Thursday, April 2, 2026

अध्याय ३.५२, श्लोक ४२–५२

 योगवशिष्ट ३.५२.४२–५२
(ये छंद सिखाते हैं कि ब्रह्म सर्वव्यापी है और चेतना की शक्ति से कहीं भी तुरंत किसी भी रूप में प्रकट हो जाता है, ठीक जैसे सपनों में पूरी दुनिया एक पल में बन जाती है)

श्रीदेव्युवाच ।
ब्रह्म सर्वगतं यस्माद्यथा यत्र यदोदितम्।
भवत्याशु तथा तत्र स्वप्नशक्त्यैव पश्यति ॥ ४२॥
सर्वत्र सर्वशक्तित्वाद्यत्र या शक्तिरुन्नयेत्।
आस्ते तत्र तथा भाति तीव्रसंवेगहेतुतः ॥ ४३॥
मृतिमोहक्षणेनैव यदैतौ दंपती स्थितौ।
तदैवाभ्यामिदं बुद्धं प्रतिभासवशाद्हृदि ॥ ४४॥
आवयोः पितरावेताविमे वै चापि मातरौ।
देश एष धनं चेदं कर्मेदं पूर्वमीदृशम् ॥ ४५॥
आवां विवाहितावेवमेवं नामैकतां गतौ।
एतयोः सापि जनता याता तत्रैव सत्यताम् ॥ ४६॥
तथैवात्रास्ति दृष्टान्तः प्रत्यक्षं स्वप्नवेदनम्।
इत्येवंभावया लीले लीलयाहमथार्चिता ॥ ४७॥
नाहं स्यां विधवेत्येवं वरो दत्तो मयाप्यसौ।
इत्यर्थेन मृता पूर्वमेवेह खलु बालिका ॥ ४८॥
भवतां चेतनांशानामहं चेतनधर्मिणी।
कुलदेवी सदा पूज्या स्वत एव करोम्यहम् ॥ ४९॥
अथास्या जीवको देहात्प्राणमारुतरूपधृक्।
मनसा चलतां प्राप्तो मुखाग्रत्यक्तदेहकः ॥ ५०॥
ततो मरणमूर्च्छान्ते गृहेऽस्मिन्नेव चैतया।
बुद्धौ भावित आकाशे दृष्टो जीवात्मना ततः ॥ ५१॥
संपन्नैषा हरिणनयना चन्द्रबिम्बाननश्रीर्मानोन्नद्धा दयितललिता कान्तमाभोक्तुकामा।
पूर्वस्मृत्या सरभसमुखी संयुता मण्डलान्तः स्वप्नान्ते वाऽप्रकृतिविभवा पद्मिनी चोदितेव ॥ ५२॥

देवी सरस्वती ने कहा:
३.५२.४२–४६:
> क्योंकि ब्रह्म सर्वत्र उपस्थित है, इसलिए जो कुछ भी कहीं उत्पन्न होता है, वहाँ शीघ्र ही प्रकट हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न की शक्ति से कोई चीज दिखाई देती है। > जहाँ भी सर्वशक्तिमान स्वभाव के कारण कोई शक्ति उत्पन्न होती है, वह अपनी तीव्र गति के कारण वहीं ठहर जाती है और बलपूर्वक प्रकाशित होती है।  
> पति और पत्नी दोनों जब मृत्यु के भ्रम से अभिभूत हुए, उसी क्षण उनके हृदय में इस सम्पूर्ण दृश्य को प्रकट रूप में समझ लिया गया।  
> ये हमारे माता-पिता हैं और ये भी हमारी माताएँ हैं। यह स्थान है, यह धन है, और यह हमारा ऐसा ही पूर्व कर्म था।  
> हम दोनों इस प्रकार विवाहित हुए और नाम में एक हो गए। उनके साथ जुड़े हुए लोग भी उसी स्थान पर वास्तविक हो गए।

३.५२.४७–५२:
> इसी प्रकार यहाँ स्वप्न अनुभव का प्रत्यक्ष उदाहरण स्पष्ट है। इस प्रकार सोचते हुए, हे लीला, तुमने मुझे खेल-खेल में पूजा।  
> मैंने कहा, “मैं विधवा न बनूँ”, और वह वरदान भी मैंने ही दिया। इसी कारण यहाँ वह कन्या बहुत पहले मर चुकी थी।  
> मैं तुम सबके चेतन अंशों में चेतन सार हूँ। कुलदेवी के रूप में मैं सदा पूजनीया हूँ, और मैं अपनी स्वभाव से ही सब कुछ करती हूँ।  
> तब उसकी प्राणशक्ति शरीर से प्राणवायु का रूप लेकर मन के साथ चलती हुई मुँह से शरीर छोड़कर निकल गई।  
> उसके बाद, इस घर में ही मृत्यु की मूर्च्छा के अंत में, जीवात्मा ने बुद्धि में कल्पित आकाश में देखा।  
> वह अब चन्द्रमंडल के सौंदर्य वाली मुख वाली, हिरनी जैसी आँखों वाली, आत्मसम्मान से गर्वित, खेल-कूद वाली और प्रिय, अपने प्रेमी का सुख भोगने की इच्छुक हो गई है। पूर्व स्मृति के साथ, उत्सुक मुख वाली, अंदरूनी मंडल में संयुक्त, स्वप्न के अंत में जागृत हुई असाधारण शक्तियों वाली कमलिनी स्त्री के समान।

उपदेशों का सारांश:
यह खंड योगवसिष्ठ के लीला-चरित्र से लिया गया है, जिसमें देवी सरस्वती लीला को ब्रह्म, माया, स्वप्न और वास्तविकता की गहन शिक्षा दे रही हैं।

मुख्य शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं:

ब्रह्म की सर्वव्यापकता: ब्रह्म सर्वत्र है, इसलिए कोई भी अनुभव या दृश्य तुरंत कहीं भी प्रकट हो सकता है — ठीक स्वप्न की तरह, जहाँ मन की शक्ति से सब कुछ तत्काल बन जाता है।

माया और भ्रम का स्वरूप: मृत्यु, जन्म, परिवार, धन, स्थान आदि सब मन के भ्रम (कल्पना) से उत्पन्न होते हैं। पति-पत्नी का मृत्यु-भ्रम होते ही सम्पूर्ण दृश्य हृदय में प्रकट हो जाता है।

स्वप्न और जाग्रत अवस्था का समानता: वर्तमान अनुभव भी स्वप्न की तरह है। लीला द्वारा दी गई पूजा और वरदान (विधवा न बनने का) भी इसी चेतन शक्ति के खेल हैं।

चेतन सार: देवी स्वयं सबके भीतर चेतन का सार है। वह कुलदेवी के रूप में पूजनीय है और अपनी प्रकृति से ही सब कार्य करती है।

जीव की यात्रा: मृत्यु के समय प्राणशक्ति शरीर छोड़कर मन के साथ चलती है और बुद्धि के आकाश में नया रूप धारण करती है (यहाँ हिरनी-नेत्री सुंदरी के रूप में)।

मोक्ष और स्मृति: पूर्व स्मृति के साथ जागरण की अवस्था में जीव अपनी असली शक्ति (असाधारण सिद्धियाँ) प्राप्त कर लेता है, जैसे स्वप्न से जागने पर।

समग्र संदेश: संसार, जन्म-मृत्यु, संबंध और अनुभव सब ब्रह्म के चेतन में कल्पित स्वप्न मात्र हैं। सच्ची पूजा और ज्ञान से यह भ्रम दूर होता है और आत्मा अपनी मुक्त, चिन्मय स्वरूप को पहचान लेती है। लीला की कथा यह सिखाती है कि वास्तविकता मन की रचना है और ब्रह्म से परे कुछ भी नहीं।

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