Sunday, March 8, 2026

अध्याय ३.४४, श्लोक ४१–५२

योगवशिष्ट ३.४४.४१–५२
(ये श्लोक देवी सरस्वती द्वारा कहे गए हैं और अद्वैत वेदांत की मूल भावना को स्पष्ट करते हैं)

श्रीदेव्युवाच ।
रिक्तं न विश्वशब्दार्थैरनन्यद्ब्रह्मणि स्थितम् ।
न तत्सत्यं न चासत्यं रज्जुसर्पभ्रमो यथा ॥ ४१॥
मिथ्यानुभूतितः सत्यमसत्यं सत्परीक्षितम्।
परमं कारणं चित्त्वाज्जीवत्वमिति चेत्यलम् ॥ ४२ ॥
ततस्तथैवानुभवाज्जीवत्वं विन्दति स्फुटम् ।
सत्यं भवत्वसत्यं वा खे विभातमिदं जगत् ॥ ४३॥
रञ्जयत्येव जीवाणुः स्वेच्छाभिरनुभूतिभिः ।
अनुभूयन्तु एवाशु काश्चित्पूर्वानुभूतितः ॥ ४४ ॥
अपूवानुभवाः काश्चित्समाश्चैवासमास्तथा ।
क्वचित्कदाचित्ता एव क्वचिदर्धसमा अपि ॥ ४५॥
कचन्त्यसत्याः सत्याभा जीवाकाशेऽनुभूतयः ।
तत्कुलास्तत्समाचारास्तज्जन्मानस्तदीहिताः ॥ ४६॥
त एव मन्त्रिणः पौराः प्रतिभाने भवन्ति च ।
ते चैवात्मन्यलं सत्या देशकालेहितैः समाः ॥ ४७॥
सर्वगात्मस्वरूपायाः प्रतिभाया इति स्थितिः ।
यथा राजात्मनि व्योम्नि प्रतिभोदेति सन्मयी ॥ ४८॥
तथा तदग्रगोदेति सत्येव प्रतिभाम्बरे ।
त्वच्छीला त्वत्समाचारा त्वत्कुला त्वद्वपुर्मयी ॥ ४९॥
इति लीलेयमाभाति प्रतिभाप्रतिबिम्बजा ।
सर्वगे संविदादर्शे प्रतिभा प्रतिबिम्बति ॥ ५० ॥
यादृशी यत्र सा तत्र तथोदेति निरन्तरम्।
जीवाकाशस्य यान्तस्था प्रतिभा कुरुते स्वयम् ।
सा बहिश्च चिदादर्शे प्रतिबिम्बादियं स्थिता ॥ ५१ ॥
एषा त्वमम्बरमहं भुवनं धरा च राजेति सर्वमहमेव विभातमात्रम् ।
चिद्व्योमबिल्वजठरं विदुरङ्ग विद्धि त्वं तेन शान्तमलमास्स्व यथास्थितेह ॥ ५२ ॥

देवी सरस्वती बोलीं:
३.४४.४१–४६
> विश्व शब्द और अर्थों से रिक्त है; ब्रह्म के सिवा कुछ और नहीं ठहरता। न वह सत्य है न असत्य, जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम होता है।
> मिथ्या अनुभव से सत्य की धारणा होती है; परखने पर असत्य ही सत्य लगता है। परम कारण चित्त्व है, इसलिए जीवत्व इतना ही समझ लो।
> फिर उसी अनुभव से जीव स्पष्ट रूप से जीवत्व पाता है। यह जगत आकाश में चाहे सत्य हो या असत्य, वैसा ही प्रकाशित होता है।
> जीवाणु अपनी इच्छा से अनुभूतियों द्वारा रंजित होता है। कुछ अनुभूतियाँ पूर्व अनुभवों से जल्दी उत्पन्न हो जाती हैं।
> कुछ नई अनुभूतियाँ, कुछ समान, कुछ असमान; कहीं-कभी पूर्ण, कहीं आधी समान भी होती हैं।
> असत्य अनुभूतियाँ जीवाकाश में सत्य-सी चमकती हैं। उनके कुल, आचरण, जन्म और कर्म होते हैं।

३.४४.४७–५२
> वे कल्पना में मंत्रियों, प्रजाजनों के रूप में होते हैं। आत्मा में वे सत्य हैं, देश-काल-कर्मों में समान।
> सर्वव्यापी आत्मस्वरूप की प्रतिभा की यही स्थिति है। जैसे राजा के मन-आकाश में प्रतिभा सत्‌मयी उदित होती है।
> वैसे ही वह प्रतिभा-आकाश में सत्य के रूप में पहले उदित होती है। तुम्हारा शील, आचरण, कुल, शरीर—सब तुममें ही है।
> इस प्रकार यह लीला प्रतिभा के प्रतिबिम्ब से उत्पन्न होकर प्रकाशित होती है। सर्वव्यापी संविद्‌-दर्पण में प्रतिभा प्रतिबिम्बित होती है।
> जैसी जहाँ होती है, वैसी निरंतर वहाँ उदित होती है। जीवाकाश में स्थित प्रतिभा स्वयं बनाती है। यह बाहर भी चिदादर्श में प्रतिबिम्ब से स्थित है।
> यह तुम हो, आकाश मैं हूँ, भुवन धरा और राजा—सब मैं ही हूँ, केवल प्रकाशमान मात्र। चिद्‌-व्योम के बिल्व-जठर को जानो, हे वीर; शांत होकर यथास्थिति में विराजो।

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
विश्व ब्रह्म से अलग कुछ नहीं है; यह शब्द-अर्थों से शून्य है। रस्सी में सर्प का भ्रम जैसा है, वैसे ही जगत न सत्य है न असत्य—केवल भ्रम। ब्रह्म के अलावा कुछ अन्य नहीं ठहरता।

जीव की स्थिति मिथ्या अनुभव से आती है। जो अनुभव सत्य लगता है, वह परीक्षा में असत्य सिद्ध होता है। मूल कारण केवल चेतना (चित्त्व) है। जीवत्व इसी भ्रम से उत्पन्न होता है और यही समझ पर्याप्त है।

अनुभव जीव की इच्छा और पूर्व वासना से प्रकट होते हैं—नए, पुराने, समान-असमान। ये जीव के मन-आकाश में सत्य-से चमकते हैं, कुल-परिवार, आचरण, जन्म-कर्म सहित, पर सब कल्पना मात्र हैं।

प्रतिभा (कल्पना या प्रतिबिम्ब) की अवधारणा मुख्य है। यह सर्वव्यापी चेतना के दर्पण में प्रतिबिम्ब की तरह उदित होती है। लीला (जगत का खेल) इसी प्रतिभा-प्रतिबिम्ब से जन्म लेती है। सब कुछ—शील, कुल, शरीर—उसी एक आत्मा में है।

अंत में शिक्षा है कि सब कुछ मैं ही हूँ—आकाश, पृथ्वी, प्राणी, जगत। यह मात्र प्रकाश (विभातमात्र) है, चेतना के विस्तार में। इस सत्य को जानकर शांत होकर यथास्थिति में रहो, भेदभाव से मुक्त हो जाओ।

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