Tuesday, November 18, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक १८–२७

योग वशिष्ठ ३.१४.१८–२७  
(केवल शुद्ध चैतन्य ही अस्तित्व है, और मैं वही हूँ। जब यह सत्य अटल हो जाता है, तब सारे बंधन सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एक एव न जीवोऽस्ति राशीनां संभवः कुतः ।
शशशृङ्गं समुड्डीय प्रयातीव हि ते वचः ॥ १८ ॥
न जीवोऽस्ति न जीवानां राशयः सन्ति राघव ।
न चैकः पर्वतप्रख्यो जीवपिण्डोऽस्ति कश्चन ॥ १९ ॥
जीवशब्दार्थकलनाः समस्तकलनान्विताः ।
नेह काश्चन सन्तीति निश्चयोऽस्तु तवाचलः ॥ २० ॥
शुद्धचिन्मात्रममलं ब्रह्मास्तीह हि सर्वगम् ।
तद्यथा सर्वशक्तित्वाद्विन्दते याः स्वयं कलाः ॥ २१ ॥
चिन्मात्रानुक्रमेणैव संप्रफुल्ललतामिव।
ननु मूर्ताममूर्ता वा तामेवाशु प्रपश्यति ॥ २२ ॥
जीवो बुद्धिः क्रियास्पन्दो मनोद्वित्वैक्यमित्यपि ।
स्वसत्तां प्रकचन्तीं तां नियोजयति वेदने ॥ २३ ॥
साऽबुद्धैव भवत्येवं भवेद्ब्रह्मैव बोधतः।
अबोधः प्रेक्षया याति नाशं न तु प्रबुध्यते ॥ २४ ॥
यथान्धकारो दीपेन प्रेक्ष्यमाणः प्रणश्यति ।
न चास्य ज्ञायते तत्त्वमबोधस्यैवमेव हि ॥ २५ ॥
एवं ब्रह्मैव जीवात्मा निर्विभागो निरन्तरः ।
सर्वशक्तिरनाद्यन्तो महाचित्साररूपवान् ॥ २६ ॥
सर्वानणुतया त्वस्य न क्वचिद्भेदकल्पना ।
विद्यते या हि कलना सा तदेवानुभूतितः ॥ २७ ॥

महार्षि वशिष्ठ ने उत्तर दिया:

३.१४.१८  
वास्तव में एक भी जीव नहीं है। फिर जीवों का समूह या झुंड कहाँ से होगा? तुम्हारा “बहुत-से जीव हैं” कहना ठीक उसी तरह है जैसे कोई कहे कि “खरगोश के सींग” आकाश में उड़ रहे हैं—ऐसा कुछ है ही नहीं।

३.१४.१९  
हे राघव! जीव नाम की कोई चीज़ सचमुच नहीं है, इसलिए न जीवों का समुदाय है, न बहुत सारे जीवों से बना कोई विशाल पर्वत-सा ढेर है।

३.१४.२०  
“जीव” शब्द से मन में जो भी अर्थ और कल्पनाएँ उठती हैं, और उनसे जुड़ी सारी दूसरी कल्पनाएँ—इनमें से कुछ भी कहीं सचमुच नहीं है। यह बात तुम्हारे मन में पूरी तरह पक्की और अटल हो जाए।

३.१४.२१  
यहाँ केवल शुद्ध चैतन्य ही है—निर्मल, असीम चेतना, एकमात्र ब्रह्म जो सर्वत्र व्याप्त है। यही सर्वशक्तिमान ब्रह्म अपनी इच्छा से तरह-तरह के रूप और आभास (कला) धारण कर लेता है, जैसा स्वयं चाहता है।

३.१४.२२  
जैसे लता एक के बाद एक फूल खोलती जाती है, वैसे ही निराकार शुद्ध चैतन्य क्षणमात्र में अपने द्वारा रचे हुए साकार और निराकार रूपों को स्वयं ही देखता और अनुभव करता है—और वे सब वही स्वयं हैं।

३.१४.२३  
वही चैतन्य अपने आपको जीव, बुद्धि, कर्म की हल्की सी हलचल और “मैं-तू” के द्वैत भाव के रूप में प्रकट करता है, और फिर इन्हीं के द्वारा विषयों (विश्व) का अनुभव करता है।

३.१४.२४  
जब वह अपनी सच्ची प्रकृति को भूल जाता है, तब अज्ञानी जीव बन जाता है। जब जागता है और स्वयं को जान लेता है, तब वही ब्रह्म है। अज्ञान को केवल ध्यान से देखते ही वह गायब हो जाता है; उसे जगाने की जरूरत नहीं—वह अपने आप मिट जाता है।

३.१४.२५  
जैसे दीया जलाते ही अंधेरा पूरी तरह खत्म हो जाता है और बाद में उस अंधेरे का कोई पदार्थ नहीं मिलता, ठीक वही हाल “मैं अलग जीव हूँ” वाले अज्ञान का है—उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है; सच्चा ज्ञान चमकते ही वह लुप्त हो जाता है।

३.१४.२६  
इसलिए जीव और परमात्मा—दोनों केवल ब्रह्म ही हैं। वह खंड-रहित, अखंड, सर्वशक्तिमान, आदि-अनादि है, जिसका स्वरूप शुद्ध चैतन्य का महासागर है।

३.१४.२७  
ब्रह्म परमाणु से भी सूक्ष्म और सर्वव्यापी है, इसलिए उसमें कोई वास्तविक भेद या विभाग कल्पना भी नहीं की जा सकती। जो भी भेद दिखाई देता है, वही भेद जब सच्चे अनुभव में आता है तो केवल ब्रह्म ही होता है।

इन श्लोकों का सरल सार:
ये श्लोक अद्वैत वेदांत की सबसे ऊँची शिक्षा देते हैं—वास्तव में ब्रह्म के अलावा कोई अलग जीव नहीं है। एक जीव भी नहीं, बहुत सारे जीवों का समूह भी नहीं—यह सब खरगोश के सींग जैसी कल्पना मात्र है। “जीव” की कल्पना को गहराई से देखते ही पता चलता है कि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं।

केवल एक ही है—शुद्ध, असीम, निर्लेप चैतन्य (ब्रह्म)। अपनी अनंत लीला-शक्ति से वह स्वयं ही असंख्य रूप, शरीर, मन, जगत रच लेता है—बिल्कुल जैसे नींद में स्वप्न देखने वाला अपने ही मन में सारा स्वप्न-जगत बना लेता है। अज्ञान में ये सब सच्चे लगते हैं, पर हैं हमेशा ब्रह्म से अलग नहीं।

“मैं अलग जीव हूँ” यही अज्ञान है। यह अज्ञान अंधेरा है—कोई वास्तविक पदार्थ नहीं। ज्ञान का प्रकाश आते ही अपने आप मिट जाता है। जीव को सुधारने, बदलने या ब्रह्म बनाने की कोई जरूरत नहीं—जीव शुरू से अंत तक ब्रह्म ही था। कभी कोई वास्तविक बंधन, सीमा या भेद था ही नहीं।

अंतिम शिक्षा: जो भी भेद या अलगपन दिख रहा है, वह सच्चे ज्ञान में केवल ब्रह्म ही है। इस बात को अटल कर लो—केवल शुद्ध चैतन्य ही है, और मैं वही हूँ। यह सत्य जब डगमगाता नहीं, तब सारे बंधन सदा के लिए खत्म हो जाते हैं और तुम अनंत, शांत, सदा-मुक्त स्वरूप में स्थित हो जाते हो।

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