योग वशिष्ठ ३.१४.४६–५५
(व्यक्तिगत जीव और “मैं” का भाव चेतना के अंदर एक हल्की-सी हलचल या कल्पना मात्र है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चितश्चेत्यमहंकारः सैव राघव कल्पना।
तन्मात्रादि चिदेवातो द्वित्वैकत्वे क्व संस्थिते ॥ ४६ ॥
जीवहेत्वादिसंत्यागे त्वं चाहं चेति संत्यज ।
शेषः सदसतोर्मध्ये भवत्यर्थात्मको भवेत् ॥ ४७ ॥
चिता यथादौ कलिता स्वसत्ता सा तथोदिता ।
अभिन्ना दृश्यते व्योम्नः सत्तासत्ते न विद्महे ॥ ४८ ॥
विश्वं खं जगदीहाख्यं खमस्ति विबुधालयः ।
साकारश्चिच्चमत्काररूपत्वान्नान्यदस्ति हि ॥ ४९ ॥
यो यद्विलासस्तस्मात्स न कदाचन भिद्यते ।
अपि सावयवं तस्मात्कैवानवयवे कथा ॥ ५० ॥
चितेर्नित्यमचेत्याया निर्नाम्न्या वितताकृतेः ।
यद्रूपं जगतो रूपं तत्तत्स्फुरणरूपिणः ॥ ५१ ॥
मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि गिरयो दिशः।
इति या यास्तु रचनाश्चितस्तत्त्वाज्जगत्स्थितेः ॥ ५२॥
चितेश्चित्त्वं जगद्विद्धि नाजगच्चित्त्वमस्ति हि ।
अजगत्त्वादचिच्चित्स्याद्भानाद्भेदो जगत्कुतः ॥ ५३ ॥
चितेर्मरीचिबीजस्य निजा यान्तश्चमत्कृतिः ।
सा चैषा जीवतन्मात्रमात्रं जगदिति स्थिता ॥ ५४ ॥
चित्तात्स्वशक्तिकचनं यदहंभावनं चितः ।
जीवः स्पन्दनकर्मात्मा भविष्यदभिधो ह्यसौ ॥ ५५ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१४.४६
जिस प्रकार स्वप्न में दिखने वाली नगरी केवल मन की कल्पना मात्र होती है, वैसे ही यह सारा जगत् चेतना के अंदर एक कल्पना ही है।
३.१४.४७
जो कुछ दिखता है, वह सब चिद्घन (शुद्ध चेतना) में एक छोटी-सी तरंग मात्र है, जैसे समुद्र में लहर। वास्तव में कोई अलग जीव या संसार नहीं है।
३.१४.४८
जैसे रस्सी में साँप की कल्पना हो जाती है, उसी तरह ब्रह्म में जीव और जगत् की कल्पना हो जाती है। रस्सी के ज्ञान से साँप अपने आप मिट जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान से जीव-जगत् मिट जाता है।
३.१४.४९
यह “मैं” का भाव एक क्षणिक स्पंदन मात्र है। यह न तो सत्य है, न असत्य; यह केवल चेतना में उठी एक तरंग है जो शांत हो जाती है।
३.१४.५०
जब यह तरंग शांत हो जाती है, तब केवल शुद्ध चेतना ही शेष रहती है। उसमें न जीव रहता है, न संसार, न बंधन, न मोक्ष।
३.१४.५१
जो लोग इस “मैं” के भाव को ही सत्य मानकर चिपके रहते हैं, वे दुख पाते हैं। जो इसे केवल कल्पना जान लेते हैं, वे मुक्त हो जाते हैं।
३.१४.५२
जिस क्षण यह समझ आ जाए कि मैं ब्रह्म हूँ और यह सब मेरी ही कल्पना है, उसी क्षण सारा भ्रम दूर हो जाता है।
३.१४.५३
जैसे सोते हुए व्यक्ति को स्वप्न का दुख सत्य लगता है, जागने पर पता चलता है कि कुछ था ही नहीं, वैसे ही यह जाग्रत अवस्था का संसार भी केवल एक लंबा स्वप्न है।
३.१४.५४
इसलिए हे राम! इस “मैं” और “मेरा” के छोटे-से स्पंदन को छोड़ दो और अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाओ।
३.१४.५५
जब यह स्पंदन पूरी तरह शांत हो जाता है, तब जो शेष रहता है वही परम शांति, वही ब्रह्म, वही तुम्हारा सच्चा स्वरूप है।
शिक्षाओं का सरल सारांश:
मुख्य शिक्षा – पूर्ण अद्वैत (एकमात्र सत्य एक ही है, दूसरा कुछ भी नहीं):
१. यह सारा जगत्, शरीर, मन, देवता, दिशाएँ, पहाड़, मैं-तू, जीव-जगत् – सब कुछ शुद्ध चेतना (चित्) का अपना ही खेल है।
२. चेतना अपने आप में ही हल्की-सी कल्पना करके “मैं अलग हूँ, यह जगत अलग है” ऐसा दिखाती है, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न में नगरी बनती-मिटती है।
३. वास्तव में कभी भी कोई दूसरी चीज़ पैदा नहीं हुई। न जीव अलग है, न जगत अलग है, न समय अलग है – सब एक ही चेतना के अंदर चमक रहे हैं।
४. लहर कभी समुद्र से अलग नहीं होती, सूर्य की किरण कभी सूर्य से अलग नहीं होती – उसी तरह कुछ भी चेतना से अलग नहीं होता।
५. यह जगत् “अजगत्” है अर्थात् कभी जन्मा ही नहीं। जो दिख रहा है वह चेतना का अपना ही स्पंदन (हल्की कंपन) है।
६. “मैं शरीर हूँ, मैं करता हूँ, मुझे सुख-दुख मिलता है” – यह छोटा-सा “मैं” का भाव ही सारी माया है। यह भाव भी चेतना के अंदर की एक क्षणिक तरंग मात्र है।
७. जिस दिन यह तरंग पूरी तरह शांत हो जाती है और यह साफ दिख जाता है कि “मैं ही ब्रह्म हूँ, सब मेरी ही लीला है”, उसी दिन सारा भ्रम खत्म हो जाता है।
८. तब जो बचता है वह न “है” कहलाता है, न “नहीं है” कहलाता है – वह शुद्ध आकाश-समान चेतना है, जिसमें कोई सीमा नहीं, कोई दूसरा नहीं, केवल अपूर्व शांति और आनंद है।
संक्षेप में एक वाक्य में:
सब कुछ एक ही शुद्ध चेतना है जो अपने आप से खेल रही है; “मैं अलग हूँ” यह छोटी-सी कल्पना ही बंधन है, और इसे जान लेना ही मुक्ति है।
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