Wednesday, March 11, 2026

अध्याय ३.४६, श्लोक १–१५

योगवशिष्ट ३.४६.१–१५
(ये श्लोक योगवसिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण में लीला की कथा का हिस्सा हैं, जहाँ वसिष्ठ राम को विदूरथ नामक राजा की घटना सुनाते हैं। विदूरथ अपनी पत्नी -लीला का एक रूप- से जुड़ी बातों के बाद क्रोधित होकर युद्ध के लिए निकलता है)

श्रीराम उवाच ।
एवं संकथयन्तीषु तासु तस्मिन्गृहोदरे ।
विदूरथः किमकरोन्निर्गत्य कुपितो गृहात् ॥ १ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विदूरथः स्वसदनान्निर्गतः परिवारितः ।
परिवारेण महता ऋक्षौघेणेव चन्द्रमाः ॥ २ ॥
सन्नद्धसर्वावयवो लग्नहारविभूषणः।
महाजयजयारावैः सुरेन्द्र इव निर्गतः ॥ ३ ॥
समादिशन्योधगणं शृण्वन्मण्डलसंस्थितिम् ।
आलोकयन्वीरगणानारुरोह नृपो रथम् ॥ ४ ॥
कूटाकारसमाकारं मुक्तामाणिक्यमण्डितम् ।
पताकापञ्चभिर्व्याप्तं द्युविमानमिवोत्तमम् ॥ ५ ॥
चक्रभित्तिपरिप्रोतप्रकचत्काञ्चनाङ्कुरम् ।
मुक्ताजालरणत्कारचारुविक्रमकूबरम् ॥ ६ ॥
सुग्रीवैर्लक्षणोपेतैः प्रशस्तैः प्रचलैः कृशैः।
जवोड्डयनवेगेन प्रवहद्भिः सुरानिव ॥ ७ ॥
वायुं जवेन सहसा असहद्भिर्गतिक्रमैः।
प्रोह्यद्भिरिव पश्चार्धमापिबद्भिरिवाम्बरम् ॥ ८॥
योजितैरिव संपूर्णैश्चन्द्रैश्चामरदीप्तिभिः ।
अश्वैरष्टभिराबद्धमाशापूरकहेषितैः ॥ ९ ॥
अथोदपतदुद्दामनागाभ्ररवनिर्भरः ।
शैलभित्तिप्रतिध्वानदारुणो दुन्दुभिध्वनिः ॥ १० ॥
मत्तसैनिकनिर्मुक्तैर्व्याप्तं कलकलारवैः।
किंकिणीजालनिर्ध्वानैर्हेतिसंघट्टघट्टितैः ॥ ११ ॥
धनुश्चटचटाशब्दैः शरसीत्कारगायनैः ।
परस्पराङ्गनिष्पिष्टकवचौघझणज्झणैः ॥ १२ ॥
ज्वलदग्निटणत्कारैरार्तिमत्क्रन्दनारवैः ।
परस्परभटाह्वानैर्बन्दिविक्षुब्धरोदनैः ॥ १३ ॥
शिलाघनीकृताशेषब्रह्माण्डकुहरो ध्वनिः ।
हस्तग्राह्योऽभवद्भीमो दशाशाकुञ्जपूरकः ॥ १४ ॥
अथोदपतदादित्यपथपीवररोधकम्।
रजोनिभेन भूपीठमम्बरोड्डयनोन्मुखम् ॥ १५ ॥

श्रीराम बोले: 
३.४६.१
> जब वे स्त्रियाँ उस तम्बू के भीतर इस प्रकार बातें कर रही थीं, तो क्रोधित विदूरथ घर से निकलकर क्या करने लगा?

महर्षि वशिष्ठ बोले: 
३.४६.२–९
> विदूरथ अपने घर से निकला, बहुत बड़ी सेना के साथ घिरा हुआ, जैसे चन्द्रमा तारों के समूह से घिरा हो।
> उसके सारे अंग कवच से ढके थे, गले में हार और आभूषण लगे थे। वह जोर-जोर से जय-जयकार के साथ निकला, जैसे देवराज इन्द्र।
> उसने सैनिकों को आदेश दिया, शत्रु की स्थिति के बारे में सुना, अपने वीरों को देखा और फिर रथ पर चढ़ गया।
> रथ ऊँचे शिखर जैसा था, मोतियों और माणिक्यों से सजा हुआ, पाँच झंडों से ढका हुआ, जैसे कोई उत्तम स्वर्गीय विमान।
> इसकी दीवारों पर चमकते सोने के अंकुर लगे थे, मोतियों के जाल से कूबर (जोड़ा) सुन्दर टनटनाता था।
> उत्तम, तेज़, पतले और शुभ लक्षणों वाले घोड़ों से जुता था, जो उड़ान भरते हुए देवताओं को ढोने जैसे वेग से चलते थे।
> वे इतनी तेज़ी से दौड़े कि हवा को पीछे छोड़ते हुए, पीछे का भाग खींचते और आकाश को पीते हुए-से लगते थे।
> आठ घोड़ों से जुता हुआ, पूर्ण रूप से तैयार, चन्द्रमा जैसे सफेद पूँछ और माने वाले, दिशाओं को भरने वाली हिनहिनाहट के साथ।

३.४६.१०–१५
> फिर उठा एक भयंकर दुन्दुभि (नगाड़े) का शब्द, मतवाले हाथियों और बादलों की गरज जैसा, पहाड़ों की दीवारों से टकराकर भयानक गूँजता हुआ।  
> उन्मत्त सैनिकों की कलकलाहट से भरा, छोटी घंटियों के झनकार और हथियारों के टकराने की आवाज़ों से व्याप्त।
> धनुषों की चटचटाहट, बाणों की सीटी, एक-दूसरे से रगड़कर कवचों की झनझनाहट।
> जलती आग की टनटनाहट, पीड़ा से चीखें, योद्धाओं के आपसी पुकार, और बन्दियों की व्याकुल रोदन।
> शब्द इतना तेज़ हो गया कि समस्त ब्रह्माण्ड के गर्त को भर गया, भयानक शोर दसों दिशाओं में फैल गया।
> फिर उठी मोटी धूल की बादल जैसी, जो सूर्य के मार्ग को रोक रही थी, पृथ्वी के समान ऊपर उड़ती हुई, आकाश की ओर मुँह करके।

शिक्षा का विस्तृत सारांश:
यह दृश्य संसार की क्षणभंगुर शक्ति, वैभव और संघर्ष को दर्शाता है। राजा का भव्य प्रस्थान—उसका शानदार रथ, कवच, आभूषण, जयकार और विशाल सेना—अहंकार की दिखावट और बाहरी बल से लगाव का प्रतीक है। सब कुछ भव्य और अजेय लगता है, किन्तु यह सब क्षणिक है। घोड़े आकाश निगलते हुए-से दौड़ते हैं और धूल पृथ्वी की तरह ऊपर उठती है—यह दिखाता है कि सांसारिक प्रयास कैसे अराजकता पैदा करते हैं और सत्य दृष्टि को ढक देते हैं, जैसे धूल सूरज को ढकती है।  

नगाड़ों, हथियारों, चीखों और कवच की झनकार से भरा शोर मन की उत्तेजना, क्रोध और युद्ध की अशान्ति को दर्शाता है। यह कोलाहल सभी दिशाओं में फैलता है, जो दिखाता है कि जब मन रजोगुण से प्रेरित होता है तो भ्रम हर जगह फैल जाता है। योगवासिष्ठ की दृष्टि में ऐसे दृश्य सिद्ध करते हैं कि जो दुनिया शक्तिशाली और वास्तविक लगती है, वह मन का प्रक्षेपण मात्र है—स्वप्न या मृगमरीचिका जैसा।  

यह शिक्षा आसपास के अध्यायों में बताई गई उच्च सत्य से तुलना करती है: संसार और उसके संघर्ष आत्म-ज्ञान की कमी से उत्पन्न होते हैं। विदूरथ का क्रोध और युद्ध यात्रा पत्नी और राज्य के प्रति आसक्ति से है, किन्तु कथा अंततः इस ओर इशारा करती है कि सभी रूप, सम्बन्ध और युद्ध चेतना के भीतर के भास मात्र हैं। सच्ची मुक्ति इन भ्रमों से परे देखने से आती है।  

कुल मिलाकर, ये श्लोक संसार का नाटकीय चित्रण हैं—सतह पर शान, शोर और गति से भरा, किन्तु मूल में शून्य और अवास्तविक। वे साधक को भीतर मुड़ने, शाश्वत आत्मा और क्षणिक पदार्थों में भेद करने तथा यह समझने के लिए प्रेरित करते हैं कि सबसे भव्य सांसारिक नाटक भी माया का खेल है, जो ज्ञान और वैराग्य से शान्ति की ओर ले जाता है।

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