योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७
(ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उत्पन्न एक प्रक्षेपण है)
श्रीराम उवाच ।
आतिवाहिकतामेति आधिभौतिक एव किम्।
उतान्य इति मे ब्रूहि येनोह्य इव भोः प्रभो ॥ २८॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बहुशो ह्युक्तमेतत्ते न गृह्णासि किमुत्तम।
आतिवाहिक एवास्ति नास्त्येवेहाधिभौतिकः ॥ २९॥
तस्यैवाभ्यसतोऽप्येति साधिभौतिकतामतिः।
यदा शाम्यति सैवास्य तदा पूर्वा प्रवर्तते ॥ ३०॥
तदा गुरुत्वं काठिन्यमिति यश्च मुधा ग्रहः।
शाम्येत्स्वप्ननरस्येव बोद्धुर्बोधान्निरामयात् ॥ ३१॥
लघुतूलसमापत्तिस्ततः समुपजायते।
स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानादिव देहस्य योगिनः ॥ ३२॥
स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानाद्यथा देहो लघुर्भवेत्।
तथा बोधादयं देहः स्थूलवत्प्लुतिमान्भवेत् ॥ ३३॥
अनेकदिनसंकल्पदेहे परिणतात्मनाम्।
अस्मिन्देहे शवे दग्धे तत्रैवास्थितिमीयुषाम् ॥ ३४॥
लघुदेहानुभवनमवश्यं भावि वै तथा।
प्रबोधातिशयादेति जीवतामपि योगिनाम् ॥ ३५॥
उदितायां स्मृतौ तत्र संकल्पात्माहमित्यलम्।
यादृशः स भवेद्देहस्तादृशोऽयं प्रबोधतः ॥ ३६॥
भ्रान्तिरेवमियं भाति रज्ज्वामिव भुजङ्गता।
किं नष्टमस्यां नष्टायां जातायां किं प्रजायते ॥ ३७॥
श्रीराम पूछते हैं:
३.५७.२८
क्या यही भौतिक शरीर सूक्ष्म शरीर बन जाता है, या वह कुछ अलग है? कृपया स्पष्ट बताइए।
महर्षि वशिष्ठ कहते हैं:
३.५७.२९–३३
> मैंने यह कई बार बताया है, फिर भी तुम इसे पूरी तरह नहीं समझते। वास्तव में केवल सूक्ष्म शरीर ही है, यह स्थूल शरीर वास्तव में नहीं है।
> बार-बार के अभ्यास और कल्पना से मन भौतिक शरीर का अनुभव करता है। जब यह कल्पना शांत हो जाती है, तब सूक्ष्म अवस्था फिर से प्रकट होती है।
> भारीपन और कठोरता जैसी धारणाएँ केवल भ्रम हैं। जैसे स्वप्न देखने वाला जागने पर समझता है कि कोई भार या बीमारी नहीं थी, वैसे ही ये धारणाएँ मिट जाती हैं।
> इसके बाद हल्केपन की अवस्था उत्पन्न होती है, जैसे रूई की तरह। जैसे स्वप्न में जब हम समझते हैं कि यह स्वप्न है, तो शरीर हल्का लगता है।
> जैसे स्वप्न में जागरूक होने पर शरीर हल्का हो जाता है, वैसे ही ज्ञान से यह शरीर हल्का और स्वतंत्र गति वाला प्रतीत होता है।
३.५७.३४–३७
> जो लोग लंबे समय तक कल्पित शरीर से जुड़े रहते हैं, वे भौतिक शरीर के नष्ट होने के बाद भी उसी कल्पना में बने रहते हैं।
> ऐसी स्थिति में सूक्ष्म और हल्के शरीर का अनुभव होना निश्चित है। जीवित योगी भी उच्च जागरूकता से इस अवस्था को प्राप्त करते हैं।
> जब स्मृति और जागरूकता उत्पन्न होती है, तब “मैं यही हूँ” की भावना उसी कल्पना के अनुसार शरीर का अनुभव कराती है।
> यह सब भ्रम है, जैसे रस्सी में साँप दिखाई देना। जब यह भ्रम मिट जाता है, तब कुछ भी नष्ट नहीं होता और कुछ नया उत्पन्न नहीं होता।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
सूक्ष्म शरीर ही वास्तविक अनुभव का माध्यम है, जबकि स्थूल शरीर केवल एक दिखाई देने वाला रूप है। यह शिक्षा हमारी सामान्य धारणा को चुनौती देती है कि भौतिक जगत ही वास्तविक है।
मन शरीर के अनुभव को गहराई से प्रभावित करता है। लंबे समय तक किसी रूप से अपनी पहचान बनाने से मन भारीपन, कठोरता और सीमाओं का अनुभव करता है। जब यह पहचान और आदत कमजोर होती है, तो ये सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। योग का मार्ग इन मानसिक धारणाओं को पहचानने और उनसे मुक्त होने का मार्ग है।
इन श्लोकों में स्वप्न का उदाहरण दिया गया है। स्वप्न में शरीर वास्तविक लगता है, लेकिन जैसे ही हम जान लेते हैं कि यह स्वप्न है, शरीर हल्का और स्वतंत्र हो जाता है। उसी प्रकार आत्मज्ञान से शरीर का अनुभव बदल जाता है और वह बंधनकारी नहीं रहता।
ये शिक्षा मृत्यु के बाद की अवस्था को भी समझाती है। जो व्यक्ति अपनी कल्पित पहचान से गहराई से जुड़े रहते हैं, वे शरीर के नष्ट होने के बाद भी उसी सूक्ष्म रूप में अनुभव करते रहते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अनुभव का आधार भौतिक शरीर नहीं, बल्कि मन की प्रवृत्तियाँ हैं।
अंत में, रस्सी और साँप का उदाहरण दिया गया है। जैसे अज्ञान के कारण रस्सी में साँप दिखाई देता है और ज्ञान से वह भ्रम मिट जाता है, वैसे ही शरीर का भ्रम भी ज्ञान से समाप्त हो जाता है। इसमें न कुछ नष्ट होता है, न कुछ नया बनता है—केवल अज्ञान का अंत होता है।