योगवशिष्ट ३.१४.७५–८६
(संसार और शुद्ध चेतना में जरा सा भी अंतर नहीं है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जगच्चित्पुष्पसौगन्ध्यं चिल्लताग्रफलं जगत् ।
चित्सत्तैव जगत्सत्ता जगत्सत्तैव चिद्वपुः ॥ ७५ ॥
अत्र भेदविकारादि नखे मलमिव स्थितम् ।
इतीदं सन्मयत्वेन सदसद्भुवनत्रयम् ॥ ७६ ॥
अविकल्पतदात्मत्वात्सत्तासत्तैकतैव च ।
अवयवावयविता शब्दार्थौ शशशृङ्गवत् ॥ ७७ ॥
अनुभूत्यपलापाय कल्पितो यैर्धिगस्तु तान् ।
न विद्यते जगद्यत्र साद्र्यब्ध्युर्वीनदीश्वरम् ॥ ७८ ॥
चिदेकत्वात्प्रसङ्गः स्यात्कस्तत्रेतरविभ्रमः ।
शिलाहृदयपीनापि स्वाकाशे विशदैव चित् ॥ ७९ ॥
धत्तेऽन्तरखिलं शान्तं संनिवेशं यथा शिला ।
पदार्थनिकराकाशे त्वयमाकाशजो मलः ॥ ८० ॥
सत्तासत्तात्मतात्वत्तामत्ताश्लेषा न सन्ति ते ।
पल्लवान्तरलेखौघसंनिवेशवदाततम् ॥ ८१ ॥
अन्यानन्यात्मकमिदं धत्तेऽन्तश्चित्स्वभावतः ।
समस्तकारणौघानां कारणादि पितामहः ॥ ८२ ॥
स्वभावतो कारणात्म चित्तं चिद्ध्यनुभूतितः ।
न चासत्त्वमचेत्यायाश्चितो वाचापि सिद्ध्यति ॥ ८३ ॥
यदस्ति तदुदेतीति दृष्टं बीजादिवाङ्कुरः ॥ ८४ ॥
गगन इव सुशून्यभेदमस्ति त्रिभुवनमङ्ग महाचितोऽन्तरस्याः ।
परमपदमयं समस्तदृश्यं त्विदमिति निश्चयवान्भवानुभूतेः ॥ ८५ ॥
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ८६ ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.१४.७५
यह संसार शुद्ध चैतन्य रूपी फूल की सुगंध है। संसार चैतन्य रूपी लता पर लटकता हुआ फल है। संसार की सत्ता केवल चेतना की सत्ता है और चेतना का शरीर ही संसार की सत्ता है।
३.१४.७६
इसमें भेद, विकार आदि नाखून के नीचे की मैल की तरह हैं। इसलिए यह तीनों लोक – सत-असत जो भी हों – केवल सत्स्वरूप ही हैं।
३.१४.७७
क्योंकि इसमें कोई विकल्प नहीं है और यह सबका स्वरूप है, इसलिए सत और असत एक ही हैं। अवयव-अवयविता (अंश और पूर्ण) शब्द मात्र हैं, खरगोश के सींग जैसे – बिल्कुल असत्य।
३.१४.७८
जो लोग अपनी अनुभूति को मिटाने के लिए जगत की कल्पना करते हैं, उन्हें धिक्कार है। सच में कोई जगत है ही नहीं – न पर्वत, न समुद्र, न नदियाँ, न पृथ्वी, न ईश्वर।
३.१४.७९
चेतना एक ही है, वहाँ दूसरा भ्रम कहाँ से आएगा? पत्थर जैसा कठोर हृदय भी अंदर से खाली आकाश जैसा है। चेतना सदा निर्मल और स्वच्छ है।
३.१४.८०
जैसे पत्थर सब कुछ अपने अंदर शांत भाव से रखता है, वैसे ही चेतना अपने आकाश में सारी वस्तुओं को रखती है। यह जो मैल दिख रहा है (जगत), वह इसी चैतन्य-आकाश से पैदा हुआ है।
३.१४.८१
सत-असत, स्व-पर का आलिंगन कुछ भी नहीं है। यह पत्ते के अंदर की कोमल रेखाओं की तरह फैला हुआ है।
३.१४.८२
अपने स्वभाव से ही चेतना सब “दूसरे” को अपने अंदर रखती है। यह सभी कारणों का भी कारण, सारे कारण-समूह का दादा है।
३.१४.८३
स्वभाव से ही चेतना कारण है, अनुभव होने से चेतना है। चेतना के लिए असत या जड़ता शब्दों से भी सिद्ध नहीं हो सकती।
३.१४.८४
जो सच में है, वही प्रकट होता है – जैसे बीज से ही अंकुर निकलता है।
३.१४.८५
हे प्रिय, तीनों लोक इस महान चेतना के अंदर पूरी तरह खाली भेद की तरह हैं, जैसे आकाश में कोई भेद नहीं। अपनी अनुभूति से निश्चय कर लो कि यह सारा दिखने वाला जगत परम पद ही है।
३.१४.८६
मुनि के ऐसा कहते ही दिन ढल गया, सूर्य अस्ताचल को चला गया। सभा ने नमस्कार करके स्नान करने चली गई, सूरज की किरणें भी नीले क्षितिज के साथ चली गईं।
शिक्षा का सरल सारांश:
ये श्लोक जोर देकर बताते हैं कि संसार और शुद्ध चेतना में जरा सा भी अंतर नहीं है। संसार चेतना का सुगंध, फल और शरीर ही है। संसार की जो सत्ता दिखती है वह चेतना की सत्ता है और चेतना का स्वरूप ही संसार है। वास्तव में कोई द्वैत है ही नहीं – जो कुछ दिख रहा है वह ब्रह्म ही है।
सारे भेद, परिवर्तन, अंश-पूर्ण, सत-असत, मैं-दूसरा – ये सब शब्दों की जादूगरी या पत्ते की रेखाएँ मात्र हैं। इनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं। सृष्टि, कारण, देवता, पर्वत, समुद्र आदि सब केवल अपनी सच्ची अनुभूति को ढँकने के लिए कल्पना किए गए हैं। सच में इनमें से कुछ भी अलग से नहीं है।
चेतना एकमात्र सत्य है जो अपने आप सिद्ध है। वह सारे कारणों का भी कारण और सबसे पहला कारण है, फिर भी अपरिवर्तित और शुद्ध रहती है। चेतना के लिए कभी जड़ता या असत्य सिद्ध नहीं हो सकता क्योंकि वह अनुभव का आधार है। जो सच में है वही प्रकट होता है, असत्य कभी उत्पन्न नहीं होता।
तीनों लोक और सारी दिखने वाली चीजें महान चेतना के आकाश में बिल्कुल खाली भेद की तरह हैं – इनमें कोई पदार्थ नहीं। ज्ञानी व्यक्ति अपनी सीधी अनुभूति से निश्चय करता है कि यह सारा दृश्य जगत केवल परम निःद्वैत अवस्था ही है।
इस प्रकार वसिष्ठ जी यह उपदेश समाप्त करते हैं और दिन ढल जाता है – इसका अर्थ है कि जब यह ज्ञान का प्रकाश हो जाता है तो सारी दिखने वाली बहुरूपता अपने आप शांत हो जाती है, जैसे सूर्यास्त के साथ दिन की सारी हलचल समाप्त हो जाती है।
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