योग्वशिष्ठ ३.४३.३५–४७
(ये छंद युद्ध और विनाशकारी आग के भयानक दृश्यों का वर्णन करते हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
हा हा हागच्छ ते शीघ्रमेतदङ्गारमन्दिरम् ।
इतः प्रवृत्तं पतितुं सुमेरुः प्रलये यथा ॥ ३५ ॥
अहो शरशिलाशक्तिकुन्तप्रासासिहेतय:।
जालसंध्याभ्रपटलं विशन्ति शलभा इव ॥ ३६॥
हेतिप्रवाहा ज्वलनं नभस्यन्त्यां विशन्त्यहो ।
वडवानलमुज्वालमर्णःपूरा इवार्णवात् ॥ ३७ ॥
धूमायन्ति महाभ्राणि ज्वालाः शिखरिकोटिषु ।
सरसान्यपि शुष्यन्ति हृदयानीव रागिणाम् ॥ ३८ ॥
आलानत्वरुषेवैता दन्तिभिर्वृक्षपङ्क्तयः ।
स्फुरत्कटकटारावं पात्यन्ते कृतचीत्कृतैः ॥ ३९ ॥
पुष्टषुष्पफलस्कन्धा गतश्रीका गृहद्रुमाः।
गता निर्दग्धसर्वस्वा गृहस्था इव दीनताम् ॥ ४० ॥
मातापितृविनिर्मुक्ता बालकास्तिमिरावलीम् ।
मग्नन्तोऽङ्गेषुरथ्यासु कुड्यपातेन हा हताः ॥ ४१॥
वातविद्रावितात्त्रस्यन्कीरण्यो रणमूर्धनि ।
पतदङ्गारकागारभारिणः कटुकूजितम् ॥ ४२ ॥
हा कष्टमसिनिर्भिन्ने स्कन्धे सन्नदृढोल्मुके ।
पतितो यन्त्रपाषाणः पुरुष्स्याशनिर्यथा ॥ ४३॥
गवाश्वमहिषेभोष्ट्रश्वशृगालेडकैरहो ।
घोरै रणमिवारब्धं मार्गरोधकमाकुलैः ॥ ४४॥
पटैः पटपटाशब्दजलजालालिमालितैः।
आक्रन्दन्त्यः स्त्रियो यान्ति स्थलपद्माचिता इव ॥ ४५ ॥
स्त्रीणां ज्वालालवाः पश्य लिहन्त्यलकवल्लरीः ।
कुर्वन्तोऽशोकपुष्पाभां करभा इव पन्नगीः ॥ ४६॥
हा हा हरिणशावाक्ष्याः पक्षलक्षणपक्ष्मसु ।
कुमार्गेष्विव विश्रान्तिमेति कार्शानवी शिखा ॥ ४७ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.४३.३५–४०
> अरे हाय! जल्दी आओ, इस जलते कोयलों के घर में! जैसे प्रलय में सुमेरु पर्वत गिरता है, वैसे ही सब कुछ यहाँ नष्ट होने को दौड़ रहा है।
> अहो! बाण, पत्थर, भाले, कुन्त, प्रास, तलवार आदि हथियार शाम के बादलों के जाल में पतंगों की तरह आकाश में जा रहे हैं।
> हथियारों की धाराएँ जलते आकाश में घुस रही हैं। अहो आश्चर्य! जैसे समुद्र से वडवानल की लपटों में लहरें जाती हैं, वैसे ही।
> बड़े-बड़े बादल धुआँ उगल रहे हैं, पर्वतों की चोटियों पर ज्वालाएँ उठ रही हैं। जल वाले स्थान भी सूख रहे हैं, जैसे प्रेमियों के हृदय सूख जाते हैं।
> ये वृक्षों की पंक्तियाँ क्रोधित हाथियों से बंधे खंभों की तरह उखड़ रही हैं। वे जोर से चटकते और चीखते हुए गिर रहे हैं।
> घरों के वृक्ष, जो फूल, फल और पत्तों से भरे थे, अब अपनी शोभा खो चुके हैं। वे जलकर बर्बाद हो गए हैं, जैसे गृहस्थ दरिद्रता में पहुँच जाते हैं।
३.४३.४१·४७
> माता-पिता से छूटे बच्चे रात के अंधेरे में डूब रहे हैं। हाय! सड़कों में दीवारें गिरने से वे मारे जा रहे हैं।
> युद्ध के सामने हवा से चिंगारियाँ उड़ रही हैं। वे जलते कोयले ढोते हुए दर्द भरी आवाजें कर रही हैं।
> हाय कष्ट! जब तलवार से कंधा कट जाता है और हाथ मजबूती से गिरता है, तो यंत्र का पत्थर मनुष्य पर गिरता है जैसे बिजली गिरती है।
> गाय, घोड़े, भैंस, ऊँट, कुत्ते, सियार और भेड़ें भय पैदा कर रही हैं। रास्ते अवरुद्ध हो गए हैं, जैसे भयंकर युद्ध शुरू हो गया हो।
> स्त्रियाँ चीखती हुई भाग रही हैं, उनके कपड़े फड़फड़ाते हुए जल की लहरों जैसे शब्द कर रहे हैं। वे स्थल पर कमल की तरह दिख रही हैं।
> देखो, आग की चिंगारियाँ स्त्रियों की घुंघराली जुल्फों को चाट रही हैं। वे उनके चेहरों को अशोक के फूलों जैसा लाल कर रही हैं, जैसे हाथी साँपों को छेड़ते हैं।
> हाय हाय! हिरण-सी आँखों वाली युवतियों की लंबी पलकों पर क्रूर ज्वाला विश्राम कर रही है, जैसे आग गलत रास्तों पर ठहर जाती है।
उपदेशों का सार:
ये छंद योग वासिष्ठ में संसार की मिथ्या और क्षणभंगुर प्रकृति को दर्शाते हैं। युद्ध और आग का भयावह चित्रण दर्शाता है कि सांसारिक सुख, सौंदर्य, जीवन और संबंध कितने नश्वर हैं। यह वैराग्य जगाने के लिए है। संसार की अनित्यता का बोध कराते हुए ये छंद बताते हैं कि सब कुछ क्षण में राख हो सकता है। सच्ची शांति बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान में है।
ये दृश्य अहंकार, इच्छाओं और शरीर-परिवार से लगाव की व्यर्थता दिखाते हैं। सच्चा सुख केवल आत्मा में है, जो इन सब से अछूत रहती है। ये छंद अज्ञान की आग को जलाकर ज्ञान से मुक्ति की ओर ले जाते हैं। संसार को स्वप्न जैसा देखकर मन मुक्त हो जाता है।
अंत में, ये छंद वैराग्य और आत्म-विचार का मार्ग दिखाते हैं। संसार की क्षणभंगुरता को समझकर ही शाश्वत सत्य की प्राप्ति होती है, जो जन्म-मृत्यु और दुख से परे है।
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