योगवशिष्ट ३.४०.२८–४४
(ये श्लोक चित्त की प्रकृति को जगत् और व्यक्तिगत अस्तित्व का मूल कारण बताते हैं)
श्रीराम उवाच ।
किं चित्तमेतद्भवति किंवा भवति नौ कथम् ।
कथमेव न सद्रूपं नान्यद्भवति वीक्षणात् ॥ २८ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्रत्येकमेव यच्चित्तं तदेवंरूपशक्तिकम् ।
पृथक्प्रत्येकमुदितः प्रतिचित्तं जगद्भ्रमः ॥ २९ ॥
क्षणकल्पजगत्संघा समुद्यन्ति गलन्ति च ।
निमेषात्कस्यचित्कल्पात्कस्यचिच्च क्रमं श्रृणु ॥ ३० ॥
मरणादिमयी मूर्च्छा प्रत्येकेनानुभूयते ।
यैषा तां विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम् ॥ ३१ ॥
तदन्ते तनुते सर्गं सर्व एव पृथक्पृथक् ।
सहजस्वप्नसंकल्पान्संभ्रमाचलनृत्यवत् ॥ ३२ ॥
महाप्रलयरात्र्यन्ते चिरादात्ममनोवपुः ।
यथेदं तनुते तद्वत्प्रत्येकं मृत्यनन्तरम् ॥ ३३ ॥
श्रीराम उवाच ।
मृतेरनन्तरं सर्गो यथा स्मृत्यानुभूयते।
चिरात्तथानुभवति नातो विश्वमकारणम् ॥ ३४ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
महति प्रलये राम सर्वे हरिहरादयः ।
विदेहमुक्ततां यान्ति स्मृतेः क इव संभव ॥ ३५ ॥
अस्मदादिः प्रबुद्धात्मा किलावश्यं विमुच्यते ।
कथं भवन्तु नो मुक्ता विदेहाः पद्मजातयः ॥ ३६ ॥
अन्ये त्वमिव ये जीवास्तेषां मरणजन्मसु ।
स्मृतिः कारणतामेति मोक्षाभाववशादिह ॥ ३७ ॥
भवत्यद्रिर्धराधारो बद्धपीठो नभः शिराः।
जीवो हि मृतिमूर्च्छान्ते यदन्तः प्रोन्मिषन्निव ।
अनुन्मिषित एवास्ते तत्प्रधानमुदाहृतम् ॥ ३८ ॥
तद्व्योमप्रकृतिः प्रोक्ता तदव्यक्तं जडाजडम् ।
संस्मृतेरस्मृतेश्चैव क्रम एष भवोदये ॥ ३९ ॥
बोधोन्मुखत्वे हि महत्तत्प्रबुद्धं यदा भवेत् ।
तदा तन्मात्रदिक्कालक्रिया भूताद्युदेति खात् ॥ ४० ॥
तदेवोच्छूनमाबुद्धं भवतीन्द्रियपञ्चकम्।
तदेव बुध्यते देहः स एषोऽस्यातिवाहिकः ॥ ४१ ॥
चिरकालप्रत्ययतः कल्पनापरिपीवरः।
आधिभौतिकताबोधमाधत्ते चैष बालवत् ॥ ४२ ॥
ततो दिक्कालकलनास्तदाधारतया स्थिताः ।
उद्यन्त्यनुदिता एव वायोः स्पन्दक्रिया इव ॥ ४३ ॥
वृद्धिमित्थमयं यातो मुधैव भुवनभ्रमः ।
स्वप्नाङ्गनासङ्गसमस्त्वनुभूतोऽप्यसन्मयः ॥ ४४ ॥
श्रीराम ने पूछा:
३.४०.२८
> यह चित्त क्या है? यह कैसे होता है, या कैसे नहीं होता? देखने से यह सत् रूप क्यों नहीं है और कुछ और क्यों नहीं होता?
महर्षि वशिष्ठ ने कहा:
३.४०.२९–३३
> प्रत्येक चित्त अलग-अलग रूप की शक्ति वाला है। प्रत्येक चित्त से अलग-अलग उठकर प्रत्येक के लिए जगत का भ्रम अलग-अलग प्रकट होता है।
> क्षण या कल्प तक के जगत् समूह उठते और गिरते हैं। किसी के लिए एक निमेष में कल्प बीतता है, किसी के लिए क्रम सुनो।
> प्रत्येक को मरण आदि वाली मूर्च्छा का अनुभव होता है। हे सुमते, इसे महाप्रलय की रात्रि जानो।
> उसके बाद सभी अलग-अलग सर्ग फैलाते हैं, स्वाभाविक स्वप्न-संकल्प से, भ्रम से अस्थिर नृत्य की तरह।
> महाप्रलय रात्रि के अंत में चिरकाल बाद आत्म-मन का शरीर जैसे यह जगत फैलाता है, वैसे ही प्रत्येक मृत्यु के बाद करता है।
श्रीराम ने कहा:
३.४०.३४
> मृत्यु के बाद सर्ग स्मृति से जैसे अनुभव होता है, चिरकाल बाद वैसा अनुभव होता है; विश्व बिना कारण नहीं है।
महर्षि वशिष्ठ ने कहा:
३.४०.३५–३८
> महाप्रलय में राम, हरि-हर आदि सभी विदेह मुक्ति को प्राप्त होते हैं; स्मृति कहाँ से होगी?
> हम जैसे प्रबुद्ध आत्मा वाले अवश्य मुक्त होते हैं। पद्मज आदि विदेह कैसे मुक्त न हों?
> तुम जैसे अन्य जीवों के लिए मरण-जन्म में स्मृति कारण बनती है, यहाँ मोक्ष के अभाव से।
> पर्वत धरती का आधार बनता है, बद्ध पीठ वाला आकाश सिर वाला। जीव मृत्यु-मूर्च्छा के अंत में अंदर जैसे उन्मिषित होता है, पर उन्मिषित नहीं रहता; इसे प्रधान कहा है।
३.४०.३९–४४
> वही व्योम-प्रकृति, अव्यक्त, जड़-अजड़ कहा गया है। स्मृति और अस्मृति से यह क्रम भवोदय में है।
> महान में बोध की ओर उन्मुख होने पर प्रबुद्ध होकर वह तन्मात्रा, दिक्, काल, क्रिया, भूत आदि ख से उदित करता है।
> वही उच्छून और आबुद्ध इन्द्रिय-पञ्चक बनता है। वही देह को जानता है; यह उसका अतिवाहिक है।
> चिरकाल के प्रत्यय से कल्पना से मोटा होकर यह बालक की तरह आधिभौतिकता का बोध ग्रहण करता है।
> तब दिक्-काल-कलनाएँ उसके आधार पर स्थित हैं। अनुदित ही उदित होती हैं, जैसे वायु की स्पंद क्रिया।
> इस प्रकार यह भुवन-भ्रम व्यर्थ बढ़ा है। स्वप्न की अङ्गना के संग जैसा अनुभव होने पर भी असत् है।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
राम पूछते हैं कि चित्त क्या है, कैसे उत्पन्न होता है या नहीं, देखने पर यह सत्य क्यों नहीं लगता और कुछ और क्यों नहीं दिखता। वसिष्ठ कहते हैं कि प्रत्येक चित्त स्वतंत्र रूप से अपना जगत्-भ्रम रचता है, हर एक के लिए अलग-अलग। इससे पता चलता है कि वास्तविकता व्यक्तिगत है: ब्रह्मांड एक नहीं, बल्कि असंख्य व्यक्तिगत स्वप्न हैं जो अलग-अलग चित्तों से निकलते हैं। समय का माप अलग-अलग होने से जगत् क्षणिक या अनंत लगता है, अनुभव की सापेक्षता दर्शाता है।
ब्रह्मांडीय चक्र (सृष्टि-प्रलय) व्यक्ति के मरण-जन्म से मिलते हैं। मृत्यु की मूर्च्छा में प्रत्येक महाप्रलय अनुभव करता है जहाँ जगत् लुप्त हो जाता है। इस "रात्रि" के बाद चित्त स्वाभाविक स्वप्न-संकल्प से जगत् फिर रचता है, जैसे नींद में विचार सहज उठते हैं। मृत्यु के तुरंत बाद यह स्मृति-वासनाओं से होता है, बाहरी कारण नहीं।
राम कहते हैं कि मृत्यु के बाद सृष्टि स्मृति जैसी लगती है और चिरकाल बाद अनुभव होती है, विश्व कारणरहित नहीं। वसिष्ठ स्पष्ट करते हैं कि महाप्रलय में देवता भी विदेहमुक्त हो जाते हैं, स्मृति नहीं बचती। प्रबुद्ध आत्माएँ स्थायी मुक्ति पाती हैं। साधारण जीव अज्ञान से स्मृति रखते हैं, जिससे जन्म-मृत्यु का चक्र चलता है।
अतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीर मूल है: मृत्यु-मूर्च्छा में जीव अंदर "उन्मिषित" सा रहता है पर खुलता नहीं, अव्यक्त शक्ति जैसा। यह व्योम-प्रकृति, जड़-अजड़ है, स्मृति या अस्मृति से उदय होता है। बोध की ओर मुड़ने पर ख से तन्मात्रा, दिशा, काल, क्रिया, इन्द्रियाँ और स्थूल देह प्रकट करता है। चिरकाल की धारणा से कल्पना मोटी होकर बालक की तरह भौतिकता का भान देती है।
अंत में जगत्-भ्रम व्यर्थ बढ़ता है। स्वप्न में स्त्री-संग जैसा अनुभव होने पर भी असत्य है। शिक्षा अद्वैत की है: सब चित्त-जन्मित भ्रम है, अज्ञान से टिका और आत्मज्ञान से लुप्त। मुक्ति चित्त की प्रक्षेपण-शक्ति जानने, स्मृति-चक्र से ऊपर उठने और जन्म-मृत्यु से परे अटल आत्मा में विलीन होने से मिलती है।
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