Friday, May 1, 2026

अध्याय ३.६०, श्लोक १६–२९

 योगवशिष्ट ३.६०.१६–२९
(ये श्लोक सिखाते हैं कि संसार और सभी अनुभव पूर्ण रूप से मन की धारणा द्वारा आकार लेते हैं)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
येन येन यथा यद्यद्यदा संवेद्यतेऽनघ।
तेन तेन तथा तत्तत्तदा समनुभूयते ॥ १६॥
अमृतत्वं विषं याति सदैवामृतवेदनात्।
शत्रुर्मित्रत्वमायाति मित्रसंवित्तिवेदनात् ॥ १७॥
यथा भावितमेतेषां पदार्थानां निजं वपुः।
तदेव हि चिराभ्यासान्नियतेर्वशमायतम् ॥ १८॥
कचनैकात्मिकैषा चिद्यथा कचति यादृशम्।
तथा तथाशु भवति तत्स्वभावैककारणात् ॥ १९॥
निमेषे यदि कल्पौघसंविदं परिविन्दति।
निमेष एव तत्कल्पो भवत्यत्र न संशयः ॥ २०॥
कल्पे यदि निमेषत्वं वेत्ति कल्पोऽप्यसौ ततः।
निमेषीभवति क्षिप्रं तादृग्रूपात्मिका हि चित् ॥ २१॥
दुःखितस्य निशा कल्पः सुखितस्यैव च क्षणः।
क्षणः स्वप्ने भवेत्कल्पः कल्पश्च भवति क्षणः ॥ २२॥
यथा च मृत्वा जातोऽहं तरुणो यौवनस्थितः।
यातोऽस्मि योजनशतं स्वप्न इत्यनुभूयते ॥ २३॥
रात्रिं द्वादशवर्षाणि हरिश्चन्द्रोऽनुभूतवान्।
लवणो भुक्तवानायुरेकरात्र्या समाः शतम् ॥ २४॥
यन्मुहूर्तः प्रजेशस्य स मनोर्जीवितं मुनेः।
जीवितं यद्विरिञ्चस्य तद्दिनं किल चक्रिणः ॥ २५॥
विष्णोर्यज्जीवितं राम तद्वृषाङ्कस्य वासरः।
ध्यानप्रक्षीणचित्तस्य न दिनानि न रात्रयः ॥ २६॥
न पदार्था न च जगत्सत्यमात्मनि योगिनः।
मधुरं कटुतामेति कटुभावेन चिन्तितम् ॥ २७॥
कटु चायाति माधुर्यं मधुरत्वेन चिन्तितम्।
मित्रबुद्ध्या द्विषन्मित्रं रिपुबुद्ध्या रिपुः सुहृत् ॥ २८॥
भवतीति महाबाहो यथासंवेदनं जगत्।
अनभ्यस्ताः पदार्था ये शास्त्रपाठजपादयः ॥ २९॥

महर्षि वसिष्ठ बोले: 
३.६०.१६–१९
> जो कुछ भी जिस किसी भी माध्यम से, जिस किसी भी तरह से, जिस किसी भी समय में अनुभव किया जाता है, वह ठीक उसी तरह से उसी समय अनुभव होता है। 
> जहर निरंतर अमृत समझने से अमृत बन जाता है। शत्रु मित्रता की भावना से मित्र बन जाता है। 
> इन वस्तुओं का अपना सच्चा रूप ठीक वैसा ही दिखाई पड़ता है जैसा मन में कल्पना की गई हो। लंबे अभ्यास से वह उस स्थिर धारणा के वश में आ जाता है। 
> यह चेतना अपने विषय के साथ एकाकार होकर जिस तरह चमकती है, वह उसी तरह जल्दी बन जाती है क्योंकि उसका अपना स्वभाव ही एकमात्र कारण है। 

३.६०.२०–२४
> यदि एक पल में कल्पों की संविद् (ज्ञान) प्राप्त कर ली जाए तो वह पल ही उन कल्पों के समान हो जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं। 
> यदि एक कल्प में उसे केवल पल समझा जाए तो वह कल्प भी शीघ्र पल बन जाता है, क्योंकि चेतना ऐसी रूप धारण करने वाली है। 
> दुखी व्यक्ति के लिए रात कल्प के समान लगती है; सुखी के लिए केवल क्षण। स्वप्न में क्षण कल्प बन सकता है और कल्प क्षण बन सकता है। 
> जैसे स्वप्न में अनुभव होता है: “मैं मर गया और फिर युवा होकर जवान अवस्था में पैदा हुआ, और सौ योजन चला।” 
> राजा हरिश्चंद्र ने एक रात को बारह वर्षों के समान अनुभव किया। राजा लवण ने एक रात में सौ वर्षों की आयु भोग ली। 

३.६०.२५–२९
> प्रजापति (ब्रह्मा) के लिए जो एक मुहूर्त है, वह मुनि मनु का पूरा जीवन है। विरिंचि (ब्रह्मा) का जीवन चक्रधारी (विष्णु) के लिए एक दिन है। 
> हे राम, विष्णु का जीवन वृषांक (शिव) के लिए एक दिन है। ध्यान में चित्त को भंग कर देने वाले योगी के लिए न दिन होते हैं न रातें। 
> योगी के लिए आत्मा में न तो पदार्थ सत्य हैं न जगत्। मीठा कड़वे भाव से सोचने पर कड़वा हो जाता है। 
> कड़वा मीठे भाव से सोचने पर मीठा हो जाता है। मित्रता की बुद्धि से शत्रु मित्र बन जाता है; शत्रुता की बुद्धि से मित्र शत्रु बन जाता है। 
> हे महाबाहो, जगत् ठीक वैसा ही बन जाता है जैसा अनुभव किया जाता है। वे पदार्थ जो अभ्यास नहीं किए गए—जैसे शास्त्र पढ़ना और जप आदि—वे सिद्ध नहीं होते। 

शिक्षाओं का विस्तृत सार:
चेतना मूल कारण है, और किसी वस्तु या स्थिति को जो गुण या रूप मन मजबूती से देता है, अनुभव में वही बन जाता है। निरंतर मानसिक विश्वास से जहर अमृत जैसा लग सकता है और शत्रु मित्र। इससे कल्पना और आदत की वास्तविकता को रंगने वाली शक्ति स्पष्ट होती है।

समय भी सापेक्ष है और मन की अवस्था पर निर्भर करता है। एक पल अनेक युगों में फैल सकता है या विशाल काल को क्षण में समेट सकता है, जैसा स्वप्न, सुख या दुख में दिखता है। हरिश्चंद्र और लवण जैसे राजाओं की कथाएँ तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे देवताओं के भिन्न कालमान यह दर्शाते हैं कि वस्तुनिष्ठ समय की अपनी कोई स्थिर सत्ता धारणा के बिना नहीं है। ध्यान में लीन योगी के लिए दिन-रात के सामान्य विभाजन पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।

पदार्थ और बाह्य जगत् स्वतंत्र सत्य नहीं रखते; वे द्रष्टा की आंतरिक भावना या विश्वास के अनुसार प्रकट होते हैं। मीठा कड़वा और कड़वा मीठा मानसिक दृष्टिकोण से बदल जाता है। संबंध भी बदलते हैं—शत्रुता की सोच से मित्र शत्रु और मित्रता की सोच से शत्रु मित्र बन जाता है। योगी समझता है कि आत्मा के बाहर कुछ भी स्वतंत्र रूप से सत्य नहीं है।

लंबा अभ्यास और बार-बार मानसिक लगाव इन धारणाओं को गहराई से स्थिर कर देता है, जिससे वे ठोस और स्वाभाविक लगने लगती हैं। चेतना में विशेष क्षमता है कि वह जिसका गहन चिंतन करती है, उसी में रूपांतरित हो जाती है, क्योंकि उसका अपना स्वभाव ही एकमात्र कारण है। जो चीजें अभ्यास या गहन चिंतन नहीं की गईं—जैसे शास्त्र अध्ययन या मंत्र जप—वे मजबूत नहीं होतीं और अपना फल नहीं देतीं।

अंततः ये श्लोक मन-मात्र सत्य (दृष्टि-सृष्टि) और इस सिद्धांत को समझने से मिलने वाली स्वतंत्रता पर बल देते हैं। धारणा को अनुशासित अभ्यास और ध्यान द्वारा नियंत्रित करके मनुष्य दुख को सुख में, बंधन को मुक्ति में और मायामय जगत् को आंतरिक शांति के प्रतिबिंब में बदल सकता है। आत्मा में स्थित योगी जगत् को चेतना से अभिन्न देखता है और साधारण समय तथा द्वंद्व की सीमाओं से परे रहता है।

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