Tuesday, February 24, 2026

अध्याय ३.४१, श्लोक ४१–५४

योगवशिष्ट ३.४१.४१–५४
(इन श्लोकों में ऋषि वसिष्ठ अपने शारीरिक क्षय का वर्णन करते हैं कि सत्तर वर्ष बीतने के बाद उनका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
वयसः समतीतानि मम वर्षाणि सप्ततिः ।
इदं परबलं प्राप्तं मम दारुणविग्रहः ॥ ४१ ॥
युद्धं कृत्वेदमायातो गृहमस्मिन्यथास्थितम् ।
इमे देव्यौ गृहे प्राप्ते ममैते पूजयाम्यहम् ॥ ४२ ॥
पूजिता हि प्रयच्छन्ति देवताः स्वसमीहितम् ।
ममेयमेतयोरेका ज्ञानं जातिस्मृतिप्रदम् ॥ ४३ ॥
इह दत्तवती देवी भाब्जस्येव विकासनम् ।
इदानीं कृतकृत्योऽस्मि जातोऽस्मि गतसंशयः ॥ ४४ ॥
शाम्यामि परिनिर्वामि सुखमासे च केवलम् ।
इतीयमातता भ्रान्तिर्भवतो भूरिसंभ्रमा ॥ ४५ ॥
नानाचारविहाराढ्या सलोकान्तरसंचरा।
यस्मिन्नेव मुहूर्ते त्वं मृतिमभ्यागतः पुरा ॥ ४६ ॥
तदैव प्रतिभैषा ते स्वयमेवोदिता हृदि ।
एकामावर्तचलनां त्यक्त्वा दत्ते यथाऽपराम् ॥ ४७ ॥
क्षिप्रमेव नदीवाहो वित्प्रवाहस्तथैव च।
आवर्तान्तरसंमिश्रो यथावर्तः प्रवर्तते ॥ ४८ ॥
कदाचिदेवं सर्गश्रीर्मिश्राऽमिश्रा च वर्धते ।
तस्मिन्मृतिमुहूर्ते ते प्रतिभानमुपागतम् ॥ ४९ ॥
एतज्जालमसद्रूपं चिद्भानोः समुपस्थितम् ।
यथा स्वप्नमुहूर्तेऽन्तः संवत्सरशतभ्रमः ॥ ५० ॥
यथा संकल्पनिर्माणे जीवनं मरणं पुनः ।
यथा गन्धर्वनगरे कुड्यमण्डनवेदनम् ॥ ५१ ॥
यथा नौयानसंरम्भे वृक्षपर्वतवेपनम्।
यथा स्वधातुसंक्षोभे पूर्वपर्वतनर्तनम् ॥ ५२ ॥
यथा समञ्जसं स्वप्ने स्वशिरःप्रविकर्तनम् ।
मिथ्यैवैवमियं प्रौढा भ्रान्तिराततरूपिणी ॥ ५३ ॥
वस्तुतस्तु न जातोऽसि न मृतोऽसि कदाचन ।
शुद्धविज्ञानरूपस्त्वं शान्त आत्मनि तिष्ठसि ॥ ५४ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४१.४१–४५
> मेरे जीवन के सत्तर वर्ष बीत चुके हैं। अब मेरा यह भयानक शरीर बहुत कमजोर और शक्तिहीन हो गया है।
> युद्ध करके मैं घर लौटा हूँ, जैसा था वैसा ही। ये दोनों देवियाँ मेरे घर आई हैं, और मैं इनकी पूजा कर रहा हूँ।
> पूजित देवियाँ निश्चय ही मनचाहा फल देती हैं। इनमें से एक देवी ने मुझे वह ज्ञान दिया है जो पिछले जन्मों की स्मृति प्रदान करता है।
> इस देवी ने यहाँ मुझे कमल के फूलने जैसा विकास दिया है। अब मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है, और सारे संदेह दूर हो गए हैं।
> अब मैं शांत हूँ, पूर्ण निर्वाण में हूँ, केवल सुख में विराजमान हूँ।

३.४१.४६–५०
> तुम्हारी यह फैली हुई भ्रांति, जो बहुत भ्रम से भरी है, जिसमें नाना प्रकार की गतिविधियाँ और लोकों में संचरण है...
> ...वह पुराने समय में जब तुम मृत्यु के सामने आए थे, उसी क्षण तुम्हारे हृदय में स्वयं उठी थी। जैसे एक लहर अपनी गति छोड़कर दूसरी में मिल जाती है।
> नदी के प्रवाह या विचारों के प्रवाह की तरह जल्दी ही एक भँवर दूसरे में मिल जाता है और नया भँवर चल पड़ता है।
> कभी सृष्टि की सुंदरता इस प्रकार मिश्रित और अमिश्रित रूप से बढ़ती है। तुम्हारी मृत्यु के उस क्षण में यह प्रतिभा (भास) तुममें उपस्थित हुई।
> चेतना के प्रकाश के सामने यह असत् रूपों का जाल उपस्थित हुआ, जैसे स्वप्न के एक क्षण में सौ वर्षों का भ्रम हो जाता है।

३.४१.५१–५४
> जैसे संकल्प से निर्माण में जीवन और फिर मरण होता है, या गंधर्वनगर में दीवार की सजावट का दर्द महसूस होता है।
> जैसे नाव चलने के उत्साह में वृक्ष और पर्वत हिलते दिखते हैं, या अपने तत्वों के क्षोभ में पहले के पर्वत नाचते दिखते हैं।
> जैसे सुसंगत स्वप्न में अपना ही सिर काटना, ठीक वैसे ही यह फैली हुई भव्य भ्रांति मिथ्या है।
> वास्तव में तुम कभी जन्मे नहीं, न कभी मरे हो। तुम शुद्ध विज्ञान रूप हो, शांत हो, और आत्मा में स्थित रहते हो।

शिक्षाओं का विस्तृत सार:
युद्ध से लौटकर वे घर में हैं और दो देवियों की पूजा कर रहे हैं। इनमें से एक देवी ने उन्हें जातिस्मृति देने वाला ज्ञान प्रदान किया है, जो कमल के खिलने जैसा है। इससे वे कृतार्थ हो गए हैं, संशय दूर हुए हैं, और वे केवल शांति और सुख में स्थित हैं। शिक्षा यह है कि वृद्धावस्था या कठिनाई में भी भक्ति और दिव्य कृपा से उच्च ज्ञान जागृत हो सकता है, और शरीर की सीमाओं से ऊपर उठकर आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

वसिष्ठ फिर राम की भ्रांति की ओर इशारा करते हैं कि यह विशाल भ्रम—जिसमें अनेक क्रियाएँ, लोक-संचरण और मानसिक उथल-पुथल है—उनके मन में मृत्यु के क्षण में स्वयं उठा था। नदी या विचार-प्रवाह की तरह एक वृत्ति दूसरे में विलीन होकर नया रूप ले लेती है। यह दिखाता है कि संसार की निरंतरता केवल मानसिक प्रवाह है, कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं।

सृष्टि का प्रसार कभी मिश्रित (सत्य जैसा) और कभी शुद्ध (असत्य) रूप में बढ़ता है, लेकिन यह क्षणभंगुर है। मृत्यु के क्षण में चेतना के समक्ष यह भास प्रकट होता है, जैसे स्वप्न के एक पल में सैकड़ों वर्षों का भ्रम गुजर जाता है। शिक्षा है कि समय, जीवन-मरण और अनुभव चेतना के भीतर के प्रक्षेपण हैं, बाहरी सत्य नहीं।

विविध उदाहरणों से—जैसे संकल्प में जीवन-मरण, गंधर्वनगर में मिथ्या पीड़ा, नाव से पर्वतों का हिलना, या स्वप्न में सिर काटना—यह सिद्ध किया जाता है कि यह पूरी भ्रांति असत्य है। सब कुछ मन का फैलाव मात्र है, जिसमें कोई सच्ची सत्ता नहीं।

अंत में सत्य यह है कि वास्तव में न जन्म हुआ है न मृत्यु। तुम शुद्ध चेतना हो, शांत हो, और आत्मा में ही स्थित रहते हो। यह अद्वैत ज्ञान की पराकाष्ठा है, जो मृत्यु-भय और संसार-दुख से मुक्ति देता है, और केवल आत्म-स्थिति की ओर ले जाता है।

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