योगवशिष्ट ३.१६.३६–५०
(एकाग्र भक्ति और पवित्रता की शक्ति)
श्रीसरस्वत्युवाच ।
निरन्तरेण तपसा भर्तृभक्त्यतिशालिना।
परितुष्टास्मि ते वत्से गृहाण वरमीप्सितम् ॥ ३६ ॥
श्रीराज्ञ्युवाच ।
जय जन्मजराज्वालादाहदोषशशिप्रभे।
जय हार्दान्धकारौघनिवारणरविप्रभे ॥ ३७ ॥
अम्ब मातर्जगन्मातस्त्रायस्व कृपणामिमाम् ।
इदं वरद्वयं देहि यदहं प्रार्थये शुभे ॥ ३८॥
एकं तावद्विदेहस्य भर्तुर्जीवो ममाम्बिके।
अस्मादेव हि मा यासीन्निजान्तःपुरमण्डपात् ॥ ३९ ॥
द्वितीयं त्वां महादेवि प्रार्थयेऽहं यदा यदा ।
दर्शनाय वरार्थाय तदा मे देहि दर्शनम् ॥ ४० ॥
इत्याकर्ण्य जगन्माता तवास्त्वेवमिति स्वयम् ।
उक्त्वान्तर्धानमगमत्प्रोत्थायोर्मिरिवार्णवे ॥ ४१ ॥
अथ सा राजमहिषी परितुष्टेष्टदेवता ।
श्रुतगीतेव हरिणी बभूवानन्दधारिणी ॥ ४२ ॥
पक्षमासर्तुकटके दिनारे वर्षदण्डके ।
क्षणनाभौ स्पन्दमये कालचक्रे वहत्यथ ॥ ४३ ॥
अन्तर्धिमाजगामास्याः पत्युस्तच्चेतनं तनौ ।
संदृश्यमानमेवाशु शुष्कपत्ररसो यथा ॥ ४४ ॥
रणखण्डितदेहेऽस्मिन्मृतेऽन्तःपुरमण्डपे ।
निर्जला नलिनीवासौ परां म्लानिमुपाययौ ॥ ४५ ॥
विषोष्णश्वसनध्वस्तसकलाधरपल्लवा ।
प्राप सा मरणावस्थां सशल्येव मृगी यथा ॥ ४६ ॥
प्राप सा तमसान्धत्वं तस्मिन्मरणमागते ।
दीपज्वालालवे क्षीणे सद्मश्रीरिव भूषिता ॥ ४७ ॥
कार्श्यमाप क्षणेनासौ बाला विरसतां गता ।
यथा स्रोतस्विनी स्रोतक्षये क्षारविधूसरा ॥ ४८ ॥
क्षिप्रमाक्रन्दिनी क्षिप्रं मौनमूका वियोगिनी ।
बभूव चक्रवाकीव मानिनी मरणोन्मुखी ॥ ४९ ॥
अथ तामतिमात्रविह्वलां सकृपाकाशभवा सरस्वती ।
शफरीं ह्रदशोषविह्वलां प्रथमा वृष्टिरिवान्वकम्पत ॥ ५० ॥
३.१६.३६:
श्री सरस्वती जी बोलीं −
बेटी, तेरे निरंतर तप और पति के प्रति अटल भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जो वर चाहे माँग ले।
३.१६.३७–३८:
रानी चुडाला बोली −
जय हो उस चंद्रमा जैसी देवी की जिसकी ठंडी किरणें जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु की जलन मिटाती हैं! जय हो उस सूर्य जैसी देवी की जिसकी तेज किरणें हृदय के घने अंधकार को दूर करती हैं! हे माँ, हे जगन्माता, इस दीन को बचाओ। हे कल्याणमयी, मैं जो दो वर माँगती हूँ, वे मुझे दे दो।
३.१६.३९:
पहला वर यह कि, हे अम्बिका, मेरे पति विदेह राजा का प्राण जब तक मैं जीवित हूँ, इस अन्तःपुर से कभी बाहर न जाए।
३.१६.४०:
दूसरा वर यह, हे महादेवी, जब-जब मैं किसी बड़े वर के लिए आपको पुकारूँ, तब-तब आप मेरे सामने प्रकट हो जाना।
३.१६.४१–४२:
यह सुनकर जगन्माता ने स्वयं कहा, “तथास्तु” और समुद्र में उठी लहर की तरह फिर समा गईं। तब अपनी इष्ट देवता से पूर्ण संतुष्ट हुई रानी
कृष्ण की बंसी सुनकर हर्षित हरिणी की तरह आनंद से भर गई।
३.१६.४३–४५:
इस प्रकार दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष चलायमान काल-चक्र पर बीतते चले गए। अचानक पति के शरीर से चेतना गायब हो गई, जैसे सूखे पत्ते से रस तुरंत चला जाता है। युद्ध में कटा हुआ मृत शरीर अन्तःपुर में पड़ा था, वह जलहीन कमल तालाब की तरह अत्यंत म्लान हो गई।
३.१६.४६:
गर्म साँसों से होंठों की कोमलता नष्ट हो गई, वह तीर लगी हिरणी की तरह मृत्यु के द्वार पर पहुँच गई।
३.१६.४७–४९:
पति की मृत्यु होते ही वह घोर अंधकार में डूब गई, जैसे बुझते दीपक की अंतिम की रोशनी के साथ महल की सारी शोभा चली जाए। क्षण भर में वह जवान रानी दुबली और निर्जीव हो गई, जैसे जल-प्रवाह रुकने पर नदी खारी और धूसर हो जाती है।वियोगिनी पहले ज़ोर-ज़ोर से रोई, फिर अचानक मौन और गूँगी हो गई, वह मानिनी चक्रवाकी पक्षिणी की तरह मृत्यु की ओर बढ़ने लगी।
३.१६.५०:
तब अत्यंत व्याकुल चुडाला को देखकर करुणा के आकाश में रहने वाली सरस्वती जी को बड़ी दया आई और जैसे सूखे तालाब में छटपथाती मछली पर पहली बारिश दया करती है, वैसे ही वे काँप उठीं।
उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक बताते हैं कि एकाग्र भक्ति और पवित्रता की कितनी बड़ी शक्ति है। रानी चुडाला ने वर्षों तक निरंतर तप और पति के प्रति पूर्ण समर्पण किया, जिससे स्वयं सरस्वती जी प्रसन्न होकर प्रकट हुईं और कोई भी वर माँगने को कहा। इससे सिद्ध होता है कि सच्ची भक्ति और तप से सबसे ऊँची दिव्य शक्तियाँ भी प्रसन्न हो जाती हैं।
दूसरा उपदेश यह है कि सच्ची पतिव्रता स्त्री क्या माँगती है। चुडाला ने न धन माँगा, न अपनी लंबी आयु, न सौंदर्य। उसने केवल दो बातें माँगी − पति का प्राण उसके जीते जी कभी न जाए और जब भी पुकारे देवी तुरंत आएँ। यह पतिव्रता धर्म का सर्वोच्च आदर्श है जिसमें पति का जीवन ही अपना जीवन समझा जाता है।
तीसरा उपदेश है − समय और मृत्यु का नियम कोई रोक नहीं सकता। वर मिलने के बाद भी वर्ष बीते और युद्ध में राजा का शरीर नष्ट हुआ, प्राण चले गए। काल-चक्र के सामने कोई वर स्थायी नहीं। संसार की हर रचना नश्वर है।
चौथा उपदेश है − आसक्ति भले ही पवित्र वैवाहिक प्रेम ही क्यों न हो, वियोग में भयंकर दुख देती है। पति की मृत्यु होते ही चुडाला का सौंदर्य, हँसी, जीवन-शक्ति सब नष्ट हो गया। उसे सूखे तालाब, निर्जल नदी, तीर लगी हिरणी और वियुक्त चक्रवाकी से तुलना की गई है। इससे समझ आता है कि गहरी आसक्ति अंत में महादुख का कारण बनती है।
पाँचवाँ और अंतिम उपदेश है − दैवी माँ की करुणा असीम है। मृत्यु को स्थायी रूप से भले न रोका जा सके, पर चुडाला के अत्यंत दुख देखकर सरस्वती जी का हृदय पिघल गया और वे फिर मदद को तत्पर हुईं। जैसे पहली वर्षा सूखे तालाब की मछलियों पर दया करती है, वैसे ही सच्चे हृदय की पुकार पर ईश्वरीय कृपा अवश्य आती है, चाहे कितना भी अंधेरा क्यों न हो।