योगवशिष्ट ३.१४.६४–७४
(ब्रह्मांड में आकाश, वायु, जल, प्रकाश, शरीर आदि सब कुछ केवल शुद्ध चेतना से अपने आप उत्पन्न होता है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वयं विचित्रं स्फुरति चिदण्डकमनाहतम् ।
स्वयं विलक्षणस्पन्दं चिद्वायुरण्डजात्मकः ॥ ६४ ॥
स्वयं विचित्रं कचनं चिद्वारि न निखातगम् ।
स्वयं विचित्रधातुत्वं श्रेष्ठाङ्गमपि निर्मितम् ॥ ६५ ॥
स्वविचित्ररसोल्लासा चिज्ज्योत्स्ना सततोदिता ।
स्वयं चिदेव प्रकटश्चिदालोको महात्मकः ॥ ६६ ॥
स्वयमस्तं गते बाह्ये स्वज्ञानादुदिता चितिः ।
स्वयं जडेषु जाड्येन पदं सौषुप्तमागता ॥ ६७ ॥
स्वयं स्पन्दितयास्पन्दिचित्त्वाच्चिति महानभ ।
चित्प्रकाशप्रकाशो हि जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६८ ॥
चिदाकाशैकशून्यत्वं जगदस्ति च नास्ति च ।
चिदालोकमहारूपं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६९ ॥
चिन्मारुतपरिस्पन्दो जगदस्ति च नास्ति च ।
चिद्धनध्वान्तकृष्णत्वं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ७० ॥
चिदर्कालोकदिवसो जगदस्ति च नास्ति च ।
चित्कज्जलरजस्तैलपरमाणुर्जगत्क्रमः ॥ ७१ ॥
चिदग्न्यौष्ण्यं जगल्लेखा जगच्चिच्छङ्खशुक्लता ।
जगच्चिच्छैलजठरं चिज्जलद्रवता जगत् ॥ ७२ ॥
जगच्चिदिक्षुमाधुर्यं चित्क्षीरस्निग्धता जगत् ।
जगच्चिद्धिमशीतत्वं चिज्ज्वालाज्वलनं जगत् ॥ ७३ ॥
जगच्चित्सर्षपस्नेहो वीचिश्चित्सरितो जगत् ।
जगच्चित्क्षौद्रमाधुर्यं जगच्चित्कनकाङ्गदम् ॥ ७४ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.१४.६४
चेतना का अंडा (ब्रह्मांड) अपने आप ही नाना प्रकार से चमकता है, बिना किसी टक्कर के। चेतना की हवा खुद ही अनोखे ढंग से हिलती है और ब्रह्मांड का रूप ले लेती है।
३.१४.६५
चेतना का जल बिना गिरे ही तरह-तरह से चमकता है। चेतना ने स्वयं ही सबसे अच्छे शरीर को भी अनेक अंगों सहित बना लिया है।
३.१४.६६
शुद्ध चेतना की चाँदनी सदा स्वादपूर्ण उल्लास के साथ उदित होती है। चेतना ही स्वयं महान चेतना-प्रकाश के रूप में प्रकट होती है।
३.१४.६७
बाहरी दुनिया के डूब जाने पर अपने ज्ञान से चेतना उदित होती है। फिर जड़ वस्तुओं को जड़ता देकर वह सुषुप्ति की अवस्था में पहुँच जाती है।
३.१४.६८
चेतना के स्पंदन से महान आकाश भी स्पंदित होता है। चेतना का प्रकाश चमकता है, इसलिए जगत है भी और नहीं भी।
३.१४.६९
जगत चेतना के आकाश जैसी शून्यता है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना के प्रकाश का महान रूप है – है भी और नहीं भी।
३.१४.७०
जगत चेतना की हवा का स्पंदन है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना के अंधकार की कालीमा है – है भी और नहीं भी।
३.१४.७१
जगत चेतना के सूर्य का दिन है – है भी और नहीं भी। जगत चेतना में काजल, धूल और तेल की बूंदों की तरह उत्पन्न होता है।
३.१४.७२
जगत चेतना की अग्नि की गर्म रेखा है, जगत चेतना के शंख की सफेदी है। जगत चेतना के पर्वत का भीतर है, जगत चेतना के जल की तरलता है।
३.१४.७३
जगत चेतना के गन्ने की मिठास है, चेतना के दूध की चिकनाई है। जगत चेतना के हिम की ठंडक है, चेतना की ज्वाला का जलना है।
३.१४.७४
जगत चेतना के तिल में तेल है, तरंगें चेतना की नदियाँ हैं – यही जगत है। जगत चेतना के शहद की मिठास है, जगत चेतना का सोने का आभूषण है।
शिक्षाओं का सरल सार:
१. ब्रह्मांड में आकाश, वायु, जल, प्रकाश, शरीर आदि सब कुछ केवल शुद्ध चेतना से अपने आप उत्पन्न होता है। इसके लिए बाहर कुछ भी जरूरी नहीं।
२. चेतना अनंत आकाश की तरह है जो अपने आप चमकती है। वह लाखों रूपों में खेलती है, पर वास्तव में कभी बदलती नहीं और सीमित भी नहीं होती।
३. जब हम सोचते हैं कि जगत है तो चेतना के जागने और चमकने से वह दिखाई देता है। जब चेतना विश्राम करती है (जैसे सुषुप्ति में) तो जगत गायब हो जाता है।
४. एक ही चेतना अनेक रूपों में जगत बन जाती है – कभी प्रकाश, कभी अंधेरा, गर्मी, ठंडक, मिठास, कठोरता, लहरें, सोना – सब कुछ केवल चेतना का अलग-अलग दिखना है।
५. इसलिए जगत है भी और नहीं भी। चेतना में भ्रम के रूप में है, पर सच्चाई में केवल शुद्ध चेतना ही है, इसके अलावा कुछ भी नहीं।
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