योगवशिष्ट ३.४०.१६–२७
(ये श्लोक जीव की वास्तविक प्रकृति को बताते हैं कि वह चित्त की संकल्प-स्वप्न जैसी रचना है)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
यः पुनः स्वप्नसंकल्पपुरुषः प्रतिमाकृतिः ।
आकाशमात्रकाकारः स कथं केन रोध्यते ॥ १६ ॥
चित्तमात्रं शरीरं तु सर्वस्यैव हि सर्वतः।
विद्यते वेदनाच्चैतत्क्वचिदेतीव हृद्गतात् ॥ १७ ॥
यथाभिमतमेवास्य भवत्यस्तमयोदयम्।
आदिसर्गे स्वभावोत्थं पश्चाद्द्वैतैक्यकारणम् ॥ १८ ॥
चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च तृतीयकम् ।
विद्ध्येतत्त्रयमेकं त्वमविनाभावनावशात् ॥ १९ ॥
एतच्चित्तशरीरत्वं विद्धि सर्वगतोदयम्।
यथासंवेदनेच्छत्वाद्यथासंवेदनोदयम् ॥ २० ॥
वसति त्रसरेण्वन्तर्ध्रियते गगनोदरे ।
लीयतेऽङ्कुरकोशेषु रसीभवति पल्लवे ॥ २१ ॥
उल्लसत्यम्बुवीचित्वे प्रनृत्यति शिलोदरे ।
प्रवर्षत्यम्बुदो भूत्वा शिलीभूयावतिष्ठते ॥ २२ ॥
यथेच्छमम्बरे याति जठरेऽपि च भूभृताम् ।
अनन्तराकाशवपुर्धत्तेऽथ परमाणुताम् ॥ २३ ॥
देहस्यान्तर्बहिरपि दधद्वनतनूरुहम् ॥ २४ ॥
भवत्याकाशमाधत्ते कोटीः पद्मजसद्मनाम् ।
अनन्याः स्वात्मनोऽम्भोधिरावर्तरचना इव ॥ २५ ॥
अनुद्विग्नप्रबोधोऽसौ सर्गादौ चित्तदेहकः ।
आकाशत्मा महान्भूत्वा वेत्ति प्रकृततां ततः ॥ २६ ॥
असत्यमेव वारित्वं बुद्ध्योदेतीव तत्तथा ।
वन्ध्यापुत्रोऽयमस्तीति यथा स्वप्ने भ्रमो नरः ॥ २७ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.४०.१६–१९
> जो स्वप्न और संकल्प से बना हुआ व्यक्ति मात्र प्रतिमा है और केवल आकाश के रूप में है, उसे क्या कोई रोक सकता है?
> सबका शरीर चित्त ही है, हर जगह। यह अनुभव से पता चलता है कि यह हृदय से निकलता-सा लगता है।
> जैसा वह चाहता है वैसा ही उसका उदय और अस्त होता है। आदि सृष्टि में स्वभाव से उत्पन्न होता है, बाद में द्वैत और एकता का कारण बनता है।
> चित्ताकाश, चिदाकाश और तीसरा आकाश—इन्हें तीनों को एक जानो, क्योंकि वे अलग नहीं हो सकते।
३.४०.२०–२७
> इस चित्त-शरीर को सर्वव्यापी उदय वाला समझो। जैसी इच्छा और संवेदना वैसा ही उदय।
> यह त्रसरेणु के अंदर रहता है, गगन में छिपता है, अंकुर में लीन होता है, पत्ते में रस बन जाता है।
> जल की लहरों में उभरता है, पत्थर के पेट में नाचता है, बादल बनकर बरसता है, फिर पत्थर बनकर ठहर जाता है।
> इच्छा से आकाश में चलता है, पर्वतों के पेट में जाता है, अनंत आकाश रूप धारण करता है, फिर परमाणु बन जाता है।
> शरीर के अंदर-बाहर रहकर रोम-रोम धारण करता है।
> आकाश में ब्रह्मा के असंख्य पद्म सदृश लोक बनाता है, जैसे समुद्र में आवर्त न अलग होते हैं।
> सृष्टि के आरंभ में यह चित्त-देह बिना उद्वेग के जागता है, महान आकाश बनता है और फिर अपनी प्रकृति को जानता है।
> जैसे बुद्धि से जल का भ्रम उदित होता है वैसा ही, या स्वप्न में वंध्या-पुत्र का भ्रम—यह सब वैसा ही है।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
ये श्लोक जीव की वास्तविक प्रकृति को बताते हैं कि वह चित्त की संकल्प-स्वप्न जैसी रचना है। यह कोई ठोस स्वतंत्र वस्तु नहीं, बल्कि प्रतिबिंब मात्र है जो आकाश रूप में दिखता है। इसे कोई रोक नहीं सकता क्योंकि इसमें कोई वास्तविक पदार्थ नहीं—यह विचार और धारणा पर टिका है।
चित्त ही सबका शरीर है, सर्वत्र व्याप्त। यह बाहरी नहीं, हृदय की संवेदना से निकलता-सा लगता है। जो चित्त चाहता या संकल्पित करता है वही उसका जन्म-मृत्यु, द्वैत-एकता बन जाता है। सृष्टि बाहरी नहीं, चित्त की अपनी प्रकृति से शुरू होती है।
वसिष्ठ ऋषि तीन आकाशों को एक बताते हैं—चित्ताकाश (विचारों का), चिदाकाश (चेतना का) और भौतिक आकाश। ये अलग नहीं, एक ही हैं क्योंकि परस्पर अविभाज्य हैं। यह अद्वैत सिखाता है—जो बहु दिखता है वह एक ही मूल है।
चित्त-शरीर सर्वव्यापी है और इच्छा अनुसार कोई भी रूप लेता है—सूक्ष्म कण से विशाल आकाश तक, जल की लहर से पत्थर तक, बादल से ठोस चट्टान तक। यह स्वतंत्र घूमता है, परमाणु बनता है या अनंत फैलता है। इससे चित्त की असीम शक्ति और विश्व की मायावी प्रकृति पता चलती है।
अंत में, चित्त की रचनाएँ भ्रम मात्र हैं—जैसे मृगतृष्णा में जल या स्वप्न में वंध्या-पुत्र। सृष्टि के प्रारंभ में चित्त बिना व्याकुलता जागता है, महान आकाश बनता है और अपनी सच्ची प्रकृति जानता है। शिक्षा है कि विश्व और अहंकार चेतना के स्वप्न जैसे भ्रम हैं, और इस भ्रम को जानने से मुक्ति मिलती है।
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