Thursday, February 26, 2026

अध्याय ३.४२, श्लोक १–१३

योगवशिष्ट ३.४२.१–१३
(ये श्लोक अज्ञानी मन द्वारा जगत् की मिथ्या प्रकृति पर बल देते हैं)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यस्त्वबुद्धमतिर्मूढो रूढो न वितते पदे ।
वज्रसारमिदं तस्य जगदस्त्यसदेव सत् ॥ १ ॥
यथा बालस्य वेतालो मृतिपर्यन्तदुःखदः।
असदेव सदाकारं तथा मूढमते जगत् ॥ २ ॥
ताप एव यथा वारि मृगाणां भ्रमकारणम् ।
असत्यमेव सत्याभं तथा मूढमतेर्जगत् ॥ ३ ॥
यथा स्वप्नमृतिर्जन्तोरसत्या सत्यरूपिणी ।
अर्थक्रियाकरी भाति तथा मूढधियां जगत् ॥ ४ ॥
अव्युत्पन्नस्य कनके कानके कटके यथा ।
कटकज्ञप्तिरेवास्ति न मनागपि हेमधीः ॥ ५ ॥
तथाऽज्ञस्य पुणुराजगनागेश्वमेखसुर् ।
इयं दृश्यदृगेवास्ति न त्वन्या परमाथदृक् ॥ ६ ॥
यथा नभसि मुक्तालीपिच्छकेशोण्ड्रकादयः ।
असत्याः सत्यतां याता भात्येवं दुर्दशां जगत् ॥ ७ ॥
दीर्मस्वप्नमिदं विश्वं विद्ध्यहन्तादिसंयुतम् ।
अत्रान्ये स्वप्नपुरुषा यथा सत्यास्तथा शृणु ॥ ८ ॥
अस्ति सर्वगतं शान्तं परमार्थघनं शुचि।
अचेत्यचिन्मात्रवपुः परमाकाशमाततम् ॥ ९ ॥
तत्सर्वगं सर्वशक्ति सर्वं सर्वात्मकं स्वयम् ।
यत्र यत्र यथोदेति तथास्ते तत्र तत्र वै ॥ १० ॥
तेन स्वप्नपुरे द्रष्टा यान्वेत्ति पुरवासिनः ।
नरानिति नरा एव क्षणात्तस्य भवन्ति ते ॥ ११ ॥
यद्द्रष्टुश्चित्स्वरूपं तत्स्वप्नाकाशान्तरस्थितम् ।
स्वप्नाकाशचित्ताभं हि नरानामेति भावितम् ॥ १२ ॥
वेदितृत्वैक्यवशतो नरतेवावबुध्यते।
आत्मन्यतश्चिद्बलेन द्वयोरप्येति सत्यता ॥ १३ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४२.१–६
> जो व्यक्ति बुद्धिहीन, मूढ़ और उच्च सत्य में स्थिर नहीं है, उसके लिए यह जगत् ठोस और वास्तविक लगता है, यद्यपि वह वास्तव में असत् ही है।
> जैसे बच्चे का काल्पनिक वेताल मृत्यु तक दुःख देता है, वैसे ही मूढ़ बुद्धि के लिए जगत् असत् होते हुए भी सत्-सा प्रतीत होता है।
> जैसे मृगों के लिए ताप से पानी का भ्रम होता है, वैसे ही मूढ़ बुद्धि के लिए जगत् असत्य होते हुए भी सत्य-सा दिखता है।
> जैसे स्वप्न में मृत्यु असत्य होते हुए भी सत्यरूप और प्रभावकारी लगती है, वैसे ही मूढ़ बुद्धि के लिए जगत् प्रतीत होता है।
> सोने के ज्ञान से रहित व्यक्ति के लिए केवल कंगन का ज्ञान होता है, सोने का बिलकुल नहीं।
> इसी प्रकार अज्ञानी के लिए केवल यह दृश्य जगत् और द्रष्टा ही है; कोई अन्य परमार्थ दृष्टि नहीं।

३.४२.७–१३ 
> जैसे आकाश में बादल, फेन या रेखाएँ असत्य होते हुए भी सत्य-सी लगती हैं, वैसे ही दुर्दशा वाले के लिए जगत् भासित होता है।
> यह विश्व अहंकार आदि सहित लंबा स्वप्न समझो। यहाँ स्वप्न-नगर में अन्य स्वप्न-पुरुष जैसे सत्य लगते हैं, वैसा ही सुनो।
> सर्वव्यापी, शांत, परमार्थघन, शुद्ध, केवल चेतना-स्वरूप, परमाकाश जैसा फैला हुआ है।
> वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सब कुछ और सबका आत्मा स्वयं है; जहाँ जहाँ जैसे उदित होता है, वहाँ वैसा ही रहता है।
> स्वप्न-नगर में द्रष्टा जो पुरवासियों को मनुष्य जानता है, वे क्षण भर में उसके लिए मनुष्य ही बन जाते हैं।
> द्रष्टा की चित्-स्वरूपता स्वप्नाकाश में स्थित है; स्वप्नाकाश चित्ताभास ही है, जो मनुष्यों के रूप में भावित होता है।
> वेदनकर्ता की एकता से मनुष्यत्व समझा जाता है; आत्मा में चित्-बल से दोनों की सत्यता हो जाती है।

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
महर्षि वसिष्ठ जी बताते हैं कि जो व्यक्ति समझ से रहित, मूढ़ और उच्च सत्य में नहीं टिका, उसके लिए जगत् ठोस, स्थायी और सार्थक लगता है, जबकि वह वास्तव में असत् है। यह भ्रम बालक के भूत के भय, मरुस्थल में मृगतृष्णा या स्वप्न की मृत्यु जैसा है—सब असत्य होते हुए भी दुःख और क्रियाएँ उत्पन्न करते हैं।

मुख्य शिक्षा यह है कि दृष्टि द्रष्टा की जागृति पर निर्भर है। अज्ञानी केवल रूप देखता है (जैसे कंगन बिना सोने को जाने), मूल चेतना को नहीं पहचानता। कोई परम सत्य की अनुभूति नहीं; केवल दृश्य और द्रष्टा ही रह जाते हैं। बादल, फेन या आकाश-चित्रों की उपमा से दिखाया गया है कि कैसे असत्य वस्तु दोषपूर्ण दृष्टि में सत्य लगती है।

जगत् को लंबा स्वप्न कहा गया है, जिसमें अहंकार और अन्य सब शामिल हैं। स्वप्न-नगर में स्वप्न-निवासी द्रष्टा को उतने ही वास्तविक लगते हैं जितने जागृत में मनुष्य। इससे सिद्ध होता है कि समस्त ब्रह्मांड चेतना के भीतर प्रक्षेपित है, बिना स्वतंत्र अस्तित्व के।

परम वास्तविकता को सर्वव्यापी, शांत, शुद्ध चेतना-मात्र बताया गया है—सबमें व्याप्त, सर्वशक्तिमान और सबका स्वरूप। यह जहाँ जैसे प्रकट होता है, वैसा ही रहता है, बिना अपनी प्रकृति बदले। यह परम आकाश जैसी चेतना ही एकमात्र सत्य है।

अंत में, स्वप्न (और जगत्) में वस्तुओं की सत्यता कैसे आती है, समझाया गया: द्रष्टा की चेतना से स्वप्न-वस्तुएँ और जीव सत्य-से लगते हैं। चेतना की एकता से 'मनुष्यत्व' आदि बोध होता है। आत्मा के चित्-बल से द्रष्टा और दृश्य दोनों में सत्यता आती है। यह शिक्षा देती है कि जगत् की प्रतीति केवल स्व-प्रकाश चेतना से है; इस अद्वैत सत्य का बोध होने से भेद-भ्रम मिट जाता है।

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