योगवशिष्ठ ३.१४.२८-३५
(केवल ब्रह्म ही, जो महा-जीव है, सदा के लिए सचमुच मौजूद रहता है। उसकी इच्छा से असंख्य जीव और असंख्य ब्रह्माण्ड कुछ समय के लिए प्रकट होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे एक सोए हुए मनुष्य में लाखों स्वप्न एक साथ उठते हैं)
श्रीराम उवाच ।
एवमेतत्कथं ब्रह्मन्नेकजीवेच्छयाखिलाः।
जगज्जीवा न युज्यन्ते महाजीवैकतावशात् ॥ २८ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महाजीवात्म तद्ब्रह्म सर्वशक्तिमयात्मकम् ।
स्थितं तथेच्छमेवेह निर्विभागं निरन्तरम् ॥ २९ ॥
यदेवेच्छति तत्तस्य भवत्याशु महात्मनः ।
पूर्वं तेनेष्टमिच्छादि ततो द्वित्वमुदेति यत् ॥ ३० ॥
पश्चाद्द्वित्वविभक्तानां स्वशक्तीनां प्रकल्पितः ।
अनेनेत्थं हि भवतीत्येवं तेन क्रियाक्रमः ॥ ३१ ॥
तं विनानुदये त्वासां प्रधानेच्छैव रोहति।
शक्त्या ह्यजातया ब्राह्म्या नियमोऽयं प्रकल्पितः ॥ ३२ ॥
यस्या जीवाभिधानायाः शक्त्यपेक्षा फलत्यसौ ।
प्रधानशक्तिनियमानुष्ठानेन विना न तु ॥ ३३ ॥
प्रधानशक्तिनियमः सुप्रतिष्ठो न चेद्भवेत् ।
तत्फलं शक्त्यधीनत्वान्नेहितानां क्वचिद्भवेत् ॥ ३४ ॥
एवं ब्रह्म महाजीवो विद्यतेऽन्तादिवर्जितः ।
जीवकोटि महाकोटि भवत्यथ न किंचन ॥ ३५ ॥
श्रीराम ने पूछा:
३.१४.२८: हे ब्रह्मन्! यदि सब कुछ केवल एक ही महा-जीव की इच्छा से होता है, तो फिर असंख्य छोटे-छोटे जीव और सारा जगत कैसे प्रकट होता है? एक महा-जीव की इच्छा से करोड़ों जीवों का प्रकट होना तर्कसंगत नहीं लगता।
महर्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया:
३.१४.२९: वह महा-जीव स्वयं ही ब्रह्म है। वह समस्त शक्तियों से परिपूर्ण है और उसके भीतर कोई विभाग नहीं है। वह सदा केवल शुद्ध इच्छा-स्वरूप ही बना रहता है, बिना किसी भंग या अलगाव के।
३.१४.३०: इस महा-सत्ता की जो इच्छा होती है, वह तुरंत सत्य हो जाती है। सबसे पहले उसने इच्छा की – “मैं यह और वह बनूँ।” इसी पहली इच्छा से द्वैत (दो का भाव) उत्पन्न होता है।
३.१४.३१: फिर वह अपनी ही शक्तियों को अनेक भागों में बाँटकर निश्चय करता है – “इस शक्ति से ऐसा होगा, उस शक्ति से वैसा होगा।” इसी प्रकार वह स्वयं ही कर्मों और घटनाओं की व्यवस्था बना देता है।
३.१४.३२: उसके बिना इन बँटी हुई शक्तियों में से कोई भी न तो उत्पन्न हो सकती है, न कुछ कर सकती है। मुख्य नियम यही है कि पहले महान् ब्रह्म-शक्ति की इच्छा हो, तभी छोटी शक्तियाँ काम करना शुरू कर सकती हैं। यह नियम स्वयं अजन्मा ब्रह्म-शक्ति ने ही बनाया है।
३.१४.३३: जिसे “जीव” कहते हैं, वह शक्ति भी अपने फल पाने के लिए उस मुख्य शक्ति का सहारा लेती है। मुख्य शक्ति के बनाए नियमों का पालन किए बिना जीव कुछ भी नहीं पा सकता।
३.१४.३४: यदि मुख्य शक्ति का नियम अच्छी तरह स्थिर और पालित न हो, तो छोटी शक्तियों की कोई भी इच्छा कहीं भी फलित नहीं हो सकती, क्योंकि सारे फल पूरी तरह उस मुख्य शक्ति पर निर्भर हैं।
३.१४.३५: इस प्रकार केवल ब्रह्म ही, जो महा-जीव है, सचमुच सदा रहता है। उसका न कोई भीतर है, न बाहर, न आदि है, न अंत। फिर भी उसकी इच्छा से करोड़ों-अरबों छोटे जीव प्रकट होते हैं, और फिर सब कुछ फिर लुप्त हो जाता है (ब्रह्म में ही विलीन हो जाता है)।
इस उपदेश का सार:
ये श्लोक राम जी के संदेह का समाधान करते हैं – “यदि केवल एक ही सत्य है, तो इतने सारे जीव और जगत कैसे दिखते हैं?”
वशिष्ठ जी समझाते हैं कि परम सत्य ब्रह्म ही है, जिसे महा-जीव भी कहते हैं। यह ब्रह्म शुद्ध, असीमाहीन चेतना है, समस्त शक्तियों से भरा हुआ। इसमें कोई विभाग नहीं, इसके अलावा दूसरा कुछ भी नहीं है। सारा खेल उसकी अपनी स्वतंत्र इच्छा से शुरू होता है।
सबसे पहले ब्रह्म अकेला था, फिर उसने सोचा “मैं कुछ अनुभव करूँ, मैं यह बनूँ।” इसी पहली इच्छा से “मैं” और “यह” का भेद पैदा हुआ। इसी एक हलचल से सारी बहुता (अनेक जीव, अनेक ब्रह्माण्ड) निकलती है।फिर ब्रह्म अपनी अनंत शक्ति को असंख्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर हर टुकड़े को अलग-अलग काम सौंप देता है और क्रम का नियम बना देता है। ये नियम कोई और नहीं, स्वयं ब्रह्म ने बनाए हैं, जबकि वह स्वयं अजन्मा और अपरिवर्तनीय रहता है।
हर छोटा जीव ब्रह्म की शक्ति का एक नन्हा अंश मात्र है। वह कभी स्वतंत्र होकर कुछ नहीं कर सकता। उसका हर फल, हर अनुभव, हर सृष्टि पूरी तरह महा-जीव की इच्छा और उसके बनाए नियमों पर निर्भर है।
अंत में स्पष्ट शिक्षा यही है: सचमुच केवल एक ब्रह्म (महा-जीव) ही सदा रहता है। उसकी इच्छा से करोड़ों जीव और ब्रह्माण्ड कुछ समय के लिए प्रकट होते हैं, ठीक वैसे जैसे एक सोते हुए मनुष्य के भीतर लाखों-करोड़ों स्वप्न एक साथ उठते हैं। इच्छा समाप्त हुई कि सब लुप्त, फिर केवल एक अखण्ड ब्रह्म ही शेष रह जाता है। वास्तव में कभी भी एक से अधिक कुछ था ही नहीं; सारी अनेकता केवल उस एक चेतना के भीतर अस्थायी दिखावा मात्र है।
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