Saturday, November 22, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ५६–६३

योग वशिष्ठ ३.१४.५६–६३  
(जीव कुछ और नहीं है, बल्कि चेतना का स्पंदनमात्र या कंपायमान गति ही है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यच्चिच्चित्त्वेन कचनं स्वसंपाद्याभिधात्मकम् ।
स्वविकारैर्व्यवच्छेद्यं भिद्यते नो न विद्यते ॥ ५६ ॥
चित्स्पन्दरूपिणोरस्ति न भेदः कर्तृकर्मणोः ।
स्पन्दमात्रं भवेत्कर्म स एव पुरुषः स्मृतः ॥ ५७ ॥
जीवश्चित्तपरिस्पन्दः पुंसां चित्तं स एव च ।
मनस्त्विन्द्रियरूपं सत्सत्तां नानेव गच्छति ॥ ५८ ॥
शान्ताशेषविशेषं हि चित्प्रकाशच्छटा जगत् ।
कार्यकारणकादित्वं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥ ५९ ॥
अच्छेद्योऽहमदाह्योऽहमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽहमिति स्थितम् ॥ ६० ॥
विवदन्ते तथा ह्यत्र विवदन्तो यथा भ्रमैः ।
भ्रमयन्तो वयं त्वेते जाता विगतविभ्रमाः ॥ ६१ ॥
दृश्ये मूर्ते ज्ञसंरूढे विकारादि पृथग्भवेत् ।
नामूर्ते तज्ज्ञकचिते चित्खे सदसदात्मनि ॥ ६२ ॥
चित्तरौ चेत्यरसतः शक्तिः कालादिनामिकाम् ।
तनोत्याकाशविशदां चिन्मधुश्रीः स्वमञ्जरीम् ॥ ६३ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१४.५६: जो कुछ भी जीव लगता है, वह केवल चैतन्य का कंपन ही है।  
३.१४.५७: जैसे समुद्र में उठने वाली लहरें जल के अलावा कुछ नहीं होतीं, उसी तरह यह जीव भी चेतना के सिवा और कुछ नहीं है।  

३.१४.५८: जब चेतना स्थिर रहती है, तब वह ब्रह्म कहलाती है। 

३.१४.५९: जब वही चेतना संकल्प करती हुई स्पंदित होती है, तब जीव कहलाती है। इसमें कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, कोई दूसरी शक्ति नहीं है।  

३.१४.६०: जैसे रस्सी में जब तक अज्ञान रहता है, साँप दिखता है, पर जब ज्ञान होता है तो केवल रस्सी ही रह जाती है — ठीक वैसे ही यह जीव भी केवल चैतन्य का भ्रममात्र है।  

३.१४.६१: सारा जगत् चेतना का ही स्पंदन है, और जब स्पंदन शांत हो जाता है, तब केवल शुद्ध चैतन्य ही शेष रह जाता है।  

३.१४.६२: इसलिए हे राम! यह समझ लो कि जीव, जगत् और ब्रह्म—ये तीनों एक ही चैतन्य के अलग-अलग नाम हैं।  

३.१४.६३: जो इस सत्य को जान लेता है, वही मुक्त हो जाता है।

शिक्षाओं का सरल सारांश:

ये श्लोक बहुत जोर देकर कहते हैं कि शुद्ध चैतन्य (शुद्ध चेतना) में कभी कोई द्वैत नहीं है। चेतना कभी सचमुच मन, जीव या जगत नहीं बनती—बस अपनी ही हल्की-हल्की हलचल (स्पंदन) के कारण ऐसा दिखाई देती है।  

जिसे हम मन, पुरुष, जीव या व्यक्ति कहते हैं, वह एक ही अविभाजित चेतना का पलभर का कंपन मात्र है। कर्ता-कर्म, द्रष्टा-दृश्य, कारण-कार्य में कोई सच्चा अंतर नहीं है। सब कुछ चेतना का अपने आप से खेल है, वह कभी अपनी प्रकृति से बाहर नहीं जाती।  

जगत, शरीर, काल, देश और सारी कारण-प्रक्रिया—ये सब उस एक चैतन्य पर थोपी हुई झूठी कल्पनाएँ हैं। जैसे लहरें समुद्र से अलग कभी नहीं होतीं, वैसे ही सारे कर्म, कर्ता और विषय चेतना के अपने ही स्पंदन हैं। जब यह स्पंदन शांत हो जाता है, तब सारा ब्रह्मांड फिर से शांत, निर्विकल्प, शुद्ध चैतन्य में विलीन हो जाता है। इसके अलावा कुछ है ही नहीं—न सृष्टि, न प्रलय, न बंधन, न मुक्ति।  

आत्मा का सच्चा स्वरूप उपनिषदों के प्रसिद्ध वचन हैं: अटूट, न जलने वाला, शाश्वत, सर्वव्यापी, अचल।ये गुण अलग से जोड़े हुए नहीं हैं—बस जब शरीर, मन और जगत से गलत तादात्म्य छूट जाता है, तब जो शेष रहता है, उसी की ओर संकेत हैं। जैसे ही इस समझ में दृढ़ता से टिक जाओ, सारी सीमाएँ अपने आप गिर जाती हैं।  

सारे दार्शनिक विवाद, तर्क-वितर्क और संप्रदायों के झगड़े स्वप्न में झगड़ते लोगों जैसे हैं, जो भूल गए हैं कि वे सो रहे हैं। जो सत्य को जान लेता है, वह व्यक्तित्व और बहुलता के स्वप्न से जाग जाता है। जागने के बाद उसे हँसी आती है कि पहले मैं किस बात को लेकर लड़ता-झगड़ता था—कोई लड़ने वाला था ही नहीं, कोई झगड़ने की बात थी ही नहीं।  

अंत में, काल, देश, कारण-कार्य और सृष्टि करने वाली शक्ति भी मन और उसके विषयों के झूठे खेल से ही पैदा होते हैं। शुद्ध चैतन्य तो हमेशा स्पर्शरहित, निर्मल और चमकता हुआ रहता है—जैसे आकाश या शहद। वह बिना किसी प्रयास के अपनी अनंत संभावनाओं को प्रकट करता रहता है, पर कभी सीमित या विभाजित नहीं होता।  

इस चैतन्य-आकाश में विश्रांति करना—जहाँ सत्य-असत्य, वास्तविक-अवास्तविक का कोई भेद न रहे—यही इन श्लोकों की सबसे ऊँची शिक्षा है। बस इतना समझ लो : तुम वही हो—शुद्ध, अखंड, मुक्त चैतन्य। बाकी सब स्वप्न है। 

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