योगवशिष्ट ३.१६.१–२३
(संसार का सबसे उत्तम सुख भी अंत में मृत्यु-भय के कारण अपूर्ण रह जाता है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भूतलाप्सरसा सार्धमनन्यदयितापतिः ।
अकृत्रिमप्रेमरसं स रेमे कान्तया तया ॥ १ ॥
उद्यानवनगुल्मेषु तमालगहनेषु च ।
पुष्पमण्डपरम्येषु लतावलयसद्मसु ॥ २ ॥
पुष्पान्तःपुरशय्यासु पुष्पसंभारवीथिषु ।
वसन्तोद्यानदोलासु क्रीडापुष्करिणीषु च ॥ ३ ॥
चन्दनद्रुमशैलेषु संतानकतलेषु च ।
कदम्बनीपगेहेषु पारिभद्रोदरेषु च ॥ ४॥
विकसत्कुन्दमन्दारमकरन्दसुगन्धिषु ।
वसन्तवनजालेषु कूजत्कोकिलपक्षिषु ॥ ५ ॥
नानारण्यतृणानां च स्थलेषु मृदुदीप्तिषु।
निर्झरेषु तरत्तारसीकरासारवर्षिषु ॥ ६॥
शैलानां मणिमाणिक्यशिलानां फलकेषु च ।
देवर्षिमुनिगेहेषु दूरपुण्याश्रमेषु च ॥ ७॥
कुमुद्वतीषु फुल्लासु स्मेरासु नलिनीषु च ।
वनस्थलीषु कृष्णासु फुल्लासु फलिनीषु च ॥ ८ ॥
सुरतैः सुरतारुण्यैः सुन्दरः सुन्दरेहितैः ।
ईहितैः पेशलान्योन्यघनप्रेमरसाधिकैः ॥ ९॥
प्रहेलिकाभिराख्यानैस्तथा चाक्षरमुष्टिभिः ।
अष्टापदैर्बहुद्यूतैस्तथा गूढचतुर्थकैः ॥ १० ॥
नाटिकाख्यायिकाभिश्च श्लोकैर्विन्दुमतिक्रमैः ।
देशकालविभागैश्च नगरग्रामचेष्टितैः ॥ ११ ॥
स्रग्दाममालावलितैर्नानाभरणयोजनैः ।
लीलाविलोलचलनैर्विचित्ररसभोजनैः ॥ १२ ॥
आर्द्रकुङ्कुमकर्पूरताम्बूलीदलचर्वणैः ।
फुल्लपुष्पलतागुञ्जादेहगोपनखव्रणैः ॥ १३ ॥
समालम्भनलीलाभिर्मालाप्रहरणक्रमैः ।
गृहे कुसुमदोलाभिरन्योन्यं दोलनक्रमैः ॥ १४ ॥
नौयानयुग्महस्त्यश्वदान्तोष्ट्रादिगमागमैः ।
जलकेलिविलासेन परस्परसमुक्षणैः ॥ १५ ॥
नृत्यगीतकलालास्यतालताण्डवमण्डनैः ।
संगीतकैः संकथनैर्वीणामुरजवादनैः ॥ १६ ॥
उद्यानेषु सरित्तीरवृक्षेषु वरवीथिषु ।
अन्तःपुरेषु हर्म्येषु फुल्लदोलावदोलनैः ॥ १७ ॥
सा तथा सुखसंवृद्धा तस्य प्रणयिनी प्रिया ।
एकदा चिन्तयामास सुभ्रूः संकल्पशालिनी ॥ १८ ॥
प्राणेभ्योऽपि प्रियो भर्ता ममैष जगतीपतिः ।
यौवनोल्लासवान्श्रीमान्कथं स्यादजरामरः ॥ १९ ॥
भर्त्रानेन सहोत्तुङ्गस्तनी कुसुमसद्मसु।
कथं स्वैरं चिरं कान्ता रमे युगशतान्यहम् ॥ २० ॥
तथा यते यत्नमतस्तपोजपयमेहितैः।
रजनीशमुखो राजा यथा स्यादजरामरः ॥ २१ ॥
ज्ञानवृद्धांस्तपोवृद्धान्विद्यावृद्धानहं द्विजान् ।
पृच्छामि तावन्मरणं कथं न स्यान्नृणामिति ॥ २२ ॥
इत्यानीयाथ संपूज्य द्विजान्पप्रच्छ सा नता ।
अमरत्वं कथं विप्रा भवेदिति पुनःपुनः ॥ २३ ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१६.१: भूतल की अप्सरा (लीला) के साथ राजा पद्म एकमात्र प्रियतम पति बनकर सच्चे एवं नैसर्गिक प्रेम-रस का आनंद ले रहे थे।
३.१६.२–८: वे दोनों उद्यानों, घने तमाल वनों, फूलों की गद्दियों पर, फूलों की ढेरी से बनी गलियों में, वसंत की डोलाओं पर तथा क्रीड़ा-सरोवरों में; चंदन के पर्वतों पर, फैले हुए केले के वृक्षों के नीचे, कदम्ब-नीप के कुटीरों में, परिभद्र वृक्षों के खोखल में; खिले कुंद-मंदार के मकरंद की सुगंध से भरे वसंत-वन-समूहों में, जहाँ कोकिल मधुर बोल रही थीं; अनेक वनों के कोमल चमकते घास के मैदानों पर, मोतियों जैसे फुहार बरसाते झरनों के पास; पर्वतों की माणिक्य-मणि की चट्टानों पर, देवर्षि-मुनियों के दूरस्थ पुण्य आश्रमों में; खिली हुई कुमुदवती नदियों में, मुस्कुराती हुई नील कमल सरोवरों में, फल-फूलों से भरी गहरी काली वन-स्थलियों में।
३.१६.९–१७: सुंदर युवा काम-क्रीड़ा से, एक-दूसरे के प्रति कोमल घने प्रेम-रस से वे सुंदर जोड़ा विहार करता रहा। वे पहेलियाँ बुझाते, कहानियाँ सुनाते, पासा, अष्टापद, अनेक जुआ तथा गुप्त चतुर्थक खेल खेलते; नाटिकाएँ करते, आख्यायिकाएँ सुनाते, सुंदर श्लोक और चुटकीले वचन बोलते, देश-काल की बातें, नगर-ग्राम की चेष्टाएँ करते; फूलों की मालाएँ एवं नाना आभूषण पहनते, लीलापूर्ण चंचल चाल चलते, विचित्र रसों के भोजन करते; गीले कुंकुम-कपूर-तांबूल चबाते, फूलों की लताओं और गुच्छों से शरीर के नाखून के घाव छिपाते; एक-दूसरे को चंचलता से गले लगाते, मालाएँ फेंकते, महल में पुष्प-डोलाओं पर साथ-साथ डोलते; जोड़ी नावों, हाथी, घोड़ों, सधे ऊँटों आदि से आना-जाना करते, जल-क्रीड़ा करते, एक-दूसरे पर छींटे मारते; नाचते-गाते, मधुर लास्य-तांडव करते, संगीत करते, मीठी-मीठी बातें करते, वीणा-मृदंग बजाते; उद्यानों में, नदी-तीरों पर, सुंदर वृक्षों के नीचे, उत्तम गलियों में, अंतःपुरों में, महलों की छतों पर फूलों की डोलाओं में डोलते हुए।
३.१६.१८–२२: इस प्रकार सुख से परिपूर्ण उस प्रणयिनी प्रिया ने एक दिन भौंहें सिकोड़कर, संकल्प से भरी हुई सोचा — “मेरे प्राणों से भी प्यारा यह जगत् का स्वामी मेरा पति है। युवावस्था से उल्लसित, श्रीमान् यह कैसे अजर-अमर हो सकता है? उन्नत स्तनों वाली मैं इस पति के साथ फूलों के महलों में सैकड़ों युग तक कैसे स्वच्छंद विहार करूँ? इसलिए मैं तप, जप और यम से पूरा प्रयत्न करूँगी जिससे चंद्रमुख यह राजा अजर-अमर हो जाए। ज्ञान, तप और विद्या में वृद्ध ब्राह्मणों से पूछूँगी कि मनुष्यों की मृत्यु कैसे न हो।”
३.१६.२३: ऐसा सोचकर उसने ब्राह्मणों को बुलवाया, पूजा की और नतमस्तक होकर बार-बार पूछा — “विप्रो! अमरत्व कैसे प्राप्त हो?”
उपदेश का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक दिखाते हैं कि संसार का सबसे उत्तम सुख भी अंत में मृत्यु-भय के कारण अपूर्ण रह जाता है। राजा पद्म और लीलाने हर प्रकार के भोग भोगे, परन्तु सुख शरीर पर निर्भर था, इसलिए उसमें मृत्यु का भय छिपा रहा। फूलों, संगीत, काम, खेल आदि का विस्तृत वर्णन इसलिए है कि कोई भी भोग चिरस्थायी नहीं है; जितना अधिक भोग, उतना ही अधिक खोने का डर।
लीला का अचानक पति की मृत्यु का विचार आना महत्वपूर्ण है। सारी सुख-सामग्री होने पर भी प्रेम के कारण मृत्यु का भय असह्य हो गया। यह सिद्ध करता है कि जितना गहरा लगाव, उतना ही गहरा दुख आने वाला है। योगवासिष्ठ यही सिखाता है कि प्रेम चाहे जितना पवित्र हो, यदि वह शरीर और संसार पर आधारित है तो दुख अवश्यम्भावी है।
लीला तुरंत पति को अमर बनाने का संकल्प करती है और तप-जप तथा ब्राह्मणों से पूछने का निश्चय करती है। यह मनुष्य का स्वाभाविक व्यवहार है — हम मृत्यु को शरीर के स्तर पर ही हराना चाहते हैं। परंतु योगवासिष्ठ आगे बताएगा कि शरीर को अमर बनाने का कोई उपाय नहीं, क्योंकि शरीर स्वप्न के समान है।
वास्तविक अमरत्व शरीर को सदा जीवित रखना नहीं, अपितु आत्मा की जागृति है जो कभी जन्मी ही नहीं, मरेगी भी नहीं। लीलाका प्रश्न “अमर कैसे हुआ जाए?” प्रत्येक साधक का प्रश्न है और वसिष्ठ इसका उत्तर ज्ञान से देंगे, न कि किसी यज्ञ-तप से।
इस प्रकार यह प्रकरण केवल प्रेम-कथा नहीं है; यह भोग से वैराग्य और वैराग्य से आत्म-जिज्ञासा की सुंदर यात्रा है। सुख अपने आप समाप्त होकर दुख बनता है, दुख से सच्ची खोज शुरू होती है और सच्ची खोज से मुक्ति मिलती है। यही योगवासिष्ठ का मूल उपदेश है।
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