Monday, November 17, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ११–१७

योग वशिष्ठ ३.१४.११–१७  
(क्योंकि कोई वास्तविक सहायक कारण मौजूद नहीं है, इसलिए वही एक चेतना [चैतन्य] ही कारण भी है और कार्य भी है; कभी कोई दूसरी वस्तु होती ही नहीं है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संकल्प एव संकल्पात्किलैति क्ष्मादिवर्जितः ।
आदिमादिव निःशून्यः स्वप्नात्स्वप्नान्तरं यथा ॥ ११ ॥
अस्मादेकप्रतिस्पन्दाज्जीवाः संप्रसरन्ति ये ।
सहकारिकारणानामभावाच्च स एव ते ॥ १२ ॥
सहकारिकारणानामभावे कार्यकारणम्।
एकमेतदतो नान्यः परस्मात्सर्गविभ्रमः ॥ १३ ॥
ब्रह्मवाद्यो विराडात्मा विराडात्मेव सर्गता ।
जीवाकाशः स एवेत्थं स्थितः पृथ्व्याद्यसद्यतः ॥ १४ ॥

श्रीराम उवाच ।
किं स्यात्परिमितो जीवो राशिराहो अनन्तकः ।
आहोस्विदस्त्यनन्तात्मा जीवपिण्डोऽचलोपमः ॥ १५ ॥
धाराः पयोमुच इव शीकरा इव वारिधेः।
कणास्तप्तायस इव कस्मान्निर्यान्ति जीवकाः ॥ १६ ॥
इति मे भगवन्ब्रूहि जीवजालविनिर्णयम् ।
ज्ञातमेतन्मया प्रायस्तदेव प्रकटीकुरु ॥ १७ ॥

३.१४.११  
महर्षि वशिष्ठ बोले – केवल शुद्ध संकल्प ही, मात्र कल्पना करने से, यह सारा जगत बन जाता है जिसमें न तो पृथ्वी है और न कोई ठोस वस्तु ही है। इसका न आदि वास्तविक है, न मध्य वास्तविक है, फिर भी यह बिल्कुल खाली भी नहीं है। बिल्कुल वैसे ही जैसे एक नींद में एक स्वप्न अपने आप दूसरा स्वप्न बन जाता है।

३.१४.१२  
उस एकमात्र संकल्प-स्पंदन से ही असंख्य जीव फैलकर प्रकट होते हैं। चूँकि कोई अन्य सहायक कारण बिल्कुल भी मौजूद नहीं है, इसलिए वही संकल्प अकेला उन जीवों का रूप हो जाता है।

३.१४.१३  
जब कोई सहायक कारण नहीं होते, तब वही एक संकल्प स्वयं ही कारण भी बनता है और कार्य भी। इसलिए केवल यही एक है, दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। बाहर से कोई सृष्टि रचने वाला है – यह विचार केवल भ्रम ही है।

३.१४.१४  
जिस परम ब्रह्म की बात बड़े-बड़े ज्ञानी करते हैं, वही विराट् है। सारा जगत-प्रपंच उसी विराट् का ही दिखना है। जीव तो आकाश-समान चैतन्य मात्र है। इस प्रकार वह जैसा है वैसा ही रहता है, और पृथ्वी आदि जो कुछ भी दिखाई देता है वह सब सर्वथा असत् (अवास्तविक) है।

३.१४.१५  
श्रीराम ने कहा – हे भगवन, क्या जीव बहुत छोटा-सा सीमित गठ्ठर जैसा है, या वह अनंत है? या एक ही अनंत चैतन्य-पिंड है जो विशाल पर्वत की तरह अचल है?

३.१४.१६  
फिर उससे निरंतर असंख्य जीव क्यों नहीं निकलते रहते – जैसे बादल से धाराएँ, समुद्र से जल-कण, या लाल-लोहे से चिंगारियाँ उड़ती रहती हैं?

३.१४.१७  
हे पुण्यशील प्रभु! यह जीवों का विशाल जाल वास्तव में कैसे चलता है, इसे स्पष्ट-स्पष्ट बताइए। मैंने इसका अधिकांश भाग समझ लिया है, किंतु शेष बचा हुआ भाग भी पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दीजिए।

श्लोकों का सरल सार:
इन श्लोकों में महर्षि वशिष्ठ सबसे शुद्ध अद्वैत वेदांत सिखा रहे हैं – यह सारा संसार, सभी शरीर-मन सहित, केवल अनंत चेतना के एक कल्पना के विचार (संकल्प) से ही उत्पन्न होता है। जैसे एक ही नींद में बिना किसी बाहरी सामग्री या कारण के एक स्वप्न अपने आप दूसरा स्वप्न बन जाता है, वैसे ही यह पूरा विश्व केवल चेतना की कल्पना से प्रकट होता है। कोई वास्तविक पृथ्वी, जल या पदार्थ नहीं है; सब शून्य है, फिर भी कल्पना के कारण भरा-भरा दिखता है।

जब मन पूछता है कि जीव कितने हैं, तो वशिष्ठ जी कहते हैं – वास्तव में तो केवल एक ही चेतना है। उसके एक स्पंदन से असंख्य जीव दिखते हैं, पर इसके लिए न समय चाहिए, न स्थान, न कोई दूसरा पदार्थ। वही एक चेतना स्वयं ही सब जीव बन जाती है – जैसे एक ही सागर बिना किसी दूसरी चीज़ की मदद के असंख्य लहरें बन जाता है।

चूँकि कोई वास्तविक सहायक कारण मौजूद नहीं है, इसलिए वही एक चेतना कारण भी है और कार्य भी; दूसरी कोई वस्तु कभी होती ही नहीं। बाहर कोई ईश्वर या शक्ति सृष्टि बनाती है – यह विचार केवल अज्ञान से पैदा हुआ भ्रम है। सच्चाई यह है कि ब्रह्म, विराट् और जीव में कोई अंतर नहीं। जीव तो शुद्ध आकाश-समान चेतना है; पृथ्वी-पर्वत-शरीर आदि जो दिखते हैं, वे सब स्वप्न के पदार्थों की तरह पूर्णतः अवास्तविक हैं।

राम जी फिर एक स्वाभाविक संदेह पूछते हैं – अगर सब कुछ एक अनंत चेतना है, तो क्या जीव छोटा-सा सीमित टुकड़ा है, या अनंत आकाश जैसा है, या एक ही विशाल अचल चैतन्य-पर्वत है जिससे जीवों की धाराएँ निरंतर निकलनी चाहिए जैसे बादल से बारिश या लोहे से चिंगारियाँ?

आगे के श्लोकों में वशिष्ठ जी इसका उत्तर देंगे कि जीव न तो सीमित है, न अनेक हैं – केवल एक अनंत चेतना ही कल्पित उपाधि (घटाकाश की तरह) से अनेक दिखती है। ये श्लोक दृढ़ता से स्थापित करते हैं कि न संसार का जन्म वास्तविक है, न जीवों की भीड़ – यह सब एक अचल ब्रह्म की कल्पना-लीला मात्र है। इसे जान लेने से सारा दुख-संशय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

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