योगवशिष्ट ३.१५.१–१०
(जैसे समुद्र की लहरें जल से अलग कभी नहीं होतीं, ठीक वैसे ही चेतना अपने भीतर ही हिलोरें लेती हुई जगत्-रूप बन जाती है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगदाकाशमेवेदं यथा हि व्योम्नि मौक्तिकम् ।
विमले भाति स्वात्मैव जगच्चिद्गगनं यथा ॥ १ ॥
अनुत्कीर्णै भातीव त्रिजगच्छालभञ्जिका ।
चित्स्तम्भेनैव सोत्कीर्णा नचोत्कर्तात्र विद्यते ॥ २ ॥
समुद्रेऽन्तर्जलस्पन्दाः स्वभावादच्युता अपि ।
वीचिवेगा भवन्तीव परे दृश्यविदस्तथा ॥ ३ ॥
जालान्तर्गतसूर्याभा जालाकाररजांस्यपि ।
जगद्भानं प्रति स्थूलान्यणुं प्रति यथाचलाः ॥ ४ ॥
जगद्भानं न भातीदं ब्रह्मणो व्यतिरेकतः ।
जालसूर्यांशुजालं तु व्यतिरेकानुभूतिदम् ॥ ५ ॥
अनुभूतान्यपीमानि जगन्ति व्योमरूपिणि ।
पृथ्व्यादीनि न सन्त्येव स्वप्नसंकल्पयोरिव ॥ ६ ॥
पिण्डग्रहो जगत्यस्मिन्विज्ञानाकाशरूपिणि ।
मरुनद्यां जलमिव न संभवति कुत्रचित् ॥ ७ ॥
जगत्यपिण्डग्राहेऽस्मिन्संकल्पनगरोपमे ।
मरौ सरिदिवाभाति दृश्यता भ्रान्तिरूपिणी ॥ ८ ॥
स्वप्नाद्दृश्येव जगतां तुलादेशेन केन च ।
तुलिता कलनोन्मुक्ता दृश्यश्रीर्व्योम जृम्भते ॥ ९ ॥
वर्जयित्वा ज्ञविज्ञानं जगच्छब्दार्थभाजनम् ।
जगद्ब्रह्मस्वशब्दानामर्थे नास्त्येव भिन्नता ॥ १० ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१५.१
यह जगत् केवल आकाश ही है, जैसे आकाश में मोती दिखाई देता है। निर्मल चेतना में केवल अपना स्वयं ही चमकता है; जगत् भी ठीक वैसे ही चैतन्य आकाश के समान चमकता है।
३.१५.२
तीन लोकों की मूर्ति बिना तराशे ही तराशी हुई-सी दिखती है। वह चेतना के खंभे से ही तराशी गई है, कोई दूसरा तराशने वाला कहीं नहीं है।
३.१५.३
जैसे समुद्र में जल की लहरें स्वभाव से ही उठती हैं पर जल से कभी अलग नहीं होतीं, उसी तरह परम द्रष्टा (चेतना) में दृश्य जगत् प्रकट होते हैं।
३.१५.४
जैसे झरोखे के जाल में से गुजरती सूर्य की किरणें जाल के छेदों का आकार ले लेती हैं और स्थूल-सूक्ष्म, स्थिर-चलायमान दिखती हैं, ठीक वही हाल जगत् के प्रकट होने का है।
३.१५.५
ब्रह्म से अलग होकर यह जगत् चमकता ही नहीं। जाल में से निकली सूर्य-किरणों का जाल अलग अनुभव होता है, पर जगत् का प्रकाश ब्रह्म से अलग कभी नहीं होता।
३.१५.६
ये सारे जगत् अनुभव में आते हैं, पर आकाश-सदृश चेतना में इनका अस्तित्व बिल्कुल नहीं — जैसे स्वप्न या कल्पना में पृथ्वी आदि तत्त्व सचमुच नहीं होते।
३.१५.७
विज्ञान-आकाश रूप इस जगत् में पिंड ग्रहण (ठोस पदार्थ की धारणा) उतनी ही असंभव है जितनी मरुस्थल की नदी में जल।
३.१५.८
जब इस जगत् को पिंड-रहित (ठोसपन-रहित) देखा जाता है, तब यह आकाश-पुरी जैसा लगता है और दृश्यता मरुभूमि में नदी की तरह भ्रम मात्र दिखती है।
३.१५.९
जैसे स्वप्न के दृश्य किसी तराजू में कभी तौले नहीं जा सकते, उसी तरह कल्पना से मुक्त होने पर दृश्य-श्री केवल आकाश की तरह फैल जाती है।
३.१५.१०
ज्ञाता और ज्ञान को अलग रख दो तो ‘जगत्’ शब्द का कोई अलग अर्थ ही नहीं रह जाता। जगत्, ब्रह्म और आत्मा — इन शब्दों के अर्थ में जरा-सी भी भिन्नता नहीं है।
शिक्षा का विस्तृत सारांश:
ये दस श्लोक (३.१५.१ से ३.१५.१०) योगवासिष्ठ के सर्वोच्च अद्वैत-सिद्धांत को प्रस्तुत करते हैं — जगत् का चेतना या ब्रह्म से अलग कोई अस्तित्व नहीं है।
पहला शिक्षण यह है कि जगत् केवल खाली आकाश है, जैसे आकाश में मोती का भ्रम होता है या बिना तराशे ही मूर्ति तराशी हुई-सी लगती है। एकमात्र निर्मल चेतना ही है, उसके बाहर कुछ भी नहीं। जगत् का ठोस दिखना केवल भ्रम है।
दूसरे, जैसे समुद्र की लहरें जल से अलग कभी नहीं होतीं और झरोखे के जाल में सूर्य-किरणें ही जाल का आकार ले लेती हैं, ठीक वैसे ही चेतना अपने भीतर ही हिलोरें लेती हुई जगत्-रूप बन जाती है। कोई दूसरा सृष्टिकर्ता नहीं, कोई अलग पदार्थ नहीं।
तीसरे, द्वैत का भान होते ही जगत् चमकने लगता है, पर वास्तव में वह कभी ब्रह्म से अलग होता ही नहीं। जाल में सूर्य-किरणों का अलग दिखना भ्रम है, वही भ्रम जगत् का भी है। भेद-बुद्धि हटाओ तो कुछ बचता ही नहीं।
चौथे, स्वप्न की नगरी या मरिचिका का जल जितना असत्य है, उतने ही असत्य ये अनुभव में आने वाले जगत्, शरीर और भूत हैं। शुद्ध चेतना-आकाश में ठोस पदार्थ की कल्पना नामुमकिन है। ठोसपन का भाव छूटते ही केवल खुला शांत आकाश शेष रह जाता है।
पांचवें और अंतिम शिक्षण — जब जानने वाला और जानना भी लीन हो जाए तब ‘जगत्’ शब्द का कोई अलग विषय ही नहीं रह जाता। जगत्, ब्रह्म और आत्मा — तीनों शब्द एक ही तत्त्व की ओर इशारा करते हैं। केवल ब्रह्म है, जगत् कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं। यही परम सत्य है।
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