Saturday, November 15, 2025

अध्याय ३.१३, श्लोक ४४–५४

योग वशिष्ठ ३.१३.४४–५४  
(ब्रह्म ही विश्व में अकेला है, जो अपने आप में शुद्ध रूप से, अपने आप से, अपने आप के रूप में चमकता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अनाद्यनुभवस्त्वित्थं योऽत्रास्ति वनिकादिके ।
स्वप्नानुभूतं पृथ्व्यादि प्रबोधे यादृशं भवेत् ॥ ४४ ॥
स्मृतः स व्योममात्रात्मा सर्वदैव स्मृतं जगत् ।
यत्र यत्र यथा तोये द्रवत्वं नाम भिद्यते ॥ ४५ ॥
तत्र तत्र तथा नान्यः सर्गोऽस्ति परमात्मनि ।
सृष्टिरेवमियं प्रौढा सम एव त्वयं स्थितः ॥ ४६ ॥
भात्येवं नाम ब्रह्माण्डं व्योमात्मेवातिनिर्मलम् ।
दृश्यमेवमिदं शान्तं स्वात्मनिर्मितविभ्रमम् ॥ ४७ ॥
निराधारं निराधेयमद्वैतं चैक्यवर्जितम् ।
जगत्संविदि जातायामपि जातं न किंचन ॥ ४८ ॥
परमाकाशमाशून्यमच्छमेव व्यवस्थितम् ।
सर्वसंसारता नास्ति यदेव तदवस्थितम् ॥ ४९ ॥
नाधेयं तत्र नाधारो न दृश्यं न च द्रष्टृता।
ब्रह्माण्डं नास्ति न ब्रह्मा न च वैतण्डिका क्वचित् ॥ ५० ॥
न जगन्नापि जगती शान्तमेवाखिलं स्थितम् ।
ब्रह्मैव कचति स्वच्छमित्थमात्मात्मनात्मनि ॥ ५१॥
चित्त्वाद्द्रवत्वात्सलिलमिवावर्ततयात्मनि ।
असदेवेदमाभाति सदिवेहानुभूयते ॥ ५२ ॥
विनश्यत्यसदेवान्ते स्वप्ने स्वमरणं यथा ।
अथवा स्वस्वरूपत्वात्सदेवेदमनामयम् ।
अखण्डितमनाद्यन्तं ज्ञानमात्राम्बरोदरम् ॥ ५३ ॥
आकाश एव परमे प्रथमः प्रजेशो नित्यं स्वयं कचति शून्यतया समो यः ।
स ह्यातिवाहिकवपुर्नतु भूतरूपी पृथ्व्यादि तेन न सदस्ति यथा न जातम् ॥ ५४ ॥

महर्षि वशिष्ठ ने निष्कर्ष निकाला:
३.१३.४४: व्यापारी आदि के लिए इस प्रकार चलने वाला अनंत अनुभव ठीक वैसा ही है जैसे स्वप्न में देखी गई पृथ्वी आदि वस्तुएँ। जागने पर वे खाली आकाश के सिवा कुछ नहीं रह जातीं। उसी तरह याद किया हुआ सारा संसार सदा शुद्ध खाली चेतना के सिवा कुछ नहीं है।

३.१३.४५: संसार शुद्ध आकाश-जैसी चेतना के रूप में याद किया जाता है। जैसे जल की द्रवता जहाँ-कहीं और जैसे-जैसे दिखे, जल से अलग नहीं होती, वैसे ही परम आत्मा से अलग कोई सृष्टि नहीं है।

३.१३.४६: इस प्रकार पूरी तरह विकसित और परिपक्व यह सृष्टि है, फिर भी आप वही के वही, अपरिवर्तित रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्मांड अत्यंत शुद्ध आकाश-जैसी चेतना के सिवा कुछ नहीं दिखता।

३.१३.४७: यह दिखने वाला संसार शांत और नीरव है, अपने ही आत्मा द्वारा बनाया हुआ भ्रम मात्र। इसका कोई आधार नहीं, कुछ रखने की जगह नहीं, कोई द्वैत नहीं और न ही किसी के साथ एकता का भाव।

३.१३.४८: संसार की चेतना उठने पर भी वास्तव में कुछ पैदा नहीं हुआ। परम आकाश खाली, शुद्ध और अपरिवर्तित है। संसार का कोई चिह्न नहीं; केवल वही जैसा है वैसा रहता है।

३.१३.४९: उसमें कुछ रखने को नहीं, कोई आधार नहीं, कोई दृश्य नहीं और कोई द्रष्टा नहीं। न कोई ब्रह्मांड है, न स्रष्टा ब्रह्मा, न कहीं कोई मायावी खेल।

३.१३.५०: न संसार है न पृथ्वी; सब कुछ पूरी तरह शांत और स्थिर है। ब्रह्म ही इस प्रकार अपने में, अपने से, अपने रूप में शुद्ध चमकता है।

३.१३.५१: मन की प्रकृति से जैसे जल में अपने ही भीतर भँवर दिखते हैं, वैसे ही यह असत्य संसार यहाँ सत्य-सा चमकता है और ऐसा ही अनुभव किया जाता है।

३.१३.५२: अंत में असत्य स्वप्न में अपनी मृत्यु की तरह गायब हो जाता है। या फिर यह वास्तव में अपना स्वरूप होने से यह संसार सदा रोग-रहित, अखंड, आदि-अनंत और चेतना के आकाश में केवल शुद्ध ज्ञान से भरा रहता है।

३.१३.५३: यह अखंड, आदि-अनंत, केवल शुद्ध ज्ञान से बना है और चेतना के विशाल आकाश को भरता है।

३.१३.५४: परम सत्य में सबसे पहला प्रभु सभी प्राणियों का स्वामी केवल शुद्ध आकाश ही है। वह सदा अपने आप चमकता है, पूरी तरह अकेला, पूर्ण शून्य में, सदा वही और अपरिवर्तित। उस प्रभु का केवल शुद्ध चेतना का सूक्ष्म शरीर है—मिट्टी आदि भौतिक तत्वों का स्थूल शरीर नहीं। इसलिए उसके द्वारा कभी कुछ सत्य पैदा नहीं होता, जैसे कुछ कभी वास्तव में जन्म नहीं लेता।

शिक्षाओं का सार:
ये श्लोक संसार के अनुभव को स्वप्न से तुलना करके शुरू होते हैं। जैसे स्वप्न में देखी पृथ्वी आदि वस्तुएँ जागने पर खाली आकाश मात्र रह जाती हैं, वैसे ही याद किया हुआ सारा संसार शुद्ध चेतना के सिवा कुछ नहीं है। यह चेतना आकाश-जैसी है—विशाल, निराकार और अपरिवर्तित। हम जो सृष्टि देखते हैं वह परम आत्मा के बाहर अलग घटना नहीं है; यह आत्मा ही विभिन्न रूपों में दिखता है, जैसे जल को उसकी द्रवता से अलग नहीं किया जा सकता। संसार जहाँ-कहीं और जैसे-जैसे उठे, वह एक सत्य से कभी अलग नहीं होता।

शिक्षा जोर देती है कि पूरी तरह विकसित ब्रह्मांड भी वही अछूता आत्मा है। ब्रह्मांड शुद्ध, निष्कलंक चेतना के रूप में चमकता है। जो हम संसार देखते हैं वह शांत, स्वयं-निर्मित भ्रम है—बिना किसी आधार के, बिना किसी वस्तु के, बिना द्वैत या जबरन एकता के। मन को संसार का बोध होने पर भी वास्तव में कुछ नया पैदा नहीं हुआ। परम आकाश खाली और स्वच्छ रहता है, संसार की सभी गतिविधियों से मुक्त। केवल एक सत्य रहता है।

इस परम सत्य में न कोई पात्र है, न सामग्री, न दृश्य और न द्रष्टा। ब्रह्मांड, स्रष्टा-देवता ब्रह्मा और सारा नाटकीय खेल अनुपस्थित हैं। संसार और उसका आधार नहीं हैं; सब कुछ पूर्णतः स्थिर है। ब्रह्म ही अपने में, अपने द्वारा, अपने रूप में स्पष्ट चमकता है। मन की प्रकृति से असत्य सत्य-सा दिखता है, जैसे जल में भँवर बनते हैं पर जल से अलग नहीं होते। यह दिखावा ठोस अनुभव होता है, पर खाली है।

असत्य अंत में स्वप्न में मृत्यु की तरह गायब हो जाता है। या फिर संसार को अपना सच्चा स्वरूप जानकर उसे सदा शुद्ध, अखंड, आदि-अनंत—चेतना के आकाश में शुद्ध ज्ञान से भरा पाते हैं। पहला स्रष्टा आकाश ही है, शून्य में सदा चमकता, सूक्ष्म चेतना-शरीर वाला, भौतिक रूप नहीं। इससे कुछ सत्य पैदा नहीं होता; कुछ कभी वास्तव में जन्म नहीं लेता।

ये श्लोक साधक को मार्गदर्शन देते हैं कि संसार को अपरिवर्तित चेतना के भीतर स्वयं-निर्मित, हानिरहित दिखावा समझें। इसे समझकर व्यक्ति शांत, अद्वैत सत्य में विश्राम करता है जहाँ न सृष्टि, न विनाश, न पृथकता कभी होती है।

No comments:

Post a Comment

अध्याय ३.५७, श्लोक २८–३७

 योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७ (ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उ...