योगवशिष्ट ३.४२.१४–२४
(ये श्लोक योगवसिष्ठ की मुख्य शिक्षा को जारी रखते हैं कि सम्पूर्ण विश्व स्वप्न-सा है, जिसकी परम सत्यता नहीं है)
श्रीराम उवाच ।
स्वप्नेऽपि स्वप्नपुरुषा न सत्याः स्युर्मुने यदि ।
वद तत्को भवेद्दोषो मायामात्रशरीरिणि ॥ १४ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वप्ने न पुरवास्तव्या वस्तुतः सत्यरूपिणः ।
प्रमाणमत्र शृणु मे प्रत्यक्षं नाम नेतरत् ॥ १५ ॥
सर्गादावात्मभूर्भाति स्वप्नाभानुभवात्मकः ।
तत्संकल्पकलं विश्वमेव स्वप्नाभमेव तत् ॥ १६ ॥
एवं विश्वमिदं स्वप्नस्तत्र सत्यं भवान्मम ।
यथैव त्वं तथैवान्ये स्वप्ने स्वप्नवरा नृणाम् ॥ १७ ॥
स्वप्ने नगरवास्तव्याः सत्या न स्युरिमे यदि ।
तदिहापि तदाकारे न सत्यं मे मनागपि ॥ १८ ॥
यथाहं तव सत्यात्मा सत्यं सर्व भवेन्मम ।
स्वप्नोपलम्भे संसारे मिथः सिद्ध्यै प्रमेदृशी ॥ १९ ॥
संसारे विपुले स्वप्ने यथा सत्यमहं तव।
यथा त्वमपि मे सत्यं सर्वं स्वप्नेष्विति क्रमः ॥ २० ॥
श्रीराम उवाच ।
स्वप्नद्रष्टरि निर्निद्रे तद्द्रष्टुः स्वप्नपत्तनम् ।
सद्रूपत्वात्तथैवास्ते ममेति भगवन्मतिः ॥ २१ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतत्तथैवास्ते सत्यत्वात्स्वप्रपत्तनम् ।
स्वप्नद्रष्टरि निर्निद्रेऽप्याकाशविशदाकृति ॥ २२॥
एतदास्तामिदं तावद्यज्जाग्रदिव मन्यसे।
विद्धि तत्स्वप्नमेवान्तर्देशकालाद्यपूरकम् ॥ २३ ॥
एवं सर्वमिदं भाति न सत्यं सत्यवत्स्थितम् ।
रञ्जयत्यपि मिथ्यैव स्वप्नस्त्रीसुरतोपमम् ॥ २४ ॥
श्रीराम बोले:
३.४२.१४
> हे मुनि, यदि स्वप्न में भी स्वप्न के लोग सत्य नहीं होते, तो बताइए, माया मात्र शरीर वाले में क्या दोष होगा?
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४२.१५–२०
> स्वप्न में नगर आदि वास्तव में सत्य रूप नहीं होते। यहाँ मेरा प्रत्यक्ष प्रमाण सुनो; दूसरा कोई नहीं है।
> सर्ग के आरंभ में आत्मभू (ब्रह्म) स्वप्न-सा अनुभव रूप से प्रकाशित होता है। उसका संकल्प ही विश्व बन जाता है, जो स्वप्न-सा ही है।
> इस प्रकार यह विश्व स्वप्न है। इसमें तुम मेरे लिए सत्य हो, जैसे तुम हो। उसी प्रकार अन्य लोग स्वप्न में स्वप्न के लोग होते हैं।
> यदि स्वप्न के नगरवासी सत्य नहीं हैं, तो यहाँ भी इस आकार में मेरे लिए कुछ भी सत्य नहीं है, थोड़ा भी नहीं।
> जैसे मैं तुम्हारे लिए सत्य हूँ, वैसे ही इस स्वप्न-से संसार में सब मेरे लिए सत्य हो जाता है, आपस में इस तरह सिद्ध होता है।
> इस विशाल स्वप्न-रूप संसार में जैसे मैं तुम्हारे लिए सत्य हूँ, वैसे तुम मेरे लिए सत्य हो, और स्वप्नों में सब इसी क्रम से चलता है।
श्रीराम बोले:
३.४२.२१
> स्वप्न देखने वाले में जो निद्रा-रहित है, उसके लिए वह स्वप्न का नगर सत्य रूप से रहता है। मेरी बुद्धि ऐसी है कि वह सत्य रूप होने से ऐसा ही है।
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४२.२२–२४
> ऐसा ही है, ठीक वैसा ही। सत्य होने से स्वप्न का नगर निद्रा-रहित स्वप्नद्रष्टा में भी आकाश-सा विशद रूप से रहता है।
> अभी यह जैसा है वैसा ही रहने दो—जिसे तुम जाग्रत्-सा मानते हो। जानो कि वह स्वप्न ही है, जो अंदर देश-काल आदि से भरपूर है।
> इस प्रकार सब कुछ प्रतीत होता है, पर सत्य नहीं है, यद्यपि सत्य-सा स्थित है। यह मिथ्या ही रंजित करता है, जैसे स्वप्न की स्त्री से सुख-सा।
श्लोकों की शिक्षा का विस्तृत सार:
राम पूछते हैं कि यदि स्वप्न के लोग असत्य हैं, तो माया-मात्र शरीर वाले में क्या दोष होगा? वसिष्ठ बताते हैं कि जैसे स्वप्न में नगर आदि वास्तविक नहीं होते, वैसे ही जाग्रत् जगत भी सत्य नहीं है। प्रमाण केवल प्रत्यक्ष है, जो दिखाता है कि सृष्टि की शुरुआत में चेतना से स्वप्न-सा प्रकाश होता है।
संवाद जाग्रत् और स्वप्न की अवस्थाओं में कोई भेद नहीं होने पर जोर देता है। विश्व शुद्ध चेतना (ब्रह्म या आत्मभू) के संकल्प से स्वप्न-सा प्रकट होता है, दिखता सत्य है पर स्वप्न-सा ही रहता है। राम और वसिष्ठ एक-दूसरे की "सत्यता" को स्वप्न-रूप में स्वीकार करते हैं, यह दिखाते हुए कि जीव आपस में प्रक्षेपण से एक-दूसरे को सत्य मानते हैं, पर स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखते।
शिक्षा सापेक्षता और परस्पर निर्भरता पर बल देती है। एक अवस्था में जो सत्य लगता है (जाग्रत् में स्वप्नद्रष्टा को), दूसरी में असत्य है। यदि स्वप्न के निवासी झूठे हैं, तो जाग्रत् में भी कुछ सत्य नहीं। यह आपसी सिद्धि (मिथः सिद्धि) दिखाती है कि मन विश्वास और अनुभव से भ्रम बनाता और टिकाता है।
राम कहते हैं कि निद्रा-रहित साक्षी (शुद्ध आत्मा) में भी स्वप्न-नगर सत्य-सा लगता है। वसिष्ठ सहमत हैं: स्वप्न अपनी सत्यता से स्वप्नद्रष्टा में आकाश-सा स्पष्ट रहता है। फिर भी जो जाग्रत् माना जाता है, वह आंतरिक स्वप्न ही है, जिसमें देश-काल आदि कृत्रिम रूप से भरे हैं।
अंत में सबकी मिथ्या प्रकृति पर बल है। सब दिखता है पर सत्य नहीं, सत्य-सा टिका रहता है। यह झूठे ही आनंद देता है, जैसे स्वप्न में स्त्री-सुख। जगत मोहक है पर मिथ्या है, इसलिए साधक को इसकी स्वप्न-सा गुणवत्ता पहचानकर आसक्ति छोड़नी चाहिए और उससे परे अटल सत्य को जानना चाहिए।
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