योगवशिष्ट ३.४१.१–२०
(ये छंद एक दिव्य दृश्य का वर्णन करते हैं, जहाँ दो देवियाँ—लीला और सरस्वती राजा विदुरथ के महल में प्रवेश करती हैं। अपनी देदीप्यमान उपस्थिति से वे राजा को जगा देती हैं, इसके बाद राजा का मंत्री उनके वंश का वर्णन करता है।ये श्लोक संसार की माया और दिव्य हस्तक्षेप से उच्च चेतना की जागृति को दर्शाते हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तयोः प्रविष्टयोर्देव्योः पद्मसद्म बभूव तत् ।
चन्द्रद्वयोदयोद्द्योतधवलोदरसुन्दरम् ॥ १ ॥
कोमलामलसौगन्ध्यमृदुमन्दारमारुतम् ।
तत्प्रभावेन निद्रालुनृपेतरनराङ्गनम् ॥ २ ॥
सौभाग्यनन्दनोद्यानं विद्रुतव्याधिवेदनम् ।
सवसन्तं वनमिव फुल्लं प्रातीरवाम्बुजम् ॥ ३ ॥
तयोर्देहप्रभापूरैः शशिनिस्यन्दशीतलैः ।
आह्लादितोऽसौ बुबुधे राजोक्षित इवामृतैः ॥ ४ ॥
आसनद्वयविश्रान्तं स ददर्शाप्सरोद्वयम्।
मेरुशृङ्गद्वये चन्द्रबिम्बद्वयमिवोदितम् ॥ ५ ॥
निमेषमिव संचिन्त्य स विस्मितमना नृपः ।
उत्तस्थौ शयनाच्छेषादिव चक्रगदाधरः ॥ ६ ॥
परिसंयमितालम्बिमाल्यहाराधराम्बरः ।
पुष्पाहार इवोत्फुल्लं जग्राह कुसुमाञ्जलिम् ॥ ७ ॥ >>>
उवाच देवी ।
हे राजन्कस्त्वं कस्य सुतः कदा ।
इह जात इति श्रुत्वा स मन्त्री वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
देव्यौ युष्मत्प्रसादोऽयं भवत्योरपि यत्पुरः ।
वक्तुं शक्नोमि तद्देव्यौ श्रूयेतां जन्म मत्प्रभोः ॥ १४ ॥
आसीदिक्ष्वाकुवंशोत्थो राजा राजीवलोचनः ।
श्रीमान्कुन्दरथो नाम दोश्छायाच्छादितावनिः ॥ १५ ॥
तस्याभूदिन्दुवदनः पुत्रो भद्ररथाभिधः ।
तस्य विश्वरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः ॥ १६ ॥
तस्य सिन्धुरथः पुत्रस्तस्य शैलरथः सुतः।
तस्य कामरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो महारथः ॥ १७ ॥
तस्य विष्णुरथः पुत्रस्तस्य पुत्रो नभोरथः।
अयमस्मत्प्रभुस्तस्य पुत्रः पूर्णामलाकृतिः ॥ १८ ॥
अमृतापूरितजनः क्षीरोदस्येव चन्द्रमाः ।
महद्भिः पुण्यसंभारैर्विदूरथ इति श्रुतः ॥ १९ ॥
जातो मातुः सुमित्राया गौर्या गुह इवापरः ।
पितास्य दशवर्षस्य दत्त्वा राज्यं वनं गतः ॥ २० ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४१.१–७
> दोनों देवियों के प्रवेश करने पर वह कमल-सदृश महल दो चंद्रमाओं के उदय से प्रकाशित हो उठा, जिसका भीतरी भाग शुद्ध श्वेत आभा से सुंदर हो गया।
> वहाँ कोमल, शुद्ध, मंदार पुष्पों की सुगंध से भरी मंद हवा बह रही थी, जिसके प्रभाव से सोया हुआ राजा छोड़कर अन्य सभी लोग आनंद में निद्रालु हो गए।
> यह सौभाग्य और आनंद का उद्यान था, जहाँ रोग और वेदना भाग गए थे, जैसे वसंत में फूला हुआ वन या प्रभात में नदी-तट के कमल-वन।
> दोनों देवियों के शरीर से निकलती चंद्रमा-सी शीतल किरणों से राजा आह्लादित होकर जागे, मानो अमृत से सिक्त हो गए हों।
> उन्होंने दो देवियों को आसनों पर विराजमान देखा, जैसे मेरु पर्वत की दो चोटियों पर दो चंद्रमा उदित हुए हों।
> एक क्षण विचार कर विस्मित मन से राजा बिस्तर से उठे, जैसे शेष पर लेटे चक्र-गदा धारी विष्णु उठते हैं।
> अपनी मालाओं, हारों और वस्त्रों को संभालते हुए उन्होंने फूलों की अंजलि चढ़ाई, जैसे खिले हुए पुष्पों का हार।
३.४१.८–१२
> ये श्लोक राजा के सम्मानपूर्ण व्यवहार, दिव्य अतिथियों पर उनके आश्चर्य और देवियों द्वारा उनकी पहचान पूछने की शुरुआत का वर्णन जारी रखते हैं, जिससे मंत्री को बोलने का अवसर मिलता है।
देवी बोलीं—
३.४१.१३–२०
> हे राजन्, तुम कौन हो? किसके पुत्र हो? कब यहाँ जन्मे? यह सुनकर मंत्री ने ये वचन कहे।
> हे देवियों, आपकी कृपा से ही मैं आपके सामने बोल पा रहा हूँ। मेरे स्वामी के जन्म का वृत्तांत सुनिए।
> इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजा राजीवलोचन कुंदरथ नाम से प्रसिद्ध थे, जिनकी भुजाओं की छाया से पृथ्वी ढकी रहती थी।
> उनके पुत्र चंद्र-मुख भद्ररथ थे; उनके पुत्र विश्वरथ; उनके पुत्र बृहद्रथ।
> उनके पुत्र सिंधुरथ; उनके पुत्र शैलरथ; उनके पुत्र कामरथ; उनके पुत्र महारथ।
> उनके पुत्र विष्णुरथ; उनके पुत्र नभोरथ। हमारा यह स्वामी उनकी संतान है, पूर्ण और निर्मल रूप वाला।
> अमृत से भरे लोगों वाला, जैसे क्षीरसागर से चंद्रमा, महान पुण्य-संचय के कारण विदूरथ नाम से विख्यात।
> माता सुमित्रा से जन्मा, जैसे गौरी से दूसरा गुह (कार्तिकेय); पिता ने दस वर्ष की आयु में राज्य देकर वन चले गए।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
देवियों का महल में प्रवेश सामान्य राजभवन को दिव्य आनंदमय क्षेत्र में बदल देता है, जो यह सिखाता है कि आध्यात्मिक उपस्थिति अज्ञान, रोग और दुख को दूर कर सकती है। उनकी चंद्रमा-सी शीतल किरणों से राजा का जागना आत्मा की दिव्य कृपा या ज्ञान से पुनर्जीवन का प्रतीक है, जहाँ सांसारिक नींद (अज्ञान) सत्य की अनुभूति में बदल जाती है। यह बताता है कि भौतिक जगत कितना भी ठोस लगे, उच्च चेतना के स्पर्श से उसका रूपांतरण संभव है।
राजा का उठकर श्रद्धा से फूल चढ़ाना विनम्रता, भक्ति और दिव्य को पहचानने का आदर्श दर्शाता है। उनका आश्चर्य और तुरंत संयम साधक की उचित प्रतिक्रिया दिखाता है—सुंदर पर विस्मय, फिर समर्पण और पूजा। यह सिखाता है कि सच्ची राजत्व शक्ति में नहीं, बल्कि आत्म-विराट सत्य को सम्मान देने में है।
मंत्री द्वारा वंशावली सुनाना राजा की पहचान को ऐतिहासिक संदर्भ देता है, पर सूक्ष्म रूप से वंशों की क्षणभंगुरता दिखाता है। इक्ष्वाकु से विदूरथ तक की श्रृंखला राजधर्म की निरंतरता दिखाती है, किंतु विदूरथ की शुद्धता, पुण्य और शीघ्र राज्याभिषेक उसकी आध्यात्मिक तैयारी का संकेत है। यह सिखाता है कि नाम, कुल और पदवी अस्थायी हैं, जो मन को शाश्वत चेतना में लीन होने के लिए तैयार करते हैं।
देवियों का प्रश्न और मंत्री का उत्तर आत्म-जिज्ञासा की शुरुआत है, जो योगवासिष्ठ का मूल तत्व है: "मैं कौन हूँ?" यह जन्म, मूल और पहचान पर विचार कराता है, दिखाता है कि व्यक्तिगत इतिहास स्वप्न-सदृश जगत का हिस्सा है। मंत्री को बोलने की शक्ति दिव्य कृपा से मिलना दर्शाता है कि सच्चा ज्ञान ऊपर से प्राप्त होता है, केवल प्रयास से नहीं।
कुल मिलाकर, ये श्लोक जीवन को दिव्य लीला बताते हैं, जहाँ जन्म, शासन और जागृति आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं। महल का दृश्य चेतना के आंतरिक मंदिर का प्रतीक है, जहाँ व्यक्ति ब्रह्म से मिलता है। शिक्षाएँ सांसारिक आसक्ति से विरक्ति, ज्ञान-धारकों के प्रति श्रद्धा और नाम-रूप-कुल से ऊपर उठकर शाश्वत आत्मा में स्थित होने पर बल देती हैं।
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