योगवशिष्ट ३.४१.५५–६९
(ये श्लोक दर्शाते हैं कि देखा जाने वाला जगत् भ्रम मात्र है, और यह विशाल ठोस विश्व वास्तव में शुद्ध स्वप्रकाशी चेतना - आत्मा, के सिवा कुछ नहीं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
पश्यसीवैतदखिलं न च पश्यसि किंचन।
सर्वात्मकतया नित्यं प्रकचस्यात्मनात्मनि ॥ ५५ ॥
महामणिरिवोदार आलोक इव भास्वरः।
वस्तुतस्तु न भूपीठमिदं न च भवानयम् ॥ ५६ ॥
न चेमे गिरयो ग्रामा न चैते न च वै वयम् ।
गिरिग्रामकविप्रस्य मण्डपाकाशके किल ॥ ५७ ॥
तल्लीलाभर्तृदाराढ्यं जगदाभाति भास्वरम् ।
तत्र लीलाराजधानी मण्डपामण्डिताकृतिः ॥ ५८ ॥
भाति तस्योदरे व्योम्नि तदेवं विदितं जगत् ।
तस्मिञ्जगति गेहेऽन्तर्यस्मिन्वयमिह स्थिताः ॥ ५९॥
एवं तेषां मण्डपानां व्योमाव्योमैव निर्मलम् ।
तथैव मण्डपेष्वस्ति न मही न च पत्तनम् ॥ ६० ॥
न वनानि न शैलौघा न मेघसरिदर्णवाः।
केवलं तत्र निःशून्ये विहरन्ति गृहे जनाः ॥ ६१ ॥
न पश्यन्ति जना नापि पार्थिवा न च भूधराः ।
विदूरथ उवाच ।
एवं चेत्तत्कथं देवि ममेहानुचरा इमे ॥ ६२ ॥
संपन्ना आत्मना सन्ति ते किमात्मनि नोऽथवा ।
जगत्स्वप्नार्थवद्भाति तस्य स्वप्ननरादयः ॥ ६३ ॥
कथमात्मनि सत्याः स्युर्न सत्या वेति मे वद ।
श्रीसरस्वत्युवाच ।
राजन्विदितवेद्येषु शुद्धबोधैकरूपिषु ॥ ६४ ॥
न किंचिदेतत्सद्रूपं चिद्व्योमात्मसु जागतम् ।
शुद्धबोधात्मनो भाति कृतो नाम जगद्भ्रमः ॥ ६५ ॥
रज्ज्वां सर्पभ्रमे शान्ते पुनः सर्पभ्रमः कुतः ।
असद्भावे परिज्ञाते कुतः सत्ता जगद्भ्रमे ॥ ६६ ॥
परिज्ञाते मृगजले पुनर्जलमतिः कुतः।
स्वप्नकाले परिज्ञाते स्वे स्वप्नमरणं कुतः ।
स्वस्वप्ने स्वप्नमृतिभीरमृतस्यैव जायते ॥ ६७ ॥
बुद्धस्य शुद्धस्य शरन्नभःश्रीः स्वच्छावदातातितताशयस्य ।
अहं जगच्चेति कुशब्दकार्थो न वस्तुतः सोऽङ्ग हि वाचिकं तत् ॥ ६८ ॥
इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायंतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम।
स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ६९ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.४१.५५–६०
> तुम यह सारा जगत् देखते हुए भी कुछ नहीं देखते। वास्तव में आत्मा सर्वात्मभाव से सदा अपने में ही प्रकाशित हो रही है।
> यह महान मणि की तरह उदार और प्रकाशमान आलोक की तरह चमकता है। सत्य में न यह पृथ्वी है, न तुम हो, और न यह जगत्।
> न ये पर्वत हैं, न गाँव, न ये लोग और न हम। यह पर्वत-गाँव वाले या विद्वान के मण्डप के आकाश जैसा है।
> वह लीला करने वाला धनी स्वामी जगत् को चमकता हुआ दिखाता है। वहाँ लीला की राजधानी मण्डप से सजी हुई दिखती है।
> उसी मण्डप के आकाश में वह जगत् चमकता है। उस जगत् के घर के भीतर जहाँ हम स्थित हैं...
> उन मण्डपों में भी व्योम ही निर्मल व्योम है। उसी प्रकार मण्डपों में न भूमि है न नगर।
३.४१.६१–६५
> न वन हैं, न पर्वत-समूह, न बादल, नदियाँ, न समुद्र। केवल उस पूर्ण शून्य में घर में लोग विचरण करते हैं।
> लोग नहीं देखते, न राजा, न पर्वत।विदूरथ बोले: यदि ऐसा है तो हे देवि, मेरे ये अनुचर यहाँ कैसे हैं?
> क्या वे आत्मा से पूर्ण हैं, या आत्मा में हैं? जगत् के स्वप्न जैसे अर्थ में उसके स्वप्न-मनुष्य आदि कैसे आत्मा में सत्य होते हैं या नहीं, मुझे बताओ।
> हे राजन्, जो जानने योग्य को जान चुके हैं और शुद्ध बोध मात्र रूप हैं...
> शुद्ध बोध-आत्मा में जगत् का यह सद्रूप कुछ भी नहीं है। शुद्ध बोध-आत्मा में ही जगत्-भ्रम रचा जाता है।
३.४१.६६–६९
> रस्सी में सर्प-भ्रम शान्त होने पर फिर सर्प-भ्रम कहाँ? असत् भाव जान लेने पर जगत्-भ्रम में सत्ता कहाँ?
> मृगतृष्णा के जल को जान लेने पर फिर जल-बुद्धि कहाँ? स्वप्नकाल जान लेने पर स्वप्न में मृत्यु कहाँ? अपने स्वप्न में स्वप्न-मृत्यु की भय केवल जीवित (स्वप्न में) के लिए ही उत्पन्न होती है।
> बुद्धिमान शुद्ध बुद्धि वाले के लिए, जैसे शरद् आकाश या स्वच्छ विशाल सरोवर, "अहं" और "जगत्" ये कुशब्द मात्र हैं, वस्तुतः अर्थहीन; वे केवल वाचिक हैं, हे प्रिय।
> ऐसा कहने के बाद मुनि से दिन सायंकाल में गया। सूर्य अस्त हुआ। सभा ने नमस्कार कर स्नान के लिए गई, और शाम की छाया के साथ रवि की किरणें आईं।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि तुम सब कुछ देखते हुए भी वास्तव में कुछ नहीं देखते क्योंकि सब आत्मा में ही आत्मा रूप से चमक रहा है। कोई वास्तविक पृथ्वी, व्यक्ति, पर्वत या नगर नहीं; सब अनंत आकाश में प्रतिबिम्ब या लीला मात्र है। जगत् मण्डप के आकाश या स्वप्न-नगरी जैसा है, जो अद्वैत की ओर इंगित करता है जहाँ चेतना से अलग कोई वस्तु नहीं।
संवाद में अनंत मण्डपों के भीतर मण्डपों की उपमा से समझाया गया है कि प्रत्येक में केवल शुद्ध शून्य आकाश है, बिना भूमि, वन, नदियों या समुद्र के। लोग उस शून्य में "विचरण" करते हैं, पर कोई वास्तविक द्रष्टा या दृश्य नहीं। यह दर्शाता है कि बहुलता और भौतिकता चेतना पर आरोपित हैं। जगत् केवल चेतना की लीला से चमकता और संरचित दिखता है, पर मूल में निराकार और अव्यक्त है।
विदूरथ पूछते हैं कि यदि सब भ्रम है तो उनके साथी यहाँ कैसे? सरस्वती कहती हैं कि शुद्ध बोध-चेतना में कोई ठोस जगत्-रूप नहीं। सारा विश्व-भ्रम केवल आत्मा में भूल से उत्पन्न होता है। अज्ञान दूर होते ही झूठा प्रतीत स्थायी नहीं रहता, जैसे रस्सी जान लेने पर सर्प-भय सदा के लिए जाता है।
उदाहरणों से भ्रम-निवृत्ति समझाई गई: मृगतृष्णा का जल जान लेने पर जल-धारणा कहाँ? स्वप्न जान लेने पर स्वप्न-मृत्यु कहाँ? स्वप्न में मृत्यु का भय केवल स्वप्न-जीव को होता है, वास्तविक जागृत को नहीं। यह सिखाता है कि संसार, जन्म, मृत्यु और व्यक्तित्व स्वप्न-सदृश आरोप हैं जो सच्चे ज्ञान में लीन हो जाते हैं।
अंत में शुद्ध ज्ञानी बुद्धि को विशाल, स्वच्छ शरद्-आकाश या निर्मल सरोवर जैसा बताया गया। "मैं" और "जगत्" जैसे शब्द अर्थहीन ध्वनियाँ मात्र हैं—केवल वाणी के खेल। शिक्षा अद्वैत ब्रह्म की प्रत्यक्ष अनुभूति में समाप्त होती है, जहाँ द्वैत के सभी भाव लुप्त हो जाते हैं। दृश्य दिन के अंत से जीवन की स्वाभाविक गति दिखाई गई है, जो गहन सत्य के प्रकट होने पर भी चलती रहती है, और शब्दों से परे चिंतन को आमंत्रित करती है।
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