योगवशिष्ट ३.४९.३१–४१
(ये श्लोक बताते हैं कि राजा जादू और भ्रम से भूतों और राक्षसों की बड़ी भयानक सेनाएँ कैसे बना लेते हैं)
श्रीवसिष्ठं उवाच ।
निष्कासितमहाजिह्व नानामुखविकारदम्।
शरभाराढ्यमन्योन्यं ह्रियमाणशवाङ्गकम् ॥ ३१॥
रुधिराम्भसि मज्जं तदुन्मज्जद्धृल्लसत्तनु।
लम्बोदरं लम्बभुजं लम्बकर्णोष्ठनासिकम् ॥ ३२॥
रक्तमांसमहापङ्केष्वन्योन्यं वेल्लनाभ्यसत्।
मन्दरोद्धूतदुग्धाब्धिलसत्कलकलाकुलम् ॥ ३३॥
यथैव मायासंचारस्तेन तस्य कृतः पुरा।
तेनापि तस्याशु तथा कृतो बुद्ध्वा स लाघवात् ॥ ३४॥
वेतालास्त्रं ततो दत्ते तेनोत्तस्थुः शवव्रजाः।
अमूर्धानः समूर्धानो वेताला वेशवल्लिताः ॥ ३५॥
ततः पिशाचवेतालरूपिकोग्रकबन्धवत्।
तद्बभूव बलं भीममुर्वीनिगरणक्षमम् ॥ ३६॥
अथेतरोऽपि भूपालो मायां संचार्य तां गुरौ।
राक्षसास्त्रं ससर्जाथ त्रैलोक्यग्रहणोन्मुखम् ॥ ३७॥
उदगुः पर्वताकाराः सर्वतः स्थूलराक्षसाः।
देहमाश्रित्य निष्क्रान्ताः पातालान्नरका इव ॥ ३८॥
अथोदभूद्बलं भीमं ससुरासुरभीतिदम्।
गर्जद्रक्षोमहानादवाद्यनृत्यत्कबन्धकम् ॥ ३९॥
मेदोमांसोपदंशाढ्यं रुधिरासवसुन्दरम्।
क्षीबकूश्माण्डवेतालयक्षताण्डवसुन्दरम् ॥ ४०॥
कूश्माण्डकोत्ताण्डवदण्डपादक्षुब्धासृगुत्क्षिप्ततरङ्गसिक्तैः।
संध्याभ्ररागोत्करकोटिकान्ति भूतैरसृक्स्रोतसि दत्तसेतु ॥ ४१॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.४९.३१–३५
> एक बहुत बड़ी जीभ बाहर निकली हुई है और कई चेहरों को अजीब तरीके से मोड़ रही है। जगह पर तीर भरे हैं और मरे हुए शरीर एक-दूसरे को खींच रहे हैं।
> वे खून के समुद्र में डूबते हैं और फिर चमकते शरीर के साथ ऊपर आते हैं। इनके बड़े लटकते पेट, लंबी लटकती बाहें और झुकी हुई कान, होंठ और नाक हैं।
> वे खून और मांस की गाढ़ी कीचड़ में एक-दूसरे के साथ लोट रहे हैं। शोर मंदराचल द्वारा दूध के सागर को मथने जैसा तेज़ है।
> जैसे एक राजा ने पहले जादू से यह दृश्य दूसरे के लिए बनाया था, वैसे ही दूसरे राजा ने भी जल्दी से उसी तरह उसके लिए बनाया, यह समझकर कि यह कितना आसान है।
> फिर वेताल अस्त्र चलाया गया। मरे हुए शरीरों के झुंड उठ खड़े हुए। कुछ बिना सिर के, कुछ सिर वाले। वेताल लताओं की तरह लिपटे हुए थे।
३.४९.३६–४१
> सेना अब भयानक शक्ति बन गई थी जैसे क्रूर पिशाच, वेताल और बिना सिर वाले कबंध। यह पूरी पृथ्वी को निगलने लायक थी।
> दूसरे राजा ने भी गुरु को भ्रम भेजा और राक्षस अस्त्र छोड़ा जो तीनों लोकों को पकड़ने को तैयार था।
> पहाड़ जितने मोटे राक्षस चारों तरफ उठे। उन्होंने शरीर धारण किए और नरक से निकले भूतों की तरह पाताल से बाहर आए।
> एक भयानक सेना प्रकट हुई जो देवताओं और असुरों दोनों को डराती थी। राक्षसों के गर्जन, तेज़ संगीत और नाचते बिना सिर वाले शरीरों से भरी थी।
> यह चर्बी और मांस के खाने से भरी थी और खून के पेय से सुंदर लग रही थी। नशे में धुत कुश्मांड, वेताल और यक्षों का नाच इसे और सुंदर बना रहा था।
> नाचते कुश्मांडों ने लट्ठ जैसे पैरों से खून को हिलाया, लहरें उठाईं और सबको भिगोया। सूर्यास्त के बादलों जैसे करोड़ों रंगों वाली चमक वाले भूतों ने खून की नदी पर पुल बना दिया।
उपदेशों का विस्तृत सार:
जीभ, खून और लोटते शरीरों के भयानक चित्र सिखाते हैं कि मन की शक्ति से कुछ भी असली लग सकता है। योगवासिष्ठ में यह कहानी याद दिलाती है कि संसार में हम जो देखते हैं वह सिर्फ़ विचार की रचना है, ठोस सत्य नहीं।
खून में लोटना और सागर मथने जैसा शोर जीवन के डरावने पहलू को दिखाता है जो भय और लगाव से आता है। उपदेश कहते हैं कि पूरा ब्रह्मांड सपना या जादू का खेल है। जब हम इन भयानक दृश्यों को सच्चा मानते हैं तब दुख होता है; जब हम उन्हें झूठा समझते हैं तब मुक्ति मिलती है।
दोनों राजा एक ही तरह के अस्त्र – वेताल और राक्षस – एक के बाद दूसरे पर चलाते हैं। इससे सिखाया जाता है कि भ्रम दोनों तरफ़ काम करता है और कुछ भी स्थायी नहीं। श्लोक बताते हैं कि अच्छा-बुरा, जीत-हार सब एक ही मन का खेल है। सच्ची बुद्धि इन बदलावों से ऊपर रहना है।
पहाड़ जैसे राक्षस और खून की नदियों में नाचते भूत संसार में हिंसा और जन्म-मृत्यु के चक्र को दर्शाते हैं। योगवसिष्ठ इस चित्र से चेतावनी देता है कि ज्ञान के बिना हम भय में फँसे रहते हैं। सच्चा मार्ग जागना और सबको एक शांत ब्रह्म समझना है।
अंत में ये श्लोक हमें सिखाते हैं कि हमारा असली स्वरूप किसी लड़ाई या जादू से छूता भी नहीं। सेनाएँ पल में उठती और गिरती हैं जैसे रात का सपना। इसे समझकर हम सब भय छोड़ देते हैं और शुद्ध शांति में रहते हैं, यह जानकर कि सारा संसार सिर्फ़ एक अनंत चेतना में दिखने वाला भ्रम है।
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