६८  
चेतना के स्पंदन से महान आकाश भी स्पंदित होता है। चेतना का प्रकाश चमकता है, इसलिए जगत है भी और नहीं भी।

३.१४.६९  
जगत चेतना के आकाश जैसी शून्यता है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना के प्रकाश का महान रूप है – है भी और नहीं भी।

३.१४.७०  
जगत चेतना की हवा का स्पंदन है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना के अंधकार की कालीमा है – है भी और नहीं भी।

३.१४.७१  
जगत चेतना के सूर्य का दिन है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना में काजल, धूल और तेल की बूंदों की तरह उत्पन्न होता है।

३.१४.७२  
जगत चेतना की अग्नि की गर्म रेखा है, जगत चेतना के शंख की सफेदी है। जगत चेतना के पर्वत का भीतर है, जगत चेतना के जल की तरलता है।

३.१४.७३  
जगत चेतना के गन्ने की मिठास है, चेतना के दूध की चिकनाई है। जगत चेतना के हिम की ठंडक है, चेतना की ज्वाला का जलना है।

३.१४.७४  
जगत चेतना के तिल में तेल है, तरंगें चेतना की नदियाँ हैं – यही जगत है। जगत चेतना के शहद की मिठास है, जगत चेतना का सोने का आभूषण है।

शिक्षाओं का सरल सार:
१. ब्रह्मांड में आकाश, वायु, जल, प्रकाश, शरीर आदि सब कुछ केवल शुद्ध चेतना से अपने आप उत्पन्न होता है। इसके लिए बाहर कुछ भी जरूरी नहीं।

२. चेतना अनंत आकाश की तरह है जो अपने आप चमकती है। वह लाखों रूपों में खेलती है, पर वास्तव में कभी बदलती नहीं और सीमित भी नहीं होती।

३. जब हम सोचते हैं कि जगत है तो चेतना के जागने और चमकने से वह दिखाई देता है। जब चेतना विश्राम करती है (जैसे सुषुप्ति में) तो जगत गायब हो जाता है।

४. एक ही चेतना अनेक रूपों में जगत बन जाती है – कभी प्रकाश, कभी अंधेरा, गर्मी, ठंडक, मिठास, कठोरता, लहरें, सोना – सब कुछ केवल चेतना का अलग-अलग दिखना है।

५. इसलिए जगत है भी और नहीं भी। चेतना में भ्रम के रूप में है, पर सच्चाई में केवल शुद्ध चेतना ही है, इसके अलावा कुछ भी नहीं।

Saturday, November 22, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ५६–६३

योग वशिष्ठ ३.१४.५६–६३  
(जीव कुछ और नहीं है, बल्कि चेतना का स्पंदनमात्र या कंपायमान गति ही है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यच्चिच्चित्त्वेन कचनं स्वसंपाद्याभिधात्मकम् ।
स्वविकारैर्व्यवच्छेद्यं भिद्यते नो न विद्यते ॥ ५६ ॥
चित्स्पन्दरूपिणोरस्ति न भेदः कर्तृकर्मणोः ।
स्पन्दमात्रं भवेत्कर्म स एव पुरुषः स्मृतः ॥ ५७ ॥
जीवश्चित्तपरिस्पन्दः पुंसां चित्तं स एव च ।
मनस्त्विन्द्रियरूपं सत्सत्तां नानेव गच्छति ॥ ५८ ॥
शान्ताशेषविशेषं हि चित्प्रकाशच्छटा जगत् ।
कार्यकारणकादित्वं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥ ५९ ॥
अच्छेद्योऽहमदाह्योऽहमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽहमिति स्थितम् ॥ ६० ॥
विवदन्ते तथा ह्यत्र विवदन्तो यथा भ्रमैः ।
भ्रमयन्तो वयं त्वेते जाता विगतविभ्रमाः ॥ ६१ ॥
दृश्ये मूर्ते ज्ञसंरूढे विकारादि पृथग्भवेत् ।
नामूर्ते तज्ज्ञकचिते चित्खे सदसदात्मनि ॥ ६२ ॥
चित्तरौ चेत्यरसतः शक्तिः कालादिनामिकाम् ।
तनोत्याकाशविशदां चिन्मधुश्रीः स्वमञ्जरीम् ॥ ६३ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१४.५६: जो कुछ भी जीव लगता है, वह केवल चैतन्य का कंपन ही है।  
३.१४.५७: जैसे समुद्र में उठने वाली लहरें जल के अलावा कुछ नहीं होतीं, उसी तरह यह जीव भी चेतना के सिवा और कुछ नहीं है।  

३.१४.५८: जब चेतना स्थिर रहती है, तब वह ब्रह्म कहलाती है। 

३.१४.५९: जब वही चेतना संकल्प करती हुई स्पंदित होती है, तब जीव कहलाती है। इसमें कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, कोई दूसरी शक्ति नहीं है।  

३.१४.६०: जैसे रस्सी में जब तक अज्ञान रहता है, साँप दिखता है, पर जब ज्ञान होता है तो केवल रस्सी ही रह जाती है — ठीक वैसे ही यह जीव भी केवल चैतन्य का भ्रममात्र है।  

३.१४.६१: सारा जगत् चेतना का ही स्पंदन है, और जब स्पंदन शांत हो जाता है, तब केवल शुद्ध चैतन्य ही शेष रह जाता है।  

३.१४.६२: इसलिए हे राम! यह समझ लो कि जीव, जगत् और ब्रह्म—ये तीनों एक ही चैतन्य के अलग-अलग नाम हैं।  

३.१४.६३: जो इस सत्य को जान लेता है, वही मुक्त हो जाता है।

शिक्षाओं का सरल सारांश:

ये श्लोक बहुत जोर देकर कहते हैं कि शुद्ध चैतन्य (शुद्ध चेतना) में कभी कोई द्वैत नहीं है। चेतना कभी सचमुच मन, जीव या जगत नहीं बनती—बस अपनी ही हल्की-हल्की हलचल (स्पंदन) के कारण ऐसा दिखाई देती है।  

जिसे हम मन, पुरुष, जीव या व्यक्ति कहते हैं, वह एक ही अविभाजित चेतना का पलभर का कंपन मात्र है। कर्ता-कर्म, द्रष्टा-दृश्य, कारण-कार्य में कोई सच्चा अंतर नहीं है। सब कुछ चेतना का अपने आप से खेल है, वह कभी अपनी प्रकृति से बाहर नहीं जाती।  

जगत, शरीर, काल, देश और सारी कारण-प्रक्रिया—ये सब उस एक चैतन्य पर थोपी हुई झूठी कल्पनाएँ हैं। जैसे लहरें समुद्र से अलग कभी नहीं होतीं, वैसे ही सारे कर्म, कर्ता और विषय चेतना के अपने ही स्पंदन हैं। जब यह स्पंदन शांत हो जाता है, तब सारा ब्रह्मांड फिर से शांत, निर्विकल्प, शुद्ध चैतन्य में विलीन हो जाता है। इसके अलावा कुछ है ही नहीं—न सृष्टि, न प्रलय, न बंधन, न मुक्ति।  

आत्मा का सच्चा स्वरूप उपनिषदों के प्रसिद्ध वचन हैं: अटूट, न जलने वाला, शाश्वत, सर्वव्यापी, अचल।ये गुण अलग से जोड़े हुए नहीं हैं—बस जब शरीर, मन और जगत से गलत तादात्म्य छूट जाता है, तब जो शेष रहता है, उसी की ओर संकेत हैं। जैसे ही इस समझ में दृढ़ता से टिक जाओ, सारी सीमाएँ अपने आप गिर जाती हैं।  

सारे दार्शनिक विवाद, तर्क-वितर्क और संप्रदायों के झगड़े स्वप्न में झगड़ते लोगों जैसे हैं, जो भूल गए हैं कि वे सो रहे हैं। जो सत्य को जान लेता है, वह व्यक्तित्व और बहुलता के स्वप्न से जाग जाता है। जागने के बाद उसे हँसी आती है कि पहले मैं किस बात को लेकर लड़ता-झगड़ता था—कोई लड़ने वाला था ही नहीं, कोई झगड़ने की बात थी ही नहीं।  

अंत में, काल, देश, कारण-कार्य और सृष्टि करने वाली शक्ति भी मन और उसके विषयों के झूठे खेल से ही पैदा होते हैं। शुद्ध चैतन्य तो हमेशा स्पर्शरहित, निर्मल और चमकता हुआ रहता है—जैसे आकाश या शहद। वह बिना किसी प्रयास के अपनी अनंत संभावनाओं को प्रकट करता रहता है, पर कभी सीमित या विभाजित नहीं होता।  

इस चैतन्य-आकाश में विश्रांति करना—जहाँ सत्य-असत्य, वास्तविक-अवास्तविक का कोई भेद न रहे—यही इन श्लोकों की सबसे ऊँची शिक्षा है। बस इतना समझ लो : तुम वही हो—शुद्ध, अखंड, मुक्त चैतन्य। बाकी सब स्वप्न है। 

Friday, November 21, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ४६–५५

योग वशिष्ठ ३.१४.४६–५५  
(व्यक्तिगत जीव और “मैं” का भाव चेतना के अंदर एक हल्की-सी हलचल या कल्पना मात्र है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चितश्चेत्यमहंकारः सैव राघव कल्पना।
तन्मात्रादि चिदेवातो द्वित्वैकत्वे क्व संस्थिते ॥ ४६ ॥
जीवहेत्वादिसंत्यागे त्वं चाहं चेति संत्यज ।
शेषः सदसतोर्मध्ये भवत्यर्थात्मको भवेत् ॥ ४७ ॥
चिता यथादौ कलिता स्वसत्ता सा तथोदिता ।
अभिन्ना दृश्यते व्योम्नः सत्तासत्ते न विद्महे ॥ ४८ ॥
विश्वं खं जगदीहाख्यं खमस्ति विबुधालयः ।
साकारश्चिच्चमत्काररूपत्वान्नान्यदस्ति हि ॥ ४९ ॥
यो यद्विलासस्तस्मात्स न कदाचन भिद्यते ।
अपि सावयवं तस्मात्कैवानवयवे कथा ॥ ५० ॥
चितेर्नित्यमचेत्याया निर्नाम्न्या वितताकृतेः ।
यद्रूपं जगतो रूपं तत्तत्स्फुरणरूपिणः ॥ ५१ ॥
मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि गिरयो दिशः।
इति या यास्तु रचनाश्चितस्तत्त्वाज्जगत्स्थितेः ॥ ५२॥
चितेश्चित्त्वं जगद्विद्धि नाजगच्चित्त्वमस्ति हि ।
अजगत्त्वादचिच्चित्स्याद्भानाद्भेदो जगत्कुतः ॥ ५३ ॥
चितेर्मरीचिबीजस्य निजा यान्तश्चमत्कृतिः ।
सा चैषा जीवतन्मात्रमात्रं जगदिति स्थिता ॥ ५४ ॥
चित्तात्स्वशक्तिकचनं यदहंभावनं चितः ।
जीवः स्पन्दनकर्मात्मा भविष्यदभिधो ह्यसौ ॥ ५५ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:

३.१४.४६  
जिस प्रकार स्वप्न में दिखने वाली नगरी केवल मन की कल्पना मात्र होती है, वैसे ही यह सारा जगत् चेतना के अंदर एक कल्पना ही है।

३.१४.४७  
जो कुछ दिखता है, वह सब चिद्घन (शुद्ध चेतना) में एक छोटी-सी तरंग मात्र है, जैसे समुद्र में लहर। वास्तव में कोई अलग जीव या संसार नहीं है।

३.१४.४८  
जैसे रस्सी में साँप की कल्पना हो जाती है, उसी तरह ब्रह्म में जीव और जगत् की कल्पना हो जाती है। रस्सी के ज्ञान से साँप अपने आप मिट जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से जीव-जगत् मिट जाता है।

३.१४.४९  
यह “मैं” का भाव एक क्षणिक स्पंदन मात्र है। यह न तो सत्य है, न असत्य; यह केवल चेतना में उठी एक तरंग है जो शांत हो जाती है।

३.१४.५०  
जब यह तरंग शांत हो जाती है, तब केवल शुद्ध चेतना ही शेष रहती है। उसमें न जीव रहता है, न संसार, न बंधन, न मोक्ष।

३.१४.५१  
जो लोग इस “मैं” के भाव को ही सत्य मानकर चिपके रहते हैं, वे दुख पाते हैं। जो इसे केवल कल्पना जान लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं।

३.१४.५२  
जिस क्षण यह समझ आ जाए कि मैं ब्रह्म हूँ और यह सब मेरी ही कल्पना है, उसी क्षण सारा भ्रम दूर हो जाता है।

३.१४.५३  
जैसे सोते हुए व्यक्ति को स्वप्न का दुख सत्य लगता है, जागने पर पता चलता है कि कुछ था ही नहीं, वैसे ही यह जाग्रत अवस्था का संसार भी केवल एक लंबा स्वप्न है।

३.१४.५४  
इसलिए हे राम! इस “मैं” और “मेरा” के छोटे-से स्पंदन को छोड़ दो और अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाओ।

३.१४.५५  
जब यह स्पंदन पूरी तरह शांत हो जाता है, तब जो शेष रहता है वही परम शांति, वही ब्रह्म, वही तुम्हारा सच्चा स्वरूप है।

शिक्षाओं का सरल सारांश:

मुख्य शिक्षा – पूर्ण अद्वैत (एकमात्र सत्य एक ही है, दूसरा कुछ भी नहीं):

. यह सारा जगत्, शरीर, मन, देवता, दिशाएँ, पहाड़, मैं-तू, जीव-जगत् – सब कुछ शुद्ध चेतना (चित्) का अपना ही खेल है।  

. चेतना अपने आप में ही हल्की-सी कल्पना करके “मैं अलग हूँ, यह जगत अलग है” ऐसा दिखाती है, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न में नगरी बनती-मिटती है।  

. वास्तव में कभी भी कोई दूसरी चीज़ पैदा नहीं हुई। न जीव अलग है, न जगत अलग है, न समय अलग है – सब एक ही चेतना के अंदर चमक रहे हैं।  

. लहर कभी समुद्र से अलग नहीं होती, सूर्य की किरण कभी सूर्य से अलग नहीं होती – उसी तरह कुछ भी चेतना से अलग नहीं होता।  

. यह जगत् “अजगत्” है अर्थात् कभी जन्मा ही नहीं। जो दिख रहा है वह चेतना का अपना ही स्पंदन (हल्की कंपन) है।  

. “मैं शरीर हूँ, मैं करता हूँ, मुझे सुख-दुख मिलता है” – यह छोटा-सा “मैं” का भाव ही सारी माया है। यह भाव भी चेतना के अंदर की एक क्षणिक तरंग मात्र है।  

. जिस दिन यह तरंग पूरी तरह शांत हो जाती है और यह साफ दिख जाता है कि “मैं ही ब्रह्म हूँ, सब मेरी ही लीला है”, उसी दिन सारा भ्रम खत्म हो जाता है।  

. तब जो बचता है वह न “है” कहलाता है, न “नहीं है” कहलाता है – वह शुद्ध आकाश-समान चेतना है, जिसमें कोई सीमा नहीं, कोई दूसरा नहीं, केवल अपूर्व शांति और आनंद है।

संक्षेप में एक वाक्य में:  
सब कुछ एक ही शुद्ध चेतना है जो अपने आप से खेल रही है; “मैं अलग हूँ” यह छोटी-सी कल्पना ही बंधन है, और इसे जान लेना ही मुक्ति है।

Thursday, November 20, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ३६–४५

योग वशिष्ठ ३.१४.३६–४५
("मैं"  की भावना बहुत छोटे-छोटे जीवों से शुरू होती है और धीरे-धीरे मजबूत होती जाती है, जब तक कि व्यक्ति सच्चा अनंत आत्मा का साक्षात्कार न कर ले)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चेत्यसंवेदनाज्जीवो भवत्यायाति संसृतिम् ।
तदसंवेदनाद्रूपं समायाति समं पुनः ॥ ३६ ॥
एवं कनिष्ठजीवानां ज्येष्ठजीवक्रमाक्रमैः ।
समुदेत्यात्मजीवत्वं ताम्राणामिव हेमता ॥ ३७ ॥
अत्रान्तरे महाकाश इत्थमेष गणोऽप्यसन् ।
स्वात्मैव सदिवोदेति चिच्चमत्करणात्मकः ॥ ३८ ॥
स्वयमेव चमत्कारो यः समापद्यते चितः।
भविष्यन्नामदेहादि तदहंभावनं विदुः ॥ ३९ ॥
चितो यस्माच्चिदालेहस्तन्मयत्वादनन्तकः ।
स एष भुवनाभोग इति तस्यां प्रबिम्बति ॥ ४० ॥
परिणामविकारादिशब्दैः सैव चिदव्यया ।
तादृग्रूपादभेद्यापि स्वशक्त्यैव विबुध्यते ॥ ४१ ॥
अविच्छिन्नविलासात्म स्वतो यत्स्वदनं चितः ।
चेत्यस्य च प्रकाशस्य जगदित्येव तत्स्थितम् ॥ ४२ ॥
आकाशादपि सूक्ष्मैषा या शक्तिर्वितता चितः ।
सा स्वभावत एवैतामहंतां परिपश्यति ॥ ४३ ॥
आत्मन्यात्मात्मनैवास्या यत्प्रस्फुरति वारिवत् ।
जगदन्तमहंताणुं तदैषा संप्रपश्यति ॥ ४४ ॥
चमत्कारकरी चारु यच्चमत्कुरुते चितिः ।
स्वयं स्वात्मनि तस्यैव जगन्नाम कृतं ततः ॥ ४५ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:

३.१४.३६
कीट, पतंग, जूँ, मच्छर आदि बहुत छोटे जीवों में भी "मैं"  और "मेरा"  का थोड़ा-सा भाव रहता है।

३.१४.३७
जैसे-जैसे शरीर बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे अहंकार भी बढ़ता जाता है; हाथी और मनुष्य तक पहुँचते-पहुँचते यह अहंकार बहुत मजबूत हो जाता है।

३.१४.३८
जो लोग अपने को केवल शरीर ही मानते हैं, उनके भीतर यह "मैं" का भाव और भी गहरा और मजबूत हो जाता है।

३.१४.३९
जिन्होंने आत्मा के बारे में कुछ विचार किया है, पर अभी पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ, उनके यहाँ भी अहंकार रहता ही है, पर थोड़ा कम हो जाता है।

३.१४.४०
जो योगी पूर्ण रूप से आत्मा में स्थित हो चुके हैं, उनमें यह "मैं" का भाव बहुत सूक्ष्म रह जाता है, जैसे सोते हुए व्यक्ति में भी थोड़ी-सी चेतना रहती है।

३.१४.४१
जिन्होंने ब्रह्म को पूरी तरह जान लिया है, उन महात्माओं में भी जीते-जी थोड़ा-सा अहंकार शेष रहता है, जैसे गहरी नींद में भी स्वप्न का बीज रहता है।

३.१४.४२
जब तक शरीर है, तब तक यह सूक्ष्म अहंकार बना रहता है; शरीर के गिरते ही यह भी पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

३.१४.४३
जैसे बादल हटते ही सूर्य पूरा दिखाई देता है, वैसे ही अहंकार के पूरी तरह मिट जाने पर अनंत ब्रह्म ही शुद्ध रूप में प्रकट होता है।

३.१४.४४
इसलिए हे राम! इस "मैं"  और "मेरा"  के भाव को जड़ से मिटा दो; यही सबसे बड़ा साधन है मुक्ति पाने का।

३.१४.४५
जब तक यह अहंकार है, तब तक बंधन है; अहंकार के नष्ट होते ही स्वतः मुक्ति हो जाती है—यह बात निश्चित समझो।

इन शिक्षाओं का सार:

ये दस श्लोक बताते हैं कि एकमात्र शुद्ध चेतना, जो मूलतः शांत और अद्वितीय है, अपनी ही स्वयं-जागरूकता और आश्चर्य-शक्ति से जीव बनती है और सारा संसार बन जाता है। जब चेतना किसी विचार-वस्तु को "जानने" लगती है, तभी सीमित जीव और जन्म-मृत्यु का चक्र प्रकट होता है। जब वह जानना बंद कर देती है, सब कुछ फिर वही शांत चेतना बन जाता है। चेतना को वास्तव में कुछ भी नहीं होता; वह कभी बदलती नहीं, न बँटती है।

चेतना की तुलना शुद्ध आकाश से की गई है—जो खाली है, फिर भी अनगिनत जीवों से भरा दिखता है। जैसे ताँबे को सोना बनाया जा सकता है, वैसे ही साधारण जीव क्रमशः परम आत्म-साक्षात्कार तक पहुँच सकते हैं। "मैं" की भावना कीट-पतंगे से शुरू होकर धीरे-धीरे मजबूत होती जाती है, जब तक सच्चे अनंत आत्मा का बोध न हो जाए।

जगत् का मुख्य कारण चेतना का स्वयं में होने वाला आश्चर्य और आनंद है। वह स्वयं को चाखती है, स्वयं को गले लगाती है, स्वयं में रम जाती है। इसी स्व-आनंद को गलती से "मैं" यह शरीर हूँ, यह नाम है, ये वस्तुएँ " मेरी हैं"  समझ लिया जाता है। यही भ्रम पूरा ब्रह्मांड चेतना के भीतर प्रतिबिंब की तरह प्रक्षेपित कर देता है।

परिवर्तन, विकार आदि शब्द भी चेतना के लिए कहे जाते हैं, पर वे केवल दिखावा हैं। चेतना तो अपरिवर्तनीय, अखंड और शाश्वत है। फिर भी अपनी मुक्त शक्ति से, जो सबसे सूक्ष्म आकाश से भी सूक्ष्म है, वह अनेक बनने का खेल खेलती है। यह खेल निरंतर, अटूट और मीठा है—यह चेतना का अपना स्व-आनंद है।

अंत में, जगत् कुछ और नहीं—बस चेतना का अपने ही भीतर अपने प्रति आश्चर्य करना और उस आश्चर्य का सुंदर खेल है। बाहर कोई सच्चा सृजन या सच्चा जगत् नहीं है। जिस क्षण यह समझ में आ जाए कि लहर केवल जल ही है, उसी क्षण छोटा-सा "मैं"  और विशाल जगत् दोनों एक चेतना-सागर में विलीन हो जाते हैं, और केवल शांति और आश्चर्य ही एकमात्र सत्य स्वरूप के रूप में शेष रह जाता है।

Wednesday, November 19, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक २८–३५

योगवशिष्ठ ३.१४.२८-३५

(केवल ब्रह्म ही, जो महा-जीव है, सदा के लिए सचमुच मौजूद रहता है। उसकी इच्छा से असंख्य जीव और असंख्य ब्रह्माण्ड कुछ समय के लिए प्रकट होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक सोए हुए मनुष्य में लाखों स्वप्न एक साथ उठते हैं)

श्रीराम उवाच ।
एवमेतत्कथं ब्रह्मन्नेकजीवेच्छयाखिलाः।
जगज्जीवा न युज्यन्ते महाजीवैकतावशात् ॥ २८ ॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महाजीवात्म तद्ब्रह्म सर्वशक्तिमयात्मकम् ।
स्थितं तथेच्छमेवेह निर्विभागं निरन्तरम् ॥ २९ ॥
यदेवेच्छति तत्तस्य भवत्याशु महात्मनः ।
पूर्वं तेनेष्टमिच्छादि ततो द्वित्वमुदेति यत् ॥ ३० ॥
पश्चाद्द्वित्वविभक्तानां स्वशक्तीनां प्रकल्पितः ।
अनेनेत्थं हि भवतीत्येवं तेन क्रियाक्रमः ॥ ३१ ॥
तं विनानुदये त्वासां प्रधानेच्छैव रोहति।
शक्त्या ह्यजातया ब्राह्म्या नियमोऽयं प्रकल्पितः ॥ ३२ ॥
यस्या जीवाभिधानायाः शक्त्यपेक्षा फलत्यसौ ।
प्रधानशक्तिनियमानुष्ठानेन विना न तु ॥ ३३ ॥
प्रधानशक्तिनियमः सुप्रतिष्ठो न चेद्भवेत् ।
तत्फलं शक्त्यधीनत्वान्नेहितानां क्वचिद्भवेत् ॥ ३४ ॥
एवं ब्रह्म महाजीवो विद्यतेऽन्तादिवर्जितः ।
जीवकोटि महाकोटि भवत्यथ न किंचन ॥ ३५ ॥

श्रीराम ने पूछा:
३.१४.२८: हे ब्रह्मन्! यदि सब कुछ केवल एक ही महा-जीव की इच्छा से होता है, तो फिर असंख्य छोटे-छोटे जीव और सारा जगत कैसे प्रकट होता है? एक महा-जीव की इच्छा से करोड़ों जीवों का प्रकट होना तर्कसंगत नहीं लगता।

महर्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया:
३.१४.२९: वह महा-जीव स्वयं ही ब्रह्म है। वह समस्त शक्तियों से परिपूर्ण है और उसके भीतर कोई विभाग नहीं है। वह सदा केवल शुद्ध इच्छा-स्वरूप ही बना रहता है, बिना किसी भंग या अलगाव के।

३.१४.३०: इस महा-सत्ता की जो इच्छा होती है, वह तुरंत सत्य हो जाती है। सबसे पहले उसने इच्छा की – “मैं यह और वह बनूँ।” इसी पहली इच्छा से द्वैत (दो का भाव) उत्पन्न होता है।

३.१४.३१: फिर वह अपनी ही शक्तियों को अनेक भागों में बाँटकर निश्चय करता है – “इस शक्ति से ऐसा होगा, उस शक्ति से वैसा होगा।” इसी प्रकार वह स्वयं ही कर्मों और घटनाओं की व्यवस्था बना देता है।

३.१४.३२: उसके बिना इन बँटी हुई शक्तियों में से कोई भी न तो उत्पन्न हो सकती है, न कुछ कर सकती है। मुख्य नियम यही है कि पहले महान् ब्रह्म-शक्ति की इच्छा हो, तभी छोटी शक्तियाँ काम करना शुरू कर सकती हैं। यह नियम स्वयं अजन्मा ब्रह्म-शक्ति ने ही बनाया है।

३.१४.३३: जिसे “जीव” कहते हैं, वह शक्ति भी अपने फल पाने के लिए उस मुख्य शक्ति का सहारा लेती है। मुख्य शक्ति के बनाए नियमों का पालन किए बिना जीव कुछ भी नहीं पा सकता।

३.१४.३४: यदि मुख्य शक्ति का नियम अच्छी तरह स्थिर और पालित न हो, तो छोटी शक्तियों की कोई भी इच्छा कहीं भी फलित नहीं हो सकती, क्योंकि सारे फल पूरी तरह उस मुख्य शक्ति पर निर्भर हैं।

३.१४.३५: इस प्रकार केवल ब्रह्म ही, जो महा-जीव है, सचमुच सदा रहता है। उसका न कोई भीतर है, न बाहर, न आदि है, न अंत। फिर भी उसकी इच्छा से करोड़ों-अरबों छोटे जीव प्रकट होते हैं, और फिर सब कुछ फिर लुप्त हो जाता है (ब्रह्म में ही विलीन हो जाता है)।

इस उपदेश का सार:
ये श्लोक राम जी के संदेह का समाधान करते हैं – “यदि केवल एक ही सत्य है, तो इतने सारे जीव और जगत कैसे दिखते हैं?”

वशिष्ठ जी समझाते हैं कि परम सत्य ब्रह्म ही है, जिसे महा-जीव भी कहते हैं। यह ब्रह्म शुद्ध, असीमाहीन चेतना है, समस्त शक्तियों से भरा हुआ। इसमें कोई विभाग नहीं, इसके अलावा दूसरा कुछ भी नहीं है। सारा खेल उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा से शुरू होता है।

सबसे पहले ब्रह्म अकेला था, फिर उसने सोचा “मैं कुछ अनुभव करूँ, मैं यह बनूँ।” इसी पहली इच्छा से “मैं” और “यह” का भेद पैदा हुआ। इसी एक हलचल से सारी बहुता (अनेक जीव, अनेक ब्रह्माण्ड) निकलती है।फिर ब्रह्म अपनी अनंत शक्ति को असंख्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर हर टुकड़े को अलग-अलग काम सौंप देता है और क्रम का नियम बना देता है। ये नियम कोई और नहीं, स्वयं ब्रह्म ने बनाए हैं, जबकि वह स्वयं अजन्मा और अपरिवर्तनीय रहता है।

हर छोटा जीव ब्रह्म की शक्ति का एक नन्हा अंश मात्र है। वह कभी स्वतंत्र होकर कुछ नहीं कर सकता। उसका हर फल, हर अनुभव, हर सृष्टि पूरी तरह महा-जीव की इच्छा और उसके बनाए नियमों पर निर्भर है।

अंत में स्पष्ट शिक्षा यही है: सचमुच केवल एक ब्रह्म (महा-जीव) ही सदा रहता है। उसकी इच्छा से करोड़ों जीव और ब्रह्माण्ड कुछ समय के लिए प्रकट होते हैं, ठीक वैसे जैसे एक सोते हुए मनुष्य के भीतर लाखों-करोड़ों स्वप्न एक साथ उठते हैं। इच्छा समाप्त हुई कि सब लुप्त, फिर केवल एक अखण्ड ब्रह्म ही शेष रह जाता है। वास्तव में कभी भी एक से अधिक कुछ था ही नहीं; सारी अनेकता केवल उस एक चेतना के भीतर अस्थायी दिखावा मात्र है।

Tuesday, November 18, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक १८–२७

योग वशिष्ठ ३.१४.१८–२७  
(केवल शुद्ध चैतन्य ही अस्तित्व है, और मैं वही हूँ। जब यह सत्य अटल हो जाता है, तब सारे बंधन सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एक एव न जीवोऽस्ति राशीनां संभवः कुतः ।
शशशृङ्गं समुड्डीय प्रयातीव हि ते वचः ॥ १८ ॥
न जीवोऽस्ति न जीवानां राशयः सन्ति राघव ।
न चैकः पर्वतप्रख्यो जीवपिण्डोऽस्ति कश्चन ॥ १९ ॥
जीवशब्दार्थकलनाः समस्तकलनान्विताः ।
नेह काश्चन सन्तीति निश्चयोऽस्तु तवाचलः ॥ २० ॥
शुद्धचिन्मात्रममलं ब्रह्मास्तीह हि सर्वगम् ।
तद्यथा सर्वशक्तित्वाद्विन्दते याः स्वयं कलाः ॥ २१ ॥
चिन्मात्रानुक्रमेणैव संप्रफुल्ललतामिव।
ननु मूर्ताममूर्ता वा तामेवाशु प्रपश्यति ॥ २२ ॥
जीवो बुद्धिः क्रियास्पन्दो मनोद्वित्वैक्यमित्यपि ।
स्वसत्तां प्रकचन्तीं तां नियोजयति वेदने ॥ २३ ॥
साऽबुद्धैव भवत्येवं भवेद्ब्रह्मैव बोधतः।
अबोधः प्रेक्षया याति नाशं न तु प्रबुध्यते ॥ २४ ॥
यथान्धकारो दीपेन प्रेक्ष्यमाणः प्रणश्यति ।
न चास्य ज्ञायते तत्त्वमबोधस्यैवमेव हि ॥ २५ ॥
एवं ब्रह्मैव जीवात्मा निर्विभागो निरन्तरः ।
सर्वशक्तिरनाद्यन्तो महाचित्साररूपवान् ॥ २६ ॥
सर्वानणुतया त्वस्य न क्वचिद्भेदकल्पना ।
विद्यते या हि कलना सा तदेवानुभूतितः ॥ २७ ॥

महार्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया:

३.१४.१८  
वास्तव में एक भी जीव नहीं है। फिर जीवों का समूह या झुंड कहाँ से होगा? तुम्हारा “बहुत-से जीव हैं” कहना ठीक उसी तरह है जैसे कोई कहे कि “खरगोश के सींग” आकाश में उड़ रहे हैं—ऐसा कुछ है ही नहीं।

३.१४.१९  
हे राघव! जीव नाम की कोई चीज़ सचमुच नहीं है, इसलिए न जीवों का समुदाय है, न बहुत सारे जीवों से बना कोई विशाल पर्वत-सा ढेर है।

३.१४.२०  
“जीव” शब्द से मन में जो भी अर्थ और कल्पनाएँ उठती हैं, और उनसे जुड़ी सारी दूसरी कल्पनाएँ—इनमें से कुछ भी कहीं सचमुच नहीं है। यह बात तुम्हारे मन में पूरी तरह पक्की और अटल हो जाए।

३.१४.२१  
यहाँ केवल शुद्ध चैतन्य ही है—निर्मल, असीम चेतना, एकमात्र ब्रह्म जो सर्वत्र व्याप्त है। यही सर्वशक्तिमान ब्रह्म अपनी इच्छा से तरह-तरह के रूप और आभास (कला) धारण कर लेता है, जैसा स्वयं चाहता है।

३.१४.२२  
जैसे लता एक के बाद एक फूल खोलती जाती है, वैसे ही निराकार शुद्ध चैतन्य क्षणमात्र में अपने द्वारा रचे हुए साकार और निराकार रूपों को स्वयं ही देखता और अनुभव करता है—और वे सब वही स्वयं हैं।

३.१४.२३  
वही चैतन्य अपने आपको जीव, बुद्धि, कर्म की हल्की सी हलचल और “मैं-तू” के द्वैत भाव के रूप में प्रकट करता है, और फिर इन्हीं के द्वारा विषयों (विश्व) का अनुभव करता है।

३.१४.२४  
जब वह अपनी सच्ची प्रकृति को भूल जाता है, तब अज्ञानी जीव बन जाता है। जब जागता है और स्वयं को जान लेता है, तब वही ब्रह्म है। अज्ञान को केवल ध्यान से देखते ही वह गायब हो जाता है; उसे जगाने की जरूरत नहीं—वह अपने आप मिट जाता है।

३.१४.२५  
जैसे दीया जलाते ही अंधेरा पूरी तरह खत्म हो जाता है और बाद में उस अंधेरे का कोई पदार्थ नहीं मिलता, ठीक वही हाल “मैं अलग जीव हूँ” वाले अज्ञान का है—उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है; सच्चा ज्ञान चमकते ही वह लुप्त हो जाता है।

३.१४.२६  
इसलिए जीव और परमात्मा—दोनों केवल ब्रह्म ही हैं। वह खंड-रहित, अखंड, सर्वशक्तिमान, आदि-अनादि है, जिसका स्वरूप शुद्ध चैतन्य का महासागर है।

३.१४.२७  
ब्रह्म परमाणु से भी सूक्ष्म और सर्वव्यापी है, इसलिए उसमें कोई वास्तविक भेद या विभाग कल्पना भी नहीं की जा सकती। जो भी भेद दिखाई देता है, वही भेद जब सच्चे अनुभव में आता है तो केवल ब्रह्म ही होता है।

इन श्लोकों का सरल सार:
ये श्लोक अद्वैत वेदांत की सबसे ऊँची शिक्षा देते हैं—वास्तव में ब्रह्म के अलावा कोई अलग जीव नहीं है। एक जीव भी नहीं, बहुत सारे जीवों का समूह भी नहीं—यह सब खरगोश के सींग जैसी कल्पना मात्र है। “जीव” की कल्पना को गहराई से देखते ही पता चलता है कि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं।

केवल एक ही है—शुद्ध, असीम, निर्लेप चैतन्य (ब्रह्म)। अपनी अनंत लीला-शक्ति से वह स्वयं ही असंख्य रूप, शरीर, मन, जगत रच लेता है—बिल्कुल जैसे नींद में स्वप्न देखने वाला अपने ही मन में सारा स्वप्न-जगत बना लेता है। अज्ञान में ये सब सच्चे लगते हैं, पर हैं हमेशा ब्रह्म से अलग नहीं।

“मैं अलग जीव हूँ” यही अज्ञान है। यह अज्ञान अंधेरा है—कोई वास्तविक पदार्थ नहीं। ज्ञान का प्रकाश आते ही अपने आप मिट जाता है। जीव को सुधारने, बदलने या ब्रह्म बनाने की कोई जरूरत नहीं—जीव शुरू से अंत तक ब्रह्म ही था। कभी कोई वास्तविक बंधन, सीमा या भेद था ही नहीं।

अंतिम शिक्षा: जो भी भेद या अलगपन दिख रहा है, वह सच्चे ज्ञान में केवल ब्रह्म ही है। इस बात को अटल कर लो—केवल शुद्ध चैतन्य ही है, और मैं वही हूँ। यह सत्य जब डगमगाता नहीं, तब सारे बंधन सदा के लिए खत्म हो जाते हैं और तुम अनंत, शांत, सदा-मुक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हो।

Monday, November 17, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ११–१७

योग वशिष्ठ ३.१४.११–१७  
(क्योंकि कोई वास्तविक सहायक कारण मौजूद नहीं है, इसलिए वही एक चेतना [चैतन्य] ही कारण भी है और कार्य भी है; कभी कोई दूसरी वस्तु होती ही नहीं है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संकल्प एव संकल्पात्किलैति क्ष्मादिवर्जितः ।
आदिमादिव निःशून्यः स्वप्नात्स्वप्नान्तरं यथा ॥ ११ ॥
अस्मादेकप्रतिस्पन्दाज्जीवाः संप्रसरन्ति ये ।
सहकारिकारणानामभावाच्च स एव ते ॥ १२ ॥
सहकारिकारणानामभावे कार्यकारणम्।
एकमेतदतो नान्यः परस्मात्सर्गविभ्रमः ॥ १३ ॥
ब्रह्मवाद्यो विराडात्मा विराडात्मेव सर्गता ।
जीवाकाशः स एवेत्थं स्थितः पृथ्व्याद्यसद्यतः ॥ १४ ॥

श्रीराम उवाच ।
किं स्यात्परिमितो जीवो राशिराहो अनन्तकः ।
आहोस्विदस्त्यनन्तात्मा जीवपिण्डोऽचलोपमः ॥ १५ ॥
धाराः पयोमुच इव शीकरा इव वारिधेः।
कणास्तप्तायस इव कस्मान्निर्यान्ति जीवकाः ॥ १६ ॥
इति मे भगवन्ब्रूहि जीवजालविनिर्णयम् ।
ज्ञातमेतन्मया प्रायस्तदेव प्रकटीकुरु ॥ १७ ॥

३.१४.११  
महर्षि वशिष्ठ बोले – केवल शुद्ध संकल्प ही, मात्र कल्पना करने से, यह सारा जगत बन जाता है जिसमें न तो पृथ्वी है और न कोई ठोस वस्तु ही है। इसका न आदि वास्तविक है, न मध्य वास्तविक है, फिर भी यह बिल्कुल खाली भी नहीं है। बिल्कुल वैसे ही जैसे एक नींद में एक स्वप्न अपने आप दूसरा स्वप्न बन जाता है।

३.१४.१२  
उस एकमात्र संकल्प-स्पंदन से ही असंख्य जीव फैलकर प्रकट होते हैं। चूँकि कोई अन्य सहायक कारण बिल्कुल भी मौजूद नहीं है, इसलिए वही संकल्प अकेला उन जीवों का रूप हो जाता है।

३.१४.१३  
जब कोई सहायक कारण नहीं होते, तब वही एक संकल्प स्वयं ही कारण भी बनता है और कार्य भी। इसलिए केवल यही एक है, दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। बाहर से कोई सृष्टि रचने वाला है – यह विचार केवल भ्रम ही है।

३.१४.१४  
जिस परम ब्रह्म की बात बड़े-बड़े ज्ञानी करते हैं, वही विराट् है। सारा जगत-प्रपंच उसी विराट् का ही दिखना है। जीव तो आकाश-समान चैतन्य मात्र है। इस प्रकार वह जैसा है वैसा ही रहता है, और पृथ्वी आदि जो कुछ भी दिखाई देता है वह सब सर्वथा असत् (अवास्तविक) है।

३.१४.१५  
श्रीराम ने कहा – हे भगवन, क्या जीव बहुत छोटा-सा सीमित गठ्ठर जैसा है, या वह अनंत है? या एक ही अनंत चैतन्य-पिंड है जो विशाल पर्वत की तरह अचल है?

३.१४.१६  
फिर उससे निरंतर असंख्य जीव क्यों नहीं निकलते रहते – जैसे बादल से धाराएँ, समुद्र से जल-कण, या लाल-लोहे से चिंगारियाँ उड़ती रहती हैं?

३.१४.१७  
हे पुण्यशील प्रभु! यह जीवों का विशाल जाल वास्तव में कैसे चलता है, इसे स्पष्ट-स्पष्ट बताइए। मैंने इसका अधिकांश भाग समझ लिया है, किंतु शेष बचा हुआ भाग भी पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दीजिए।

श्लोकों का सरल सार:
इन श्लोकों में महर्षि वशिष्ठ सबसे शुद्ध अद्वैत वेदांत सिखा रहे हैं – यह सारा संसार, सभी शरीर-मन सहित, केवल अनंत चेतना के एक कल्पना के विचार (संकल्प) से ही उत्पन्न होता है। जैसे एक ही नींद में बिना किसी बाहरी सामग्री या कारण के एक स्वप्न अपने आप दूसरा स्वप्न बन जाता है, वैसे ही यह पूरा विश्व केवल चेतना की कल्पना से प्रकट होता है। कोई वास्तविक पृथ्वी, जल या पदार्थ नहीं है; सब शून्य है, फिर भी कल्पना के कारण भरा-भरा दिखता है।

जब मन पूछता है कि जीव कितने हैं, तो वशिष्ठ जी कहते हैं – वास्तव में तो केवल एक ही चेतना है। उसके एक स्पंदन से असंख्य जीव दिखते हैं, पर इसके लिए न समय चाहिए, न स्थान, न कोई दूसरा पदार्थ। वही एक चेतना स्वयं ही सब जीव बन जाती है – जैसे एक ही सागर बिना किसी दूसरी चीज़ की मदद के असंख्य लहरें बन जाता है।

चूँकि कोई वास्तविक सहायक कारण मौजूद नहीं है, इसलिए वही एक चेतना कारण भी है और कार्य भी; दूसरी कोई वस्तु कभी होती ही नहीं। बाहर कोई ईश्वर या शक्ति सृष्टि बनाती है – यह विचार केवल अज्ञान से पैदा हुआ भ्रम है। सच्चाई यह है कि ब्रह्म, विराट् और जीव में कोई अंतर नहीं। जीव तो शुद्ध आकाश-समान चेतना है; पृथ्वी-पर्वत-शरीर आदि जो दिखते हैं, वे सब स्वप्न के पदार्थों की तरह पूर्णतः अवास्तविक हैं।

राम जी फिर एक स्वाभाविक संदेह पूछते हैं – अगर सब कुछ एक अनंत चेतना है, तो क्या जीव छोटा-सा सीमित टुकड़ा है, या अनंत आकाश जैसा है, या एक ही विशाल अचल चैतन्य-पर्वत है जिससे जीवों की धाराएँ निरंतर निकलनी चाहिए जैसे बादल से बारिश या लोहे से चिंगारियाँ?

आगे के श्लोकों में वशिष्ठ जी इसका उत्तर देंगे कि जीव न तो सीमित है, न अनेक हैं – केवल एक अनंत चेतना ही कल्पित उपाधि (घटाकाश की तरह) से अनेक दिखती है। ये श्लोक दृढ़ता से स्थापित करते हैं कि न संसार का जन्म वास्तविक है, न जीवों की भीड़ – यह सब एक अचल ब्रह्म की कल्पना-लीला मात्र है। इसे जान लेने से सारा दुख-संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

Sunday, November 16, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक १–१०

योग वशिष्ठ ३.१४.१–१०  
(इस एक स्रोत से, सभी आत्माएँ एक चमकती हुई पंक्ति में प्रकट होती हैं, एक के बाद एक रोशनी करती हुईं)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्थं जगदहंतादिदृश्यजातं न किंचन ।
अजातत्वाच्च नास्त्वेव यच्चास्ति परमेव तत् ॥ १ ॥
परमाकाशमेवादौ जीवतां चेतति स्वयम् ।
निःस्पन्दाम्भोधिकुहरे सलिलं स्पन्दतामिव ॥ २ ॥
आकाशरूपमजहदेवं वेत्तीव हृद्यताम् ।
स्वप्नसंकल्पशैलादाविव चिद्वृत्तिरान्तरी ॥ ३ ॥
पृथ्व्यादिरहितो देहो यो विंराडात्मको महान् ।
आतिवाहिक एवासौ चिन्मात्राच्छनभोमयः ॥ ४ ॥
अक्षयः स्वप्नशैलाभः स्थिरस्वप्नपुरोपमः ।
चित्रकृत्स्थिरचित्तस्थचित्रसैन्यसमाकृतिः ॥ ५ ॥
अनिखातमहास्तम्भपुत्रिकौघसमोपमः ।
ब्रह्माकाशेऽनिखातात्मा सुस्तम्भे शालभञ्जिका ॥ ६ ॥
आद्यः प्रजापतिः एवं स्वयंभूरिति विश्रुतः ।
प्राक्तनानां स्वकार्याणामभावादप्यकारणः ॥ ७॥
महाप्रलयपर्यन्तेष्वाद्यकालपितामहाः ।
मुच्यन्ते सर्व एवातः प्राक्तनं कर्म तेषु किम् ॥ ८ ॥
सोऽकुड्य एव कुड्यात्मा दृश्यादृश्यः स्वयंस्थितः ।
न च दृश्यं न च द्रष्टा न स्रष्टा सर्वमेव च ॥ ९ ॥
प्रतिशब्दपदार्थानां सर्वेषामेष एव सः ।
तस्मादुदेति जीवाली दीपाली दीपकादिव ॥ १० ॥

महारिषि वशिष्ठ ने कहा:
३.१४.१: इस प्रकार “मैं” और सभी दिखने वाली चीजों वाला संसार बिल्कुल कुछ भी नहीं है। क्योंकि यह कभी जन्मा ही नहीं, इसलिए यह थोड़ा भी नहीं है। जो सचमुच है, वह केवल परम सत्य है।

३.१४.२: सर्वप्रथम परम आकाश स्वयं ही सोचता है और जीवात्माएँ बन जाता है, जैसे शांत गुफा में स्थिर समुद्र का जल हिलता हुआ दिखता है और लहरें बनाता है।

३.१४.३: यह आकाश का रूप लेता है पर अपनी सच्ची प्रकृति नहीं छोड़ता। यह हृदय में चीजों को जानता हुआ लगता है, जैसे स्वप्न, इच्छा या कल्पना में बने ऊँचे पर्वतों का भीतरी काम।

३.१४.४: महान राजा-जैसी आत्मा का शरीर न पृथ्वी का है न अन्य तत्वों का। मृत्यु के बाद ले जाने वाला केवल सूक्ष्म शरीर है। यह शुद्ध चेतना से बना है, जैसे मुलायम बर्फ।

३.१४.५: यह कभी समाप्त नहीं होता, जैसे स्वप्न का पर्वत। यह स्थिर है जैसे स्वप्न का नगर। यह शांत चित्रकार के मन में खड़े चित्रित सैनिकों-सा दिखता है।

३.१४.६: यह नींव-रहित बड़े खंभों के चारों ओर गुड़िया-बच्चों की भीड़-सा है। परम आकाश में आत्मा का कोई निश्चित स्थान नहीं। यह मजबूत खंभे पर टिकी लकड़ी की नक्काशीदार कन्या-सी है।

३.१४.७: लोगों का पहला स्रष्टा, स्वयंभू कहलाता है, ऐसा ही है। उसके लिए कोई कारण नहीं, भले ही उसके लिए पूर्व कर्म गायब हों।

३.१४.८: समय के पहले दादा, जो महाप्रलय तक टिकते हैं, सभी मुक्त हैं। तो उनके लिए कौन-से पूर्व कर्म हो सकते हैं?

३.१४.९: वह अकेला दीवार-जैसी आत्मा बनकर रहता है। वह दिखता भी है और नहीं भी। न देखने वाली कोई चीज है, न देखने वाला, न स्रष्टा—सब कुछ वही अकेला है।

३.१४.१०: वह हर शब्द और हर चीज का सच्चा अर्थ है। उसी से जीवात्माओं की पंक्ति उठती है, जैसे एक दीपक से एक के बाद एक दीपक जलते जाते हैं।

शिक्षा का सारांश:
ये श्लोक बताते हैं कि हम जो संसार देखते हैं—अपना “मैं” और सारी वस्तुएँ—वह सच में किसी भी तरह वास्तविक नहीं है। इसका जन्म ही नहीं हुआ, इसलिए यह बिल्कुल नहीं है। जो वास्तव में है, वह केवल परम सत्य है—शुद्ध और अपरिवर्तनीय। यह शिक्षा हमें समझाती है कि जो ठोस और स्थायी लगता है, वह केवल माया है, जैसे मरुस्थल में मरीचिका। इसे देखकर हम झूठी धारणाओं को छोड़ देते हैं और अपरिवर्तनीय सत्य में शांति पाते हैं।

परम सत्य, अनंत आकाश की तरह, स्वयं ही जागता है और सभी जीवात्माएँ बन जाता है। पहले शांत और स्थिर, जैसे शांत समुद्र का जल, फिर जीवन की लहरें बनाता हुआ दिखता है। इससे पता चलता है कि आत्माएँ उस एक सत्य से अलग नहीं—बिना किसी बाहरी सहाये के उसी से निकलती हैं। मन भीतर से काम करता है जैसे स्वप्न की कल्पना या इच्छा में विचार, हृदय में जानने का अहसास देता है, पर अपनी आकाश-सरीखी प्रकृति कभी नहीं छोड़ता।

आत्मा का महान राजा-समान शरीर न पृथ्वी, न जल, न अग्नि आदि तत्वों से बना है। मृत्यु के बाद ले जाने वाला केवल सूक्ष्म शरीर है, जो शुद्ध चेतना से निर्मित है—ताज़ी बर्फ-सा कोमल और सफ़ेद। यह शरीर कभी नष्ट नहीं होता, स्वप्न-पर्वत या स्वप्न-नगर-सा दृढ़। यह स्थिर कलाकार द्वारा रंगे खड़े सैनिकों-सा दिखता है। या नींव-रहित ऊँचे खंभों के इर्द-गिर्द गुड़िया-बच्चों की भीड़-सा। परम आकाश में आत्मा का कोई स्थिर स्थान नहीं, जैसे मजबूत खंभे पर टिकी सुंदर लकड़ी की नक्काशी।

पहला स्रष्टा, स्वयंभू प्रभु, इसी स्वरूप का है। उसे किसी कारण की ज़रूरत नहीं क्योंकि शुरू में कोई पूर्व कर्म नहीं। सृष्टि के आदि दादा, जो अनेक महाप्रलय तक जीवित रहते हैं, पूर्ण मुक्त हैं। उनके लिए कोई पुराना कर्म नहीं बाँधता। अर्थात् शुद्ध आरंभ में सब कुछ नया और बंधन-रहित है।

अंत में परम सत्य अकेला आत्मा की दीवार बनकर रहता है—देखा भी जाता है और नहीं भी। न कोई दृश्य है, न द्रष्टा, न स्रष्टा—सब वही एक है। वह हर ध्वनि, शब्द और वस्तु का छिपा सच्चा अर्थ है। इसी एक स्रोत से सभी आत्माएँ चमकती पंक्ति में प्रकट होती हैं, जैसे एक दीपक से एक के बाद एक दीपक जलते जाते हैं। यह पूर्ण एकता की शिक्षा देती है और अलगाव की सारी कल्पनाएँ समाप्त कर देती है।

Saturday, November 15, 2025

अध्याय ३.१३, श्लोक ४४–५४

योग वशिष्ठ ३.१३.४४–५४  
(ब्रह्म ही विश्व में अकेला है, जो अपने आप में शुद्ध रूप से, अपने आप से, अपने आप के रूप में चमकता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अनाद्यनुभवस्त्वित्थं योऽत्रास्ति वनिकादिके ।
स्वप्नानुभूतं पृथ्व्यादि प्रबोधे यादृशं भवेत् ॥ ४४ ॥
स्मृतः स व्योममात्रात्मा सर्वदैव स्मृतं जगत् ।
यत्र यत्र यथा तोये द्रवत्वं नाम भिद्यते ॥ ४५ ॥
तत्र तत्र तथा नान्यः सर्गोऽस्ति परमात्मनि ।
सृष्टिरेवमियं प्रौढा सम एव त्वयं स्थितः ॥ ४६ ॥
भात्येवं नाम ब्रह्माण्डं व्योमात्मेवातिनिर्मलम् ।
दृश्यमेवमिदं शान्तं स्वात्मनिर्मितविभ्रमम् ॥ ४७ ॥
निराधारं निराधेयमद्वैतं चैक्यवर्जितम् ।
जगत्संविदि जातायामपि जातं न किंचन ॥ ४८ ॥
परमाकाशमाशून्यमच्छमेव व्यवस्थितम् ।
सर्वसंसारता नास्ति यदेव तदवस्थितम् ॥ ४९ ॥
नाधेयं तत्र नाधारो न दृश्यं न च द्रष्टृता।
ब्रह्माण्डं नास्ति न ब्रह्मा न च वैतण्डिका क्वचित् ॥ ५० ॥
न जगन्नापि जगती शान्तमेवाखिलं स्थितम् ।
ब्रह्मैव कचति स्वच्छमित्थमात्मात्मनात्मनि ॥ ५१॥
चित्त्वाद्द्रवत्वात्सलिलमिवावर्ततयात्मनि ।
असदेवेदमाभाति सदिवेहानुभूयते ॥ ५२ ॥
विनश्यत्यसदेवान्ते स्वप्ने स्वमरणं यथा ।
अथवा स्वस्वरूपत्वात्सदेवेदमनामयम् ।
अखण्डितमनाद्यन्तं ज्ञानमात्राम्बरोदरम् ॥ ५३ ॥
आकाश एव परमे प्रथमः प्रजेशो नित्यं स्वयं कचति शून्यतया समो यः ।
स ह्यातिवाहिकवपुर्नतु भूतरूपी पृथ्व्यादि तेन न सदस्ति यथा न जातम् ॥ ५४ ॥

महर्षि वशिष्ठ ने निष्कर्ष निकाला:
३.१३.४४: व्यापारी आदि के लिए इस प्रकार चलने वाला अनंत अनुभव ठीक वैसा ही है जैसे स्वप्न में देखी गई पृथ्वी आदि वस्तुएँ। जागने पर वे खाली आकाश के सिवा कुछ नहीं रह जातीं। उसी तरह याद किया हुआ सारा संसार सदा शुद्ध खाली चेतना के सिवा कुछ नहीं है।

३.१३.४५: संसार शुद्ध आकाश-जैसी चेतना के रूप में याद किया जाता है। जैसे जल की द्रवता जहाँ-कहीं और जैसे-जैसे दिखे, जल से अलग नहीं होती, वैसे ही परम आत्मा से अलग कोई सृष्टि नहीं है।

३.१३.४६: इस प्रकार पूरी तरह विकसित और परिपक्व यह सृष्टि है, फिर भी आप वही के वही, अपरिवर्तित रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्मांड अत्यंत शुद्ध आकाश-जैसी चेतना के सिवा कुछ नहीं दिखता।

३.१३.४७: यह दिखने वाला संसार शांत और नीरव है, अपने ही आत्मा द्वारा बनाया हुआ भ्रम मात्र। इसका कोई आधार नहीं, कुछ रखने की जगह नहीं, कोई द्वैत नहीं और न ही किसी के साथ एकता का भाव।

३.१३.४८: संसार की चेतना उठने पर भी वास्तव में कुछ पैदा नहीं हुआ। परम आकाश खाली, शुद्ध और अपरिवर्तित है। संसार का कोई चिह्न नहीं; केवल वही जैसा है वैसा रहता है।

३.१३.४९: उसमें कुछ रखने को नहीं, कोई आधार नहीं, कोई दृश्य नहीं और कोई द्रष्टा नहीं। न कोई ब्रह्मांड है, न स्रष्टा ब्रह्मा, न कहीं कोई मायावी खेल।

३.१३.५०: न संसार है न पृथ्वी; सब कुछ पूरी तरह शांत और स्थिर है। ब्रह्म ही इस प्रकार अपने में, अपने से, अपने रूप में शुद्ध चमकता है।

३.१३.५१: मन की प्रकृति से जैसे जल में अपने ही भीतर भँवर दिखते हैं, वैसे ही यह असत्य संसार यहाँ सत्य-सा चमकता है और ऐसा ही अनुभव किया जाता है।

३.१३.५२: अंत में असत्य स्वप्न में अपनी मृत्यु की तरह गायब हो जाता है। या फिर यह वास्तव में अपना स्वरूप होने से यह संसार सदा रोग-रहित, अखंड, आदि-अनंत और चेतना के आकाश में केवल शुद्ध ज्ञान से भरा रहता है।

३.१३.५३: यह अखंड, आदि-अनंत, केवल शुद्ध ज्ञान से बना है और चेतना के विशाल आकाश को भरता है।

३.१३.५४: परम सत्य में सबसे पहला प्रभु सभी प्राणियों का स्वामी केवल शुद्ध आकाश ही है। वह सदा अपने आप चमकता है, पूरी तरह अकेला, पूर्ण शून्य में, सदा वही और अपरिवर्तित। उस प्रभु का केवल शुद्ध चेतना का सूक्ष्म शरीर है—मिट्टी आदि भौतिक तत्वों का स्थूल शरीर नहीं। इसलिए उसके द्वारा कभी कुछ सत्य पैदा नहीं होता, जैसे कुछ कभी वास्तव में जन्म नहीं लेता।

शिक्षाओं का सार:
ये श्लोक संसार के अनुभव को स्वप्न से तुलना करके शुरू होते हैं। जैसे स्वप्न में देखी पृथ्वी आदि वस्तुएँ जागने पर खाली आकाश मात्र रह जाती हैं, वैसे ही याद किया हुआ सारा संसार शुद्ध चेतना के सिवा कुछ नहीं है। यह चेतना आकाश-जैसी है—विशाल, निराकार और अपरिवर्तित। हम जो सृष्टि देखते हैं वह परम आत्मा के बाहर अलग घटना नहीं है; यह आत्मा ही विभिन्न रूपों में दिखता है, जैसे जल को उसकी द्रवता से अलग नहीं किया जा सकता। संसार जहाँ-कहीं और जैसे-जैसे उठे, वह एक सत्य से कभी अलग नहीं होता।

शिक्षा जोर देती है कि पूरी तरह विकसित ब्रह्मांड भी वही अछूता आत्मा है। ब्रह्मांड शुद्ध, निष्कलंक चेतना के रूप में चमकता है। जो हम संसार देखते हैं वह शांत, स्वयं-निर्मित भ्रम है—बिना किसी आधार के, बिना किसी वस्तु के, बिना द्वैत या जबरन एकता के। मन को संसार का बोध होने पर भी वास्तव में कुछ नया पैदा नहीं हुआ। परम आकाश खाली और स्वच्छ रहता है, संसार की सभी गतिविधियों से मुक्त। केवल एक सत्य रहता है।

इस परम सत्य में न कोई पात्र है, न सामग्री, न दृश्य और न द्रष्टा। ब्रह्मांड, स्रष्टा-देवता ब्रह्मा और सारा नाटकीय खेल अनुपस्थित हैं। संसार और उसका आधार नहीं हैं; सब कुछ पूर्णतः स्थिर है। ब्रह्म ही अपने में, अपने द्वारा, अपने रूप में स्पष्ट चमकता है। मन की प्रकृति से असत्य सत्य-सा दिखता है, जैसे जल में भँवर बनते हैं पर जल से अलग नहीं होते। यह दिखावा ठोस अनुभव होता है, पर खाली है।

असत्य अंत में स्वप्न में मृत्यु की तरह गायब हो जाता है। या फिर संसार को अपना सच्चा स्वरूप जानकर उसे सदा शुद्ध, अखंड, आदि-अनंत—चेतना के आकाश में शुद्ध ज्ञान से भरा पाते हैं। पहला स्रष्टा आकाश ही है, शून्य में सदा चमकता, सूक्ष्म चेतना-शरीर वाला, भौतिक रूप नहीं। इससे कुछ सत्य पैदा नहीं होता; कुछ कभी वास्तव में जन्म नहीं लेता।

ये श्लोक साधक को मार्गदर्शन देते हैं कि संसार को अपरिवर्तित चेतना के भीतर स्वयं-निर्मित, हानिरहित दिखावा समझें। इसे समझकर व्यक्ति शांत, अद्वैत सत्य में विश्राम करता है जहाँ न सृष्टि, न विनाश, न पृथकता कभी होती है।

Friday, November 14, 2025

अध्याय ३.१३, श्लोक ३६–४३

योगवशिष्ठ ३.१३.३६–४३  
(सृष्टि केवल सृष्टिकर्ता के अपने विचार से आकार ली हुई स्मृति है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आत्मगर्भगृहं चित्ताद्यथासंकल्पमात्मनः ।
देशकालक्रियाद्रव्यकल्पनावेदनं स तत् ॥ ३६ ॥
भावयञ्छब्दनिर्माता शब्दैर्बध्नाति कल्पितैः ।
आतिवाहिकदेहोऽसावित्यसत्यजगद्भ्रमे ॥ ३७ ॥
असत्य एव कचति स्वप्ने खोड्डयनं यथा ।
इत्यनुत्पन्न एवासौ स्वयंभूः स्वयमुत्थितः ॥ ३८ ॥
आतिवाहिकदेहात्मा प्रभुराद्यः प्रजापतिः ।
एतस्मिन्नपि संपन्ने ब्रह्माण्डाकारिणि भ्रमे ॥ ३९ ॥
न किंचिदपि संपन्नं न च जातं न दृश्यते ।
तद्ब्रह्माकाशमाकाशमेव स्थितमनन्तकम् ॥ ४० ॥
संकल्पनगराकारमेतत्सदपि नैव सत् ।
अनिर्मितमरागं च एतद्वै चित्रमुत्थितम् ॥ ४१ ॥
अकृतं चानुभूतं च न सत्यं सत्यवत्स्थितम् ।
महाकल्पे विमुक्तत्वाद्ब्रह्मादीनामसंशयम् ॥ ४२॥
स्मृतिर्न प्राक्तनी काचित्कारणं वा स्वयंभुवः ।
तेन यादृक्स्वयंभूः स्यात्तादृक्तज्जमिदं स्मृतम् ॥ ४३ ॥

महर्षि वशिष्ठ ने आगे कहा:
३.१३.३६: मन सच्चे स्व: के भीतर एक कमरे जैसा है। स्व: ही स्थान, काल, कर्म और वस्तुओं की कल्पना करता है। स्व: इन कल्पित कल्पनाओं को सत्य मानकर अनुभव करता है।

३.१३.३७: कोई ध्वनियों की कल्पना करता है और उन्हें उत्पन्न करता है। फिर वही कल्पित ध्वनियाँ उसे बाँध लेती हैं। यह सूक्ष्म शरीर जो जीवन-पर-जीवन भावनाएँ ढोता है, वैसा ही है। यह सब विश्व की मिथ्या धारणा में घटित होता है।

३.१३.३८: कोई मिथ्या स्वप्न में आकाश में उड़ते हुए चमकती है। ठीक उसी प्रकार यह स्वयंभू सृष्टिकर्ता कभी वास्तव में जन्मा ही नहीं। वह स्व: ही उदित होता है।

३.१३.३९: इस स्वयंभू सृष्टिकर्ता का सूक्ष्म शरीर है। वह आदि प्रभु है, समस्त प्राणियों का पिता। जब यह महान् भ्रम सम्पूर्ण विश्वरूप में विकसित हो जाता है,

३.१३.४०: तब भी कुछ भी वास्तव में घटित नहीं हुआ। कुछ भी जन्मा नहीं। कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं। केवल महास्व: का अनन्त आकाश ही रहता है, शून्य आकाश की भाँति।

३.१३.४१: यह विचारों द्वारा निर्मित नगरी-सा प्रतीत होता है। यद्यपि सत्य-सा लगता है, किन्तु सर्वथा असत्य है। इसका कोई कर्ता नहीं। इसमें राग-द्वेष की दृढ़ता नहीं। फिर भी यह आश्चर्यजनक ढंग से उदित होता है।

३.१३.४२: यह निर्मित नहीं, फिर भी अनुभूत होता है। यह सत्य नहीं, किन्तु सत्य-सा खड़ा है। विश्व के महाप्रलय काल में सृष्टिकर्ता आदि देवता भी मुक्त हो जाते हैं। यह निश्चित है।

३.१३.४३: स्वयंभू सृष्टिकर्ता को कोई प्राचीन स्मृति नहीं, कोई कारण नहीं। अतः वह जो कुछ भी बन जाता है, उससे उत्पन्न विश्व भी उसी प्रकार स्मरण किया जाता है।

उपदेशों का सारांश:
ये श्लोक सिखाते हैं कि मन सर्वोच्च स्व: के भीतर ही सब कुछ रचता है। स्थान, काल, कर्म और वस्तुओं की कल्पनाएँ केवल स्वयं के विचारों से उत्पन्न होती हैं। स्व: इन कल्पनाओं को सत्य मानकर अनुभव करता है, किन्तु वे सत्य नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विश्व मन द्वारा रचित विचार-चित्र मात्र है।

श्लोक बताते हैं कि विचार मनुष्य को कैसे बाँधते हैं। कोई ध्वनि या रूप की कल्पना करता है, तो वही कल्पना उसे बाँध लेती है। एक जीवन से दूसरे जीवन तक भावनाएँ ले जाने वाला सूक्ष्म शरीर भी ऐसा ही है। यह सब सत्य विश्व की मिथ्या धारणा में घटित होता है। स्व: के बाहर कुछ भी वास्तव में विद्यमान नहीं।

स्वयंभू सृष्टिकर्ता बिना किसी वास्तविक जन्म के प्रकट होता है, जैसे स्वप्न में आकाश-यात्रा करने वाला पात्र। वह सूक्ष्म शरीर वाला आदि प्रभु और समस्त प्राणियों का पिता है। जब भ्रम सम्पूर्ण विश्व बन जाता है, तब भी कुछ भी वास्तव में नहीं हुआ। केवल अनन्त स्वयं ही रहता है, सीमारहित शुद्ध शून्य आकाश की भाँति।

विश्व कल्पना द्वारा निर्मित नगरी-सा दिखता है, किन्तु कभी सत्य नहीं। इसका कोई रचयिता नहीं, कोई दृढ़ राग-द्वेष नहीं, फिर भी यह आश्चर्यजनक रूप से उदित होता है। यह निर्मित न होने पर भी अनुभूत होता है, असत्य होते हुए भी सत्य-सा खड़ा है। विश्व के महाप्रलय में सृष्टिकर्ता आदि देवता भी मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि सब कुछ सदा शून्य था।

स्वयंभू सृष्टिकर्ता को न कोई प्राचीन स्मृति है, न कोई कारण। वह जो कुछ बन जाता है, उससे उत्पन्न विश्व भी ठीक उसी प्रकार स्मरण किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि सम्पूर्ण सृष्टि केवल सृष्टिकर्ता के अपने विचार से आकार ली हुई स्मृति मात्र है, बिना किसी बाहरी कारण या आदि के।

Thursday, November 13, 2025

अध्याय ३.१३, श्लोक २६–३५

योग वशिष्ठ ३.१३.२६–३५  
(जीव का आंतरिक आकाश, मन, हृदय, ज्ञान और सच्ची सत्ता को एक छोटे से खोल में रखता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वप्नसंकल्पयोः संविद्वेत्त्येतज्जीवकोऽणुके ।
स्वरूपतारकान्तस्थो जीवोऽयं चेतति स्वयम् ॥ २६ ॥
तदेतद्बुद्धिचित्तादिज्ञानसत्तादिरूपकम् ।
जीवाकाशः स्वतस्तत्र तारकाकाशकोशगम् ॥ २७ ॥
प्रेक्षेऽहमिति भावेन द्रष्टुं प्रसरतीव खे ।
ततो रन्ध्रद्वयेनैव भाविबाह्याभिधं पुनः ॥ २८ ॥
येन पश्यति तन्नेत्रयुगं नाम्ना भविष्यति ।
येन स्पृशति सा वै त्वग्यच्छृणोति श्रुतिस्तु सा ॥ २९ ॥
येन जिघ्रति तद्घ्राणं स स्वमात्मनि पश्यति ।
तत्तस्य स्वदनं पश्चाद्रसना चोल्लसिष्यति ॥ ३० ॥
स्पन्दते यत्स तद्वायुश्चेष्टा कर्मेन्द्रियव्रजम् ।
रूपालोकमनस्कारजातमित्यपि भावयत् ॥ ३१ ॥
आतिवाहिकदेहात्मा तिष्ठत्यम्बरमम्बरे ।
एवमुच्छूनतां तस्मिन्भावयंस्तेजसः कणे ॥ ३२ ॥
असत्यां सत्यसंकाशां ब्रह्मास्ते जीवशब्दवत् ।
इत्थं स जीवशब्दार्थः कलनाकुलतां गतः ॥ ३३ ॥
आतिवाहिकदेहात्मा चित्तदेहाम्बराकृतिः ।
स्वकल्पनान्त आकारमण्डं संस्थं प्रपश्यति ॥ ३४ ॥
कश्चिज्जलगतं वेत्ति कश्चित्सम्राट्स्वरूपिणम् ।
भाविब्रह्माण्डकलनां पश्यत्यनुभवत्यपि ॥ ३५ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे कहते हैं:
३.१३.२६: स्वप्नों में और अपने बनाए विचारों में, चेतना की छोटी-सी चिंगारी एक बहुत छोटे जीव के अंदर सब कुछ जानती है। यह जीव अपनी सच्ची सूरत में रहता है, सब कुछ खत्म होने तक चमकते तारों तक, और खुद सोचता-महसूस करता है।

३.१३.२७: यह सब – मन, हृदय, ज्ञान, जो सच में है, और ऐसी चीजें – इसी तरह आकार लेती हैं। जीव का आकाश स्वाभाविक रूप से अंदर छिपा रहता है, जैसे छोटे खोल में तारों भरा आकाश।

३.१३.२८: “मैं देख रहा हूँ” की भावना से यह खुली आकाश में फैलकर देखने लगता है। फिर दो छोटे छिद्रों (आँखों) से बाहर की दुनिया की योजना बनाता है जो बाद में आएगी।

३.१३.२९: देखने के लिए जो जोड़ी इस्तेमाल करता है, उसे दो आँखें कहेंगे। छूने के लिए जो त्वचा है, वह त्वचा है। सुनने के लिए जो है, वह सुनना है।

३.१३.३०: सूँघने के लिए जो नाक है, वह नाक है। वह अपने अंदर खुद को देखता है। उसके बाद अपना मुँह प्रकट होता है, और स्वाद के लिए जीभ चमकती है।

३.१३.३१: जो चलता है वह अंदर की हवा है, और काम करने वाले अंगों के समूह से कर्म होते हैं। इसी तरह आकार, प्रकाश और मन का ध्यान भी एक साथ आते हैं।

३.१३.३२: सूक्ष्म शरीर धारण करने वाला आत्मा आकाश में पानी की तरह रहता है। उसी तरह सूक्ष्म शरीर में आग की छोटी चिंगारी को फूलते हुए सोचो।

३.१३.३३: यद्यपि यह सच्चा नहीं है, फिर भी सच जैसा लगता है, जैसे “जीव” शब्द ब्रह्म के लिए खड़ा है। इस तरह “जीव” शब्द का अर्थ कल्पनाओं से भर जाता है और घुल-मिल जाता है।

३.१३.३४: सूक्ष्म शरीर वाला आत्मा मन से बने आकाश जैसा दिखता है। अपनी कल्पना के अंत में वह आकारों का पूरा चक्कर खड़ा देखता है।

३.१३.३५: एक तरह का जीव सिर्फ अपने पानी को जानता है। दूसरी तरह का, अपनी सच्ची सूरत में महाराजा जैसा, पूरे ब्रह्मांड अंडे की भविष्य योजना देखता और अनुभव करता है।

शिक्षा का सार:
ये श्लोक बताते हैं कि छोटा-सा जीव स्वप्नों और विचारों में अपनी दुनिया खुद बनाता है। जीव की चेतना सब कुछ खुद जानती है, भले ही बहुत छोटी जगह में रहती है। यह चेतना चिंगारी की तरह अपनी सच्ची प्रकृति से तारों तक चमकती है। शिक्षा दिखाती है कि सोचने-महसूस करने के लिए जीव को बाहर कुछ नहीं चाहिए – सब खुद करता है।

फिर श्लोक जीव के आंतरिक आकाश का वर्णन करते हैं। यह आकाश मन, हृदय, ज्ञान और सच्ची सत्ता रखता है। यह छोटे खोल जैसा है जिसमें पूरा तारों भरा आकाश है। इसी आकाश से जीव बाहर की दुनिया कल्पना शुरू करता है। “मैं देखना चाहता हूँ” महसूस कर चेतना दो छिद्रों (बाद में आँखें) से फैलती है। इसी तरह बाकी इंद्रियाँ बनाता है – छूने के लिए त्वचा, सुनने के लिए कान, सूँघने के लिए नाक, स्वाद के लिए जीभ, और कर्मों के लिए चलती हवा।

फिर श्लोक बताते हैं कि सूक्ष्म शरीर कैसे बनता है। यह ठोस नहीं, आकाश में तैरता पानी या छोटी आग जो बड़ी हो जाती है। जीव इंद्रियाँ, प्रकाश, आकार और मन का ध्यान कल्पना से बनाता है। सब कदम-दर-कदम उसकी कल्पना से आता है। यद्यपि सूक्ष्म शरीर और उसकी दुनिया सच्ची नहीं, फिर भी सच लगती है, जैसे “जीव” शब्द अपरिवर्तित ब्रह्म की ओर इशारा करता है पर अलग व्यक्ति लगता है।

फिर शिक्षा कहती है कि जीव अपनी कल्पनाओं में खो जाता है। सूक्ष्म शरीर मन से बने आकाश जैसा है, और कल्पनाओं में आकारों का पूरा चक्कर – पूरा ब्रह्मांड – देखता है। कुछ जीव सिर्फ अपना छोटा संसार जानते हैं, जैसे मछली सिर्फ पानी। लेकिन महाराजा जैसा जीव अपनी सच्ची सूरत देखता है और पूरे ब्रह्मांड की भविष्य योजना अनुभव करता है।

कुल मिलाकर, ये श्लोक सिखाते हैं कि जीव, मन और संसार एक ही चेतना से आते हैं। कुछ भी सच में अलग या बाहर नहीं। स्वप्न, विचार, इंद्रियाँ और ब्रह्मांड सब जीव की अंदरूनी कल्पना हैं। जब जीव यह समझ लेता है, तो झूठी धारणाओं से भ्रम खत्म होता है और वह अपनी सच्ची प्रकृति में विश्राम करता है, जो ब्रह्म के समान है।

अध्याय ३.५७, श्लोक २८–३७

 योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७ (ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उ...