Friday, November 14, 2025

अध्याय ३.१३, श्लोक ३६–४३

योगवशिष्ठ ३.१३.३६–४३  
(सृष्टि केवल सृष्टिकर्ता के अपने विचार से आकार ली हुई स्मृति है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आत्मगर्भगृहं चित्ताद्यथासंकल्पमात्मनः ।
देशकालक्रियाद्रव्यकल्पनावेदनं स तत् ॥ ३६ ॥
भावयञ्छब्दनिर्माता शब्दैर्बध्नाति कल्पितैः ।
आतिवाहिकदेहोऽसावित्यसत्यजगद्भ्रमे ॥ ३७ ॥
असत्य एव कचति स्वप्ने खोड्डयनं यथा ।
इत्यनुत्पन्न एवासौ स्वयंभूः स्वयमुत्थितः ॥ ३८ ॥
आतिवाहिकदेहात्मा प्रभुराद्यः प्रजापतिः ।
एतस्मिन्नपि संपन्ने ब्रह्माण्डाकारिणि भ्रमे ॥ ३९ ॥
न किंचिदपि संपन्नं न च जातं न दृश्यते ।
तद्ब्रह्माकाशमाकाशमेव स्थितमनन्तकम् ॥ ४० ॥
संकल्पनगराकारमेतत्सदपि नैव सत् ।
अनिर्मितमरागं च एतद्वै चित्रमुत्थितम् ॥ ४१ ॥
अकृतं चानुभूतं च न सत्यं सत्यवत्स्थितम् ।
महाकल्पे विमुक्तत्वाद्ब्रह्मादीनामसंशयम् ॥ ४२॥
स्मृतिर्न प्राक्तनी काचित्कारणं वा स्वयंभुवः ।
तेन यादृक्स्वयंभूः स्यात्तादृक्तज्जमिदं स्मृतम् ॥ ४३ ॥

महर्षि वशिष्ठ ने आगे कहा:
३.१३.३६: मन सच्चे स्व: के भीतर एक कमरे जैसा है। स्व: ही स्थान, काल, कर्म और वस्तुओं की कल्पना करता है। स्व: इन कल्पित कल्पनाओं को सत्य मानकर अनुभव करता है।

३.१३.३७: कोई ध्वनियों की कल्पना करता है और उन्हें उत्पन्न करता है। फिर वही कल्पित ध्वनियाँ उसे बाँध लेती हैं। यह सूक्ष्म शरीर जो जीवन-पर-जीवन भावनाएँ ढोता है, वैसा ही है। यह सब विश्व की मिथ्या धारणा में घटित होता है।

३.१३.३८: कोई मिथ्या स्वप्न में आकाश में उड़ते हुए चमकती है। ठीक उसी प्रकार यह स्वयंभू सृष्टिकर्ता कभी वास्तव में जन्मा ही नहीं। वह स्व: ही उदित होता है।

३.१३.३९: इस स्वयंभू सृष्टिकर्ता का सूक्ष्म शरीर है। वह आदि प्रभु है, समस्त प्राणियों का पिता। जब यह महान् भ्रम सम्पूर्ण विश्वरूप में विकसित हो जाता है,

३.१३.४०: तब भी कुछ भी वास्तव में घटित नहीं हुआ। कुछ भी जन्मा नहीं। कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं। केवल महास्व: का अनन्त आकाश ही रहता है, शून्य आकाश की भाँति।

३.१३.४१: यह विचारों द्वारा निर्मित नगरी-सा प्रतीत होता है। यद्यपि सत्य-सा लगता है, किन्तु सर्वथा असत्य है। इसका कोई कर्ता नहीं। इसमें राग-द्वेष की दृढ़ता नहीं। फिर भी यह आश्चर्यजनक ढंग से उदित होता है।

३.१३.४२: यह निर्मित नहीं, फिर भी अनुभूत होता है। यह सत्य नहीं, किन्तु सत्य-सा खड़ा है। विश्व के महाप्रलय काल में सृष्टिकर्ता आदि देवता भी मुक्त हो जाते हैं। यह निश्चित है।

३.१३.४३: स्वयंभू सृष्टिकर्ता को कोई प्राचीन स्मृति नहीं, कोई कारण नहीं। अतः वह जो कुछ भी बन जाता है, उससे उत्पन्न विश्व भी उसी प्रकार स्मरण किया जाता है।

उपदेशों का सारांश:
ये श्लोक सिखाते हैं कि मन सर्वोच्च स्व: के भीतर ही सब कुछ रचता है। स्थान, काल, कर्म और वस्तुओं की कल्पनाएँ केवल स्वयं के विचारों से उत्पन्न होती हैं। स्व: इन कल्पनाओं को सत्य मानकर अनुभव करता है, किन्तु वे सत्य नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विश्व मन द्वारा रचित विचार-चित्र मात्र है।

श्लोक बताते हैं कि विचार मनुष्य को कैसे बाँधते हैं। कोई ध्वनि या रूप की कल्पना करता है, तो वही कल्पना उसे बाँध लेती है। एक जीवन से दूसरे जीवन तक भावनाएँ ले जाने वाला सूक्ष्म शरीर भी ऐसा ही है। यह सब सत्य विश्व की मिथ्या धारणा में घटित होता है। स्व: के बाहर कुछ भी वास्तव में विद्यमान नहीं।

स्वयंभू सृष्टिकर्ता बिना किसी वास्तविक जन्म के प्रकट होता है, जैसे स्वप्न में आकाश-यात्रा करने वाला पात्र। वह सूक्ष्म शरीर वाला आदि प्रभु और समस्त प्राणियों का पिता है। जब भ्रम सम्पूर्ण विश्व बन जाता है, तब भी कुछ भी वास्तव में नहीं हुआ। केवल अनन्त स्वयं ही रहता है, सीमारहित शुद्ध शून्य आकाश की भाँति।

विश्व कल्पना द्वारा निर्मित नगरी-सा दिखता है, किन्तु कभी सत्य नहीं। इसका कोई रचयिता नहीं, कोई दृढ़ राग-द्वेष नहीं, फिर भी यह आश्चर्यजनक रूप से उदित होता है। यह निर्मित न होने पर भी अनुभूत होता है, असत्य होते हुए भी सत्य-सा खड़ा है। विश्व के महाप्रलय में सृष्टिकर्ता आदि देवता भी मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि सब कुछ सदा शून्य था।

स्वयंभू सृष्टिकर्ता को न कोई प्राचीन स्मृति है, न कोई कारण। वह जो कुछ बन जाता है, उससे उत्पन्न विश्व भी ठीक उसी प्रकार स्मरण किया जाता है। इससे स्पष्ट है कि सम्पूर्ण सृष्टि केवल सृष्टिकर्ता के अपने विचार से आकार ली हुई स्मृति मात्र है, बिना किसी बाहरी कारण या आदि के।

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