योगवशिष्ट ३.१५.१८–३१
(सर्वोत्तम जीवन भी केवल स्वप्न ही है)
श्रीराम उवाच ।
सद्बोधवृद्धये ब्रह्मन्समासेन वदाशु मे।
मण्डपाख्यानमखिलं येन बोधो विवर्धते ॥ १८ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अभूदस्मिन्महीपीठे कुलपद्मो विकाशवान् ।
पद्मो नाम नृपः श्रीमान्बहुपुत्रो विवेकवान् ॥ १९ ॥
मर्यादापालनाम्भोधिर्द्विषत्तिमिरभास्करः ।
कान्ताकुमुदिनीचन्द्रो दोषतृणहुताशनः ॥ २० ॥
मेरुर्विबुधवृन्दानां यशश्चन्द्रो भवार्णवे।
सरः सद्गुणहंसानां कमलामलभास्करः ॥ २१ ॥
संग्रामवीरुत्पवनो मनोमातङ्गकेसरी।
समस्तविद्यादयितः सर्वाश्चर्यगुणाकरः ॥ २२ ॥
सुरारिसागरक्षोभविलसन्मन्दराचलः ।
विलासपुष्पौघमधुः सौभाग्यकुसुमायुधः ॥ २३ ॥
लीलालतालास्यमरुत्साहसोत्साहकेशवः ।
सौजन्यकैरवशशी दुर्लीलावल्लिकानलः ॥ २४ ॥
तस्यास्ति सुभगा भार्या लीला नाम विलासिनी ।
सर्वसौभाग्यवलिता कमलेवोदिताऽवनौ ॥ २५ ॥
सर्वानुवृत्तिललिता लीला मधुरभाषिणी ।
सानन्दमन्दचलिता द्वितीयेन्दूदयस्मिता ॥ २६ ॥
अलकालिमनोहारिवदनाम्भोजशालिनी ।
सिताङ्गी कर्णिकागौरी जङ्गमेव सरोजिनी ॥ २७ ॥
लताविलासकुन्दौघभासिनी रसशालिनी ।
प्रवालहस्ता पुष्पाभा मधुश्रीरिव देहिनी ॥ २८ ॥
अवदाततनुः पुण्या स्पर्शनाह्लादकारिणी गङ्गेव गां गता देहवती हंसविलासिनी ॥ २९ ॥
तस्य भूतलपुष्पेषोः सकलाह्लाददायिनः ।
परिचर्यां चिरं कर्तुमन्या रतिरिवोदिता ॥ ३० ॥
उद्विग्ने प्रोद्विग्ना मुदिते मुदिता समाकुलाकुलिते ।
प्रतिबिम्बसमा कान्ता संक्रुद्धे केवलं भीता ॥ ३१ ॥
३.१५.१८: श्रीराम ने कहा — हे ब्रह्मन्! सच्ची समझ बढ़ाने के लिए शीघ्र ही मुझे संक्षेप में सम्पूर्ण मण्डप-कथा सुनाइए, जिससे बोध बढ़े।
३.१५.१९: श्रीवसिष्ठ जी बोले — इस पृथ्वी पर पद्म नाम का एक राजा हुआ जो खिले कमल की तरह सुन्दर, अनेक पुत्रों वाला, श्रीमान और विवेकी था।
३.१५.२०: वह सीमाओं का समुद्र, शत्रुओं के अंधकार का सूर्य, पत्नियों के कुमुदिनी वन का चन्द्रमा और दोष रूपी तिनकों को जलाने वाला अग्नि था।
३.१५.२१: वह देवताओं का मेरु, संसार-सागर का चन्द्रमा, सद्गुण हंसों का सरोवर और निर्मल कमलों का सूर्य था।
३.१५.२२: युद्ध में वीर-वृक्षों का पवन, मन-हाथियों का केसरी, समस्त विद्याओं का प्रियतम और सभी आश्चर्य गुणों का खजाना था।
३.१५.२३: वह दैत्य-सागर को मथने वाला मन्दराचल, विलास-पुष्पों के समूह का मधु और सौभाग्य के पुष्प-बाणों से सुसज्जित था।
३.१५.२४: वह लीला-नृत्य और उत्साह का केशव, सौजन्य के कैरव वन का चन्द्रमा और दुष्ट लीलाओं की लता को जलाने वाला अनल था।
३.१५.२५: उसकी पत्नी का नाम लीला था, अत्यन्त सुन्दर, विलासिनी और सभी सौभाग्यों से सम्पन्न, जैसे पृथ्वी पर खिला कमल।
३.१५.२६: वह हर काम में अनुगत, मधुर भाषिणी, आनन्द से धीरे-धीरे चलने वाली और दूसरा चन्द्रमा उगने जैसी मुस्कान वाली थी।
३.१५.२७: काले-काले बालों वाला मनमोहक कमल-सदृश मुख, गोरी देह, कर्णिका जैसी सुनहरी, चलती-फिरती कमलिनी थी।
३.१५.२८: लता जैसी चंचल, कुन्द-पुष्पों से चमकती, रस से भरी, पल्लव जैसे कोमल हाथों वाली, पुष्पों जैसी कान्ति और मधु-श्री की देहधारी थी।
३.१५.२९: अत्यन्त शुद्ध देह वाली, पुण्यवती, स्पर्श से आह्लाद देने वाली, पृथ्वी पर आई गंगा की तरह, हंसों से खेलती देहधारी थी।
३.१५.३०: इस भूतल के पुष्प-स्वरूप, सबको आनन्द देने वाले राजा पद्म की चिरकाल तक सेवा करने के लिए वह दूसरी रति की तरह समर्पित हो गई।
३.१५.३१: वह पति के उद्विग्न होने पर उद्विग्न, प्रसन्न होने पर प्रसन्न, व्याकुल होने पर व्याकुल हो जाती थी; वह प्रतिबिम्ब के समान थी, पर जब पति क्रोधित होते तो वह केवल डरती थी।
शिक्षाओं का सारांश:
ये श्लोक योगवाशिष्ठ के प्रसिद्ध “लीला-उपाख्यान” की शुरुआत हैं। राम वसिष्ठ जी से सच्चा बोध बढ़ाने वाली कोई कथा संक्षेप में सुनाने को कहते हैं और वसिष्ठ जी पद्म राजा और उनकी पत्नी लीला की कथा शुरू करते हैं।
राजा पद्म को असंख्य सुन्दर उपमाओं से आदर्श राजा के रूप में चित्रित किया गया है — बुद्धिमान, शक्तिशाली, गुणवान और हर उत्तम विशेषता से परिपूर्ण। इतनी प्रशंसा का एकमात्र उद्देश्य यह दिखाना है कि सबसे उत्तम सांसारिक जीवन भी माया के दायरे में ही है।
रानी लीला का वर्णन भी उतना ही सुन्दर है। वे आदर्श पत्नी के रूप में दिखाई गई हैं जो पति के हर भाव की छाया मात्र हैं — पति खुश तो वे खुश, पति चिन्तित तो वे चिन्तित, पति क्रुद्ध तो वे केवल भयभीत।
यह दाम्पत्य प्रेम और वैवाहिक जीवन का सर्वोत्तम आदर्श दिखाता है, पर आने वाली कथा यही सिद्ध करेगी कि यह सर्वोत्तम जीवन भी केवल स्वप्न है और पद्म-लीला दोनों अंत में स्वप्न की सत्यता समझकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मुक्त हो जाएँगे।
इस प्रकार मंच तैयार होता है: जब इतने उत्तम राजा-रानी भी समझ जाते हैं कि उनका सारा संसार स्वप्न मात्र है और ज्ञान के लिए सब त्याग देते हैं, तो साधारण मनुष्य को तो आत्म-सत्य की खोज करने का और भी अधिक कारण है।
No comments:
Post a Comment