Friday, February 20, 2026

अध्याय ३.४०, श्लोक ४४–५४

योगवशिष्ट ३.४०.४५–५४
(ये श्लोक बताते हैं कि मृत्यु के क्षण में या जन्म-मृत्यु के चक्र में प्रत्येक जीव अपना व्यक्तिगत संसार कैसे रचता और अनुभव करता है)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यत्रैव म्रियते जन्तुः पश्यत्याशु तदेव सः।
तत्रैव भुवनाभोगमिममित्थमिव स्थितम् ॥ ४५ ॥
व्योमैवानुभवत्यच्छमहं जगदिति भ्रमम्।
व्योमरूपं व्योमरूपी जीवो जात इवात्मवान् ॥ ४६ ॥
सुरपत्तनशैलार्कतारानिकरसुन्दरम् ।
जरामरणवैक्लव्यव्याधिसंकटकोटरम् ॥ ४७ ॥
स्वभावाभावसंरम्भस्थूलसूक्ष्मचराचरम् ।
साव्ध्यद्व्युर्वीनदीशाहोरात्रिकल्पक्षणक्षयम् ॥ ४८ ॥
अहं जातोऽमुना पित्रा किलात्रेत्याप्तनिश्चयम् ।
इयं माता धनमिदं ममेत्युदितवासनम् ॥ ४९ ॥
सुकृतं दुष्कृतं चेदं ममेति कृतकल्पनम्।
बालोऽभूवमहं त्वद्य युवेति विलसद्धृदि ॥ ५० ॥
प्रत्येकमेवमुदितः संसारवनखण्डकः।
ताराकुसुमितो नीलमेघचञ्चलपल्लवः ॥ ५१ ॥
चरन्नरमृगानीकः सुरासुरविहंगमः ।
आलोककौसुमरजाः श्यामागहनकुञ्जकः ॥ ५२ ॥
अब्धिपुष्करिणीपूर्णो मेर्वाद्यचललोष्टकः ।
चित्तपुष्करबीजान्तर्निलीनानुभवाङ्कुरः ॥ ५३ ॥
यत्रैष म्रियते जीवस्तत्रैवं पश्यति क्षणात् ।
प्रत्येकमुदितेष्वेवं जगत्खण्डेषु भूरिशः ॥ ५४ ॥

महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.४०.४५–५०
> जहाँ भी कोई जीव मरता है, वह तुरंत उसी स्थान को अपना संसार इस प्रकार फैला हुआ देखता है।
> शुद्ध आकाश ही "मैं जगत हूँ" ऐसा भ्रम अनुभव करता है। आकाश रूप वाला, आकाश स्वरूप जीव आत्मवान् बनकर जन्मा हुआ-सा प्रतीत होता है।
> देवताओं के नगर, पर्वत, सूर्य, तारों के समूह से सुंदर दिखने वाला; परंतु बुढ़ापा, मृत्यु, क्लेश, रोगों की पीड़ा से खोखला।
> स्वभाव से अभाव और भाव, स्थूल-सूक्ष्म, चर-अचर वाला; पर्वत, पृथ्वी, नदियाँ, दिन-रात, कल्प, क्षण और उनका नाश शामिल।
> "मैं इस पिता से यहाँ जन्मा" ऐसा दृढ़ निश्चय, "यह मेरी माता है, यह धन मेरा है" ऐसी वासना।
> "ये मेरे सुकृत और दुष्कृत हैं" ऐसी कल्पना, हृदय में "पहले मैं बालक था, अब युवा हूँ" ऐसा विचार।

३.४०.५१–५४
> इस प्रकार प्रत्येक अलग-अलग संसार-वन का खंड उठता है — तारों से फूला हुआ, नीले मेघों के चंचल पत्तों वाला।
> मनुष्य और पशुओं के झुंडों से चलता, देव-असुर पक्षियों वाला; प्रकाश की किरणों से फूलों-सा छिड़का, श्याम घने कुंजों वाला।
> समुद्र और तालाबों से भरा, मेरु आदि पर्वतों के टुकड़ों वाला; चित्त के कमल बीज के अंदर अनुभव का अंकुर छिपा हुआ।
> जहाँ यह जीव मरता है, वहाँ क्षण भर में यही देखता है; इस प्रकार बहुत से ऐसे अलग-अलग उठे जगत् खंडों में बार-बार होता है।

शिक्षाओं का विस्तृत सार:
मृत्यु अंत नहीं, बल्कि तत्काल संक्रमण है जहाँ मरता हुआ जीव अपनी वासना और मन के आधार पर नया या निरंतर संसार देखता है। संसार सबके लिए एक समान वस्तुनिष्ठ नहीं, प्रत्येक आत्मा अपनी चेतना से उसे प्रक्षेपित करती है, जो जगत की मायावी और व्यक्तिपरक प्रकृति दिखाता है।

मुख्य विचार यह है कि समस्त ब्रह्मांड शुद्ध, निराकार आकाश (व्योम) के भीतर ही प्रकट होता है। जीव इस खाली आकाश से अभिन्न होते हुए भी स्वयं को सीमित मानकर "मैं जगत हूँ" ऐसा भ्रम करता है, और देवनगर, पर्वत, तारे, रोग, बुढ़ापा, समय चक्र आदि से भरा सुंदर पर दुखद संसार कल्पित करता है। यह भ्रम (भ्रम) से उत्पन्न होता है, जो अद्वैत की ओर इशारा करता है — सृष्टि के अलावा कुछ नहीं।

श्लोक बताते हैं कि अहंकार की धारणाएँ इस भ्रम को मजबूत करती हैं: "मैं इस पिता से यहाँ पैदा हुआ", "यह मेरी माता", "यह मेरा धन", "ये मेरे अच्छे-बुरे कर्म", बाल्य से युवावस्था तक का समय-बोध। ये वासना जीव को संसार चक्र में बाँधती हैं, संसार को ठोस और व्यक्तिगत बनाती हैं, जबकि वह मात्र मानसिक रचना है।

काव्यात्मक रूपकों से वसिष्ठ प्रत्येक के संसार को संसार-वन के अलग खंड के रूप में वर्णित करते हैं: तारे फूल, बादल पत्ते, जीव-जंतु विचरण, प्रकाश फूलों-सा, घने अंधेरे कुंज, समुद्र-पर्वत, सब चित्त के बीज से अंकुरित। यह चेतना में असंख्य निजी जगतों की बहुलता दिखाता है — प्रत्येक देखने वाले के लिए अलग, पर मूल एक ही।

अंततः शिक्षा मुक्ति की ओर ले जाती है। चूँकि मृत्यु पर जीव तुरंत अपना संसार देखता है और यह कई खंडों में दोहराता है, सत्य समझने से मुक्ति मिलती है। शरीर, अहंकार, वासना से अलग होकर शुद्ध आकाश-रूप चेतना का बोध होने पर जन्म-मृत्यु का भ्रम समाप्त हो जाता है, और अलग संसारों व व्यक्तिगत दुख का अंत होता है।

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