Thursday, November 20, 2025

अध्याय ३.१४, श्लोक ३६–४५

योग वशिष्ठ ३.१४.३६–४५
("मैं"  की भावना बहुत छोटे-छोटे जीवों से शुरू होती है और धीरे-धीरे मजबूत होती जाती है, जब तक कि व्यक्ति सच्चा अनंत आत्मा का साक्षात्कार न कर ले)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चेत्यसंवेदनाज्जीवो भवत्यायाति संसृतिम् ।
तदसंवेदनाद्रूपं समायाति समं पुनः ॥ ३६ ॥
एवं कनिष्ठजीवानां ज्येष्ठजीवक्रमाक्रमैः ।
समुदेत्यात्मजीवत्वं ताम्राणामिव हेमता ॥ ३७ ॥
अत्रान्तरे महाकाश इत्थमेष गणोऽप्यसन् ।
स्वात्मैव सदिवोदेति चिच्चमत्करणात्मकः ॥ ३८ ॥
स्वयमेव चमत्कारो यः समापद्यते चितः।
भविष्यन्नामदेहादि तदहंभावनं विदुः ॥ ३९ ॥
चितो यस्माच्चिदालेहस्तन्मयत्वादनन्तकः ।
स एष भुवनाभोग इति तस्यां प्रबिम्बति ॥ ४० ॥
परिणामविकारादिशब्दैः सैव चिदव्यया ।
तादृग्रूपादभेद्यापि स्वशक्त्यैव विबुध्यते ॥ ४१ ॥
अविच्छिन्नविलासात्म स्वतो यत्स्वदनं चितः ।
चेत्यस्य च प्रकाशस्य जगदित्येव तत्स्थितम् ॥ ४२ ॥
आकाशादपि सूक्ष्मैषा या शक्तिर्वितता चितः ।
सा स्वभावत एवैतामहंतां परिपश्यति ॥ ४३ ॥
आत्मन्यात्मात्मनैवास्या यत्प्रस्फुरति वारिवत् ।
जगदन्तमहंताणुं तदैषा संप्रपश्यति ॥ ४४ ॥
चमत्कारकरी चारु यच्चमत्कुरुते चितिः ।
स्वयं स्वात्मनि तस्यैव जगन्नाम कृतं ततः ॥ ४५ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:

३.१४.३६
कीट, पतंग, जूँ, मच्छर आदि बहुत छोटे जीवों में भी "मैं"  और "मेरा"  का थोड़ा-सा भाव रहता है।

३.१४.३७
जैसे-जैसे शरीर बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे अहंकार भी बढ़ता जाता है; हाथी और मनुष्य तक पहुँचते-पहुँचते यह अहंकार बहुत मजबूत हो जाता है।

३.१४.३८
जो लोग अपने को केवल शरीर ही मानते हैं, उनके भीतर यह "मैं" का भाव और भी गहरा और मजबूत हो जाता है।

३.१४.३९
जिन्होंने आत्मा के बारे में कुछ विचार किया है, पर अभी पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ, उनके यहाँ भी अहंकार रहता ही है, पर थोड़ा कम हो जाता है।

३.१४.४०
जो योगी पूर्ण रूप से आत्मा में स्थित हो चुके हैं, उनमें यह "मैं" का भाव बहुत सूक्ष्म रह जाता है, जैसे सोते हुए व्यक्ति में भी थोड़ी-सी चेतना रहती है।

३.१४.४१
जिन्होंने ब्रह्म को पूरी तरह जान लिया है, उन महात्माओं में भी जीते-जी थोड़ा-सा अहंकार शेष रहता है, जैसे गहरी नींद में भी स्वप्न का बीज रहता है।

३.१४.४२
जब तक शरीर है, तब तक यह सूक्ष्म अहंकार बना रहता है; शरीर के गिरते ही यह भी पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

३.१४.४३
जैसे बादल हटते ही सूर्य पूरा दिखाई देता है, वैसे ही अहंकार के पूरी तरह मिट जाने पर अनंत ब्रह्म ही शुद्ध रूप में प्रकट होता है।

३.१४.४४
इसलिए हे राम! इस "मैं"  और "मेरा"  के भाव को जड़ से मिटा दो; यही सबसे बड़ा साधन है मुक्ति पाने का।

३.१४.४५
जब तक यह अहंकार है, तब तक बंधन है; अहंकार के नष्ट होते ही स्वतः मुक्ति हो जाती है—यह बात निश्चित समझो।

इन शिक्षाओं का सार:

ये दस श्लोक बताते हैं कि एकमात्र शुद्ध चेतना, जो मूलतः शांत और अद्वितीय है, अपनी ही स्वयं-जागरूकता और आश्चर्य-शक्ति से जीव बनती है और सारा संसार बन जाता है। जब चेतना किसी विचार-वस्तु को "जानने" लगती है, तभी सीमित जीव और जन्म-मृत्यु का चक्र प्रकट होता है। जब वह जानना बंद कर देती है, सब कुछ फिर वही शांत चेतना बन जाता है। चेतना को वास्तव में कुछ भी नहीं होता; वह कभी बदलती नहीं, न बँटती है।

चेतना की तुलना शुद्ध आकाश से की गई है—जो खाली है, फिर भी अनगिनत जीवों से भरा दिखता है। जैसे ताँबे को सोना बनाया जा सकता है, वैसे ही साधारण जीव क्रमशः परम आत्म-साक्षात्कार तक पहुँच सकते हैं। "मैं" की भावना कीट-पतंगे से शुरू होकर धीरे-धीरे मजबूत होती जाती है, जब तक सच्चे अनंत आत्मा का बोध न हो जाए।

जगत् का मुख्य कारण चेतना का स्वयं में होने वाला आश्चर्य और आनंद है। वह स्वयं को चाखती है, स्वयं को गले लगाती है, स्वयं में रम जाती है। इसी स्व-आनंद को गलती से "मैं" यह शरीर हूँ, यह नाम है, ये वस्तुएँ " मेरी हैं"  समझ लिया जाता है। यही भ्रम पूरा ब्रह्मांड चेतना के भीतर प्रतिबिंब की तरह प्रक्षेपित कर देता है।

परिवर्तन, विकार आदि शब्द भी चेतना के लिए कहे जाते हैं, पर वे केवल दिखावा हैं। चेतना तो अपरिवर्तनीय, अखंड और शाश्वत है। फिर भी अपनी मुक्त शक्ति से, जो सबसे सूक्ष्म आकाश से भी सूक्ष्म है, वह अनेक बनने का खेल खेलती है। यह खेल निरंतर, अटूट और मीठा है—यह चेतना का अपना स्व-आनंद है।

अंत में, जगत् कुछ और नहीं—बस चेतना का अपने ही भीतर अपने प्रति आश्चर्य करना और उस आश्चर्य का सुंदर खेल है। बाहर कोई सच्चा सृजन या सच्चा जगत् नहीं है। जिस क्षण यह समझ में आ जाए कि लहर केवल जल ही है, उसी क्षण छोटा-सा "मैं"  और विशाल जगत् दोनों एक चेतना-सागर में विलीन हो जाते हैं, और केवल शांति और आश्चर्य ही एकमात्र सत्य स्वरूप के रूप में शेष रह जाता है।

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