Saturday, November 29, 2025

अध्याय ३.१६, श्लोक २४–३५

योगवशिष्ट ३.१६.२४–३५
(सच्ची साधना दिखावे की नहीं, प्रेम और सत्य की होती)

विप्रा उवाच: ।
तपोजपयमैर्देवि समस्ताः सिद्धसिद्धयः।
संप्राप्यन्तेऽमरत्वं तु न कदाचन लभ्यते ॥ २४ ॥
इत्याकर्ण्य द्विजमुखाच्चिन्तयामास सा पुनः ।
इदं स्वप्रज्ञयैवाशु भीता प्रियवियोगतः ॥ २५ ॥
मरणं भर्तुरग्रे मे यदि दैवाद्भविष्यति ।
तत्सर्वदुःखनिर्मुक्ता संस्थास्ये सुखमात्मनि ॥ २६ ॥
अथ वर्षसहस्रेण भर्तादौ चेन्मरिष्यति ।
तत्करिष्ये तथा येन जीवो गेहान्न यास्यति ॥ २७ ॥
तद्भ्रमद्भर्तृजीवेऽस्मिन्निजे शुद्धान्तमण्डपे ।
भर्त्रा विलोकिता नित्यं निवत्स्यामि यथासुखम् ॥ २८ ॥
अद्यैवारभ्यैतदर्थ देवीं ज्ञप्तिं सरस्वतीम्।
जपोपवासनियमैरातोषं पूजयाम्यहम् ॥ २९ ॥
इति निश्चित्य सा नाथमनुक्त्वैव वराङ्गना ।
यथाशास्त्रं चचारोग्रं तथा नियममास्थिता ॥ ३० ॥
त्रिरात्रस्य त्रिरात्रस्य पर्यन्ते कृतपारणा।
देवद्विजगुरुप्राज्ञविद्वत्पूजापरायणा ॥ ३१ ॥
स्नानदानतपोध्याननित्योद्युक्तशरीरिका ।
सर्वास्तिक्यसदाचारकारिणी क्लेशहारिणी ॥ ३२ ॥
यथाकालं यथोद्योगं यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
तोषयामास भर्तारमपरिज्ञातसंस्थितिः ॥ ३३ ॥
त्रिरात्रशतमेवं सा बाला नियमशालिनी।
अनारतं तपोनिष्ठामतिष्ठत्कष्टचेष्टया ॥ ३४ ॥
त्रिरात्राणां शते चाथ पूजिता प्रतिमानिता ।
तुष्टा भगवती गौरी वागीशा समुवाच ताम् ॥ ३५ ॥

३.१६.२४  
विप्रों ने कहा— हे देवि, तप, जप और यम-नियमों से सारी सिद्धियाँ मिल जाती हैं, पर अमरत्व कभी किसी को नहीं मिलता।

३.१६.२५–२९  
ब्राह्मणों के मुँह से यह सुनकर वह पुनः अपने मन में सोचने लगी, प्रिय के वियोग से डरकर स्वयं ही अपनी बुद्धि से शीघ्र विचार करने लगी ।यदि दैव से मेरे पति मेरे पहले मरेंगे तो मैं सारे दुःखों से मुक्त हो अपने आत्मा में सुख से रहूँगी। पर यदि हजार वर्ष बाद भी पति पहले मरेंगे तो मैं ऐसा करूँगी कि उनके प्राण इस घर से कभी बाहर न जाएँ। जब तक मेरे पति के प्राण इस शरीर में घूमते रहेंगे, मेरे इस शुद्ध अंतःकरण रूपी मंडप में वे मुझे नित्य देखते रहेंगे, मैं सुख से रहूँगी। आज से ही इस उद्देश्य से मैं ज्ञान-देवी सरस्वती को जप, उपवास और नियमों से पूजकर प्रसन्न करूँगी।

३.१६.३०–३३  
ऐसा निश्चय करके वह सुंदरी पति को बिना बताए शास्त्र के अनुसार अत्यंत कठोर नियम करने लगी। हर तीन रात में एक पारणा (उपवास-भोज) करके वह देवता, ब्राह्मण, गुरु, विद्वानों की पूजा में तत्पर रहती थी। स्नान, दान, तप, ध्यान में सदा लगी रहती, सारी सदाचार करती और सब क्लेश दूर करती हुई। समय पर, पूरे उद्योग से, शास्त्र के अनुसार क्रम से पति को प्रसन्न करती रही, कोई जाने न पाया कि वह क्या कर रही है। इस प्रकार वह बालिका नियमों में लगी हुई तीन सौ रातों तक कष्टपूर्ण चेष्टा से निरंतर तप में लगी रही।

३.१६.३५  
तीन सौ रात पूरे होने पर भगवती गौरी (वागीश्वरी) पूजित और तृप्त होकर प्रसन्न हुईं और उससे बोलीं।

उपदेशों का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक योगवशिष्ठ के उस महान शिक्षण को दिखाते हैं कि शुद्ध एवं दृढ़ संकल्प वाली बुद्धि कितनी बड़ी शक्ति रखती है, खासकर जब वह निःस्वार्थ प्रेम से प्रेरित हो। चूड़ाला को पता चलता है कि बड़े-से-बड़ा तप-जप भी शरीर को अमर नहीं बना सकता। वह हताश नहीं होती, बल्कि तुरंत सोचती है—यदि पति पहले मरें तो मैं मुक्त हो जाऊँगी, पर यदि मैं पहले बची तो ऐसा उपाय करूँगी कि मृत्यु उन्हें छू भी न सके।

साधन से सिद्धियाँ मिलती हैं, पर अमरत्व केवल आत्मा का स्वभाव है। चूड़ाला व्यर्थ प्रार्थना नहीं करतीं; वे सरस्वती (ज्ञान-शक्ति) को जगाने का संकल्प करती हैं ताकि पति-पत्नी दोनों चैतन्य स्वरूप में स्थित होकर मृत्यु से परे हो जाएँ। यह बताता है कि सच्चा अमरत्व ज्ञान से ही मिलता है, तप से नहीं।

उनका तप अत्यंत कठिन था—हर तीन दिन में पूर्ण उपवास, फिर भी गुप्त रूप से, बिना किसी को बताए। पति की सेवा में भी कोई कमी नहीं आई। यह शिक्षा देता है कि सच्ची साधना दिखावे की नहीं, प्रेम और सत्य की होती है तथा बाहर की मधुरता और भीतर की अग्नि साथ-साथ चल सकती है।

केवल तीन सौ रात (लगभग तीन वर्ष से कम) में भगवती गौरी प्रसन्न होकर प्रकट हो गईं। इससे स्पष्ट है कि जब मन एकाग्र, निर्मल और निःस्वार्थ होता है तब दिव्य कृपा शीघ्र आती है। समय से ज्यादा भाव और तीव्रता मायने रखती है।

सबसे गहरा संदेश यह है कि मुक्ति का सबसे उत्तम प्रेरक शुद्ध प्रेम हो सकता है। चूड़ाला अपने लिए नहीं, अपने प्रियतम को अमर करना चाहती हैं। यही निःस्वार्थ प्रेम उनकी साधना को परम सिद्धि का साधन बना देता है। शुद्ध प्रेम ही ज्ञान और अमरत्व का सबसे छोटा और निश्चित मार्ग है।

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