योगवशिष्ट ३.४४.१५–२५
(ये श्लोक प्रबुद्ध लीला और देवी के बीच गहन संवाद जारी रखते हैं, जहाँ लीला अपनी स्थिति और परिवर्तन पर प्रश्न करती है)
प्रबुद्धलीलोवाच ।
किमिदं देवि हे ब्रूहि कस्मादियमहं स्थिता ।
या साऽभवमहं पूर्वं कथं सेयमहं स्थिता ॥ १५ ॥
मन्त्रिप्रभृतयः पौरा योधाः सबलवाहनाः ।
सर्व एव त एवेमे स्थितास्तत्र तथैव ते ॥ १६ ॥
तत्रापीह च हे देवि सर्वे कथमवस्थिताः।
बहिरन्तश्च मुकुरे इवैते किं प्रचेतनाः ॥ १७ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
यथा ज्ञप्तिरुदेत्यन्तस्तथानुभवति क्षणात् ।
चितिश्चेत्यार्थतामेति चित्तं चित्तार्थतामिव ॥ १८ ॥
यादृगर्थं जगद्रूपं तत्रैवोदेति तत्क्षणात् ।
न देशकालदीर्घत्वं न वैचित्र्यं पदार्थजम् ॥ १९ ॥
बाह्यमाभ्यन्तरं भाति स्वप्नार्थोऽत्र निदर्शनम् ।
यदन्तः स्वप्नसंकल्पपुरं च कचनं चितेः ॥ २० ॥
तदेतद्बाह्यनाम्नैव स्वभ्यासात्सत्स्फुटं स्थितम् ।
यादृग्भावो मृतो भर्ता तव तस्मिंस्तदा पुरे ॥ २१ ॥
तादृग्भावस्तमेवार्थं तत्रैव समुपागतः ।
अन्य एव ह्यमी भूतास्तेभ्यस्तास्तादृशा अपि ॥ २२॥
सद्रूपा एव चैतस्य स्वप्नसंकल्पसैन्यवत् ।
अविसंवादि सर्वार्थरूपं यदनुभूयते ॥ २३ ॥
तस्य तावद्वद कथं कीदृशी वापि सत्यता ।
अथवोत्तरकाले तु भङ्गुरत्वादवस्तु तत् ॥ २४ ॥
ईदृक्च सर्वमेवेदं तत्र का नास्तिताधिका ।
स्वप्ने जाग्रदसद्रूपा स्वप्नो जाग्रत्यसन्मयः ॥ २५ ॥
प्रबुद्धलीला बोलीं:
३.४४.१५–१७
> यह क्या है, हे देवी? बताइए। मैं इस तरह क्यों स्थित हूँ? जो मैं पहले थी, वह कैसे अब यह बन गई हूँ?
> मंत्री आदि नागरिक, योद्धा, सेना और वाहनों सहित—सभी वही हैं, ठीक वैसे ही वहाँ स्थित हैं जैसे पहले थे।
> फिर भी यहाँ भी, हे देवी, सभी कैसे स्थित हैं? बाहर और भीतर, जैसे दर्पण में—क्या ये चेतन हैं या क्या?
देवी सरस्वती बोलीं:
३.४४.१८–२०
> जैसे भीतर ज्ञप्ति (चेतना) उदित होती है, वैसे ही वह क्षण भर में अनुभव करती है। चिति चेत्य (विषय) बन जाती है और चित्त चित्त के विषय-सा हो जाता है।
> जैसा अर्थ जगत् रूप में प्रकट होता है, वह उसी क्षण वहाँ उदित हो जाता है। न देश-काल की लंबाई है, न पदार्थों की विचित्रता।
> बाह्य और आभ्यंतर एक-से प्रतीत होते हैं; स्वप्न के अर्थ यहाँ उदाहरण हैं। जो भीतर स्वप्न-संकल्प से नगर या प्रकट होना है, वह चिति का ही कचन (प्रकाशन) है।
३.४४.२१–२५
> वही बाह्य नाम से अभ्यास के कारण स्पष्ट रूप से स्थित है। जैसा भाव तुम्हारा मृत पति उस नगर में उस समय था—
> वैसा ही भाव और अर्थ यहाँ भी आ गया है। ये अन्य प्राणी उनसे अलग हैं, किंतु वे भी वैसी ही हैं।
> ये सत् रूप ही हैं, स्वप्न-संकल्प की सेना के समान। जो अनुभव बिना विरोध के सभी अर्थों वाला होता है—
> अब बताओ, उसकी कैसी सत्यता है या कितनी वास्तविक है? या फिर बाद में उसकी भंगुरता के कारण वह अवस्तु (असत्) हो जाता है।
> ऐसा ही सब कुछ है। तो उसमें अधिक क्या नास्तिता है? स्वप्न में जागृत असत् रूप है, जागृत में स्वप्न असत् मय है।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
मुख्य शिक्षा यह है कि सभी अनुभव भ्रमपूर्ण और क्षणिक हैं। लीला पूछती है कि वह पहले जैसी थी, अब कैसे अलग हो गई, जबकि पूरा परिवाद—मंत्री, योद्धा, नगर—वैसा ही है। यह अद्वैत दृष्टि दर्शाता है: कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं, सब चेतना में प्रक्षेपण मात्र है।
देवी समझाती हैं कि चेतना जागते ही अनुभव कर लेती है। कोई स्थान-काल या भौतिक कारण नहीं—जगत् विचार के अनुसार तुरंत प्रकट होता है। स्वप्न का उदाहरण मुख्य है: स्वप्न में नगर, लोग, घटनाएँ बिना बाह्य पदार्थ के जीवंत लगते हैं, वैसे ही जागृत जगत्। भीतर और बाहर केवल नाम हैं; दोनों दर्पण-सा चेतना में प्रतिबिंब हैं।
प्रत्यक्ष जगत् अभ्यास और बार-बार अनुभव से दृढ़ लगता है, पर स्वप्न वस्तुओं जितना ही है। मृत पति का भाव एक जगत् से दूसरे में स्थानांतरित होता है क्योंकि एक ही चेतना बहुविध प्रतीतियों को जन्म देती है। विभिन्न 'जीवनों' में प्राणी भिन्न दिखते हैं, किंतु समान सार वाले हैं—चेतना की अभिव्यक्तियाँ।
सभी अनुभव अपने ढाँचे में सुसंगत लगते हैं, जैसे स्वप्न की सेना सपने में वास्तविक होती है। किंतु इसकी सत्यता अंतिम नहीं; यह नश्वर और भंगुर है। गहन जाँच या जागृति पर असार सिद्ध होता है। शिक्षा है कि जो ठोस लगता है, वह स्वप्न-सा है; उससे आसक्ति बंधन लाती है।
अंत में, स्वप्न और जागृत की समानता स्थापित होती है—एक दूसरे को असत् मानता है। इससे उच्च सत्य उजागर होता है: पूरा जगत्, जागृत हो या स्वप्न, स्वतंत्र अस्तित्व रहित है। केवल शुद्ध चेतना है, जो सब रूप धारण करती है बिना किसी वृद्धि-क्षय के। इस अद्वैत की पहचान से मुक्ति मिलती है, भ्रम और दुःख से छुटकारा।
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