Wednesday, April 22, 2026

अध्याय ३.५७, श्लोक २१–२७

 योगवशिष्ट ३.५७.२१–२७
(ये श्लोक योगी के शरीर और उसकी अवस्थाओं के परिवर्तन के विषय में गहन दृष्टि प्रस्तुत करते हैं)
 
श्रीराम उवाच ।
ब्रह्मँल्लोकैः पुरस्थस्य गच्छतो योगिनो निजम्।
आतिवाहिकतां देहः कीदृशोऽयं विलोक्यते ॥ २१॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
देहाद्देहान्तरप्राप्तिः पूर्वदेहं विना सदा।
आतिवाहिकदेहेऽस्मिन्स्वप्नेष्विव विनश्वरी ॥ २२॥
यथातपे हिमकणः शरद्व्योम्नि सितोऽम्बुदः।
दृश्यमानोऽप्यदृश्यत्वमित्येवं योगिदेहकः ॥ २३॥
द्रागित्येवाथवा कश्चिद्योगिदेहो न लक्ष्यते।
योगिभिश्च पुरो वेगात्प्रोड्डीन इव खे खगः ॥ २४॥
स्ववासनाभ्रमेणैव क्वचित्केचित्कदाचन।
मृतोऽयमिति पश्यन्ति केचिद्योगिनमग्रगाः ॥ २५॥
भ्रान्तिमात्रं तु देहात्मा तेषां तदुपशाम्यति।
सत्यबोधेन रज्जूनां सर्पबुद्धिरिवात्मनि ॥ २६॥
को देहः कस्य वा सत्ता कस्य नाशः कथं कुतः।
स्थितं तदेव यदभूदबोधः केवलं गतः ॥ २७॥

श्रीराम पूछते हैं: 
३.५७.२१
> हे ब्रह्मन्, जब कोई योगी आगे-आगे लोकों में जाता है, तो उस अवस्था में उसका शरीर कैसा दिखाई देता है?

महर्षि वसिष्ठ बोले: 
३.५७.२२–२७
> एक शरीर से दूसरे शरीर में जाना हमेशा पुराने शरीर को साथ लिए बिना ही होता है। यह सूक्ष्म “गमन शरीर” स्वप्न के शरीर जैसा होता है—अस्थायी और नष्ट होने वाला।
> जैसे धूप में हिमकण पिघल जाता है, या शरद के आकाश में सफेद बादल दिखते हुए भी लुप्त हो जाता है, वैसे ही योगी का शरीर दिखाई देता है पर वास्तव में स्थायी नहीं होता।
> कभी-कभी योगी का शरीर बिल्कुल दिखाई ही नहीं देता। वह इतनी तेजी से चलता है मानो आकाश में उड़ते पक्षी की तरह अदृश्य हो गया हो।
> अपनी-अपनी वासनाओं और भ्रम के कारण कुछ लोग कहते हैं, “यह योगी मर गया,” जबकि कुछ लोग उसे आगे बढ़ा हुआ देखते हैं।
> उनके लिए आत्मा को शरीर मानना केवल एक भ्रम है, जो सच्चे ज्ञान से मिट जाता है—जैसे रस्सी को साँप समझने का भ्रम सही ज्ञान से समाप्त हो जाता है।
> कौन शरीर वाला है? किसकी सत्ता है? किसका नाश होता है और कैसे? जो वास्तव में है, वह हमेशा वैसा ही रहता है; केवल अज्ञान ही समाप्त होता है।

शिक्षाओं का विस्तृत सार:
इसमें बताया गया है कि जो “शरीर” दिखाई देता है, वह वास्तव में भौतिक नहीं बल्कि चेतना द्वारा निर्मित एक सूक्ष्म रूप है। आत्मा कहीं जाती या आती नहीं, बल्कि केवल उसके प्रकट होने के रूप बदलते हैं, जबकि वास्तविक सत्ता अपरिवर्तित रहती है।

इन श्लोकों का मुख्य संदेश यह है कि यह सूक्ष्म शरीर स्वप्न के शरीर के समान है। जैसे स्वप्न में शरीर वास्तविक लगता है पर जागने पर समाप्त हो जाता है, वैसे ही योगी का यह रूप भी अस्थायी है। हिमकण के पिघलने और बादल के लुप्त होने के उदाहरण यह दिखाते हैं कि जो दिखाई देता है वह आवश्यक नहीं कि वास्तविक और स्थायी हो।

यह भी बताया गया है कि अलग-अलग लोग अपनी मानसिक स्थिति और वासनाओं के अनुसार अलग-अलग निष्कर्ष निकालते हैं। कोई कहता है कि योगी मर गया, तो कोई उसे कहीं और गया हुआ देखता है। इसका अर्थ है कि हमारी धारणाएँ सत्य का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि हमारे मन की रचना हैं।

रस्सी और साँप का उदाहरण एक महत्वपूर्ण दार्शनिक शिक्षा देता है। जैसे अज्ञान के कारण रस्सी को साँप समझ लिया जाता है और ज्ञान आने पर यह भ्रम समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा को शरीर मानने का भ्रम भी ज्ञान से मिट जाता है। यह अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है।

अंत में, श्लोक यह बताते हैं कि शरीर, अस्तित्व और नाश के प्रश्न स्वयं अज्ञान से उत्पन्न होते हैं। जो वास्तविक है, वह हमेशा वैसा ही रहता है—अपरिवर्तनीय और शाश्वत। बदलता है तो केवल अज्ञान, और उसके हटने पर मनुष्य अपनी वास्तविक, मुक्त अवस्था को पहचानता है।

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