योगवशिष्ट ३.३७.२१–५९
(ये श्लोक ऋषि वशिष्ठ द्वारा वर्णित एक उग्र और अराजक युद्ध-दृश्य का जीवंत, काव्यात्मक वर्णन करते हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भुशुण्डीमण्डलोद्द्योतश्यामार्कोत्पातभीरुषु ।
आभीरेष्वरयः पेतुर्गोगणा हरितेष्विव ॥ २१ ॥
कान्तकाञ्चनकान्तासीत्ताम्रसंग्रामवाहिनी ।
भुक्ता गौडभटेनाङ्ग नखकेशनिकर्षणैः ॥ २२ ॥
रणे नगनयासंख्यकवच्चक्रनिकृन्तनैः।
तङ्गणाः कणशः कीर्णाः कङ्कगृध्रेषुभासकैः ॥ २३ ॥
लगुडालोडनोड्डीनं गौडं गुडुगुडारवम्।
श्रुत्वा गान्धारगावोऽग्रे दुद्रुवुर्द्रविडा इव ॥ २४ ॥
आकाशगार्णवप्रख्यो वहच्छककदम्बकः ।
अकरोत्पारसीकानां घननैशतमोभ्रमम् ॥ २५ ॥
मन्दराहननोड्डीनस्वच्छक्षीरार्णवोदरे ।
वनानीवायुधान्यासञ्छत्रुप्रालेयसानुनि ॥ २६ ॥
यदम्बुदैरिवोड्डीनं शस्त्रवृन्दैर्नभोङ्गणे ।
तद्दृष्टं वीचिवलनैर्लोलैः प्लुतमिवार्णवे ॥ २७ ॥
शतचन्द्रं सितच्छत्रैः शरैः शलभनिर्भरम्।
शक्तिभिः किल नीरन्ध्रं दृष्टमाकाशकाननम् ॥ २८ ॥
वीरासवसमाक्रन्दकारिणः केकयैः कृताः।
कङ्कैः कङ्ककुलाक्रान्तव्योमोद्धूलितमस्तकाः ॥ २९ ॥
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ननर्दुर्नन्दनोद्यानसुन्दर्यो मत्तयौवनाः।
वनोपवनदेशेषु मेरोर्वीरवराश्रिताः ॥ ५०॥
तावत्तारारवं रेजे सैन्यकाननमुत्तमम् ।
यावन्न परपक्षेण प्राप्तं कल्पानलार्चिषा ॥ ५१ ॥
छिन्नाः पिशाचसंयुक्ता भूतापहृतहेतयः।
पातयित्वा ययुः कर्णान्दशार्णास्तर्णका इव ॥ ५२ ॥
जहुर्भग्नेश्वराः कान्ति तां जिगीषवनौजसा ।
कासयः कमलानीव शुष्कस्रोतस्विनौजसा ॥ ५३ ॥
तुषाका मेसलैः कीर्णाः शरशक्त्यसिमुद्गरैः ।
विद्रुता नरकैः क्षिप्ताः कटकच्छलना अपि ॥ ५४ ॥
कौन्तक्षेत्राः प्रस्थवासैः स्थित्वा योधिभिरावृताः ।
गुणा इव खलाक्रान्ता गता व्यक्तमशक्तताम् ॥ ५५ ॥
द्विपयो बाहुधानानां क्षणेनादाय मस्तकम् ।
भल्लैः पलाय्याशु गता विलूनकमला इव ॥ ५६ ॥
मिथः सारस्वता नीत्वा आदिनान्तं कृताजयः ।
पण्डिता इव वादेषु नोद्विग्ना न पराजिताः ॥ ५७ ॥
खर्वगाः खदिताः क्षुद्रा यातुधानैः परावृताः ।
तेजः परममाजग्मुः शान्ताग्नय इवेन्धनैः ॥ ५८ ॥
कियदाख्यायत एतज्जिह्वानिचयैः किलालमाकुलितः ।
वासुकिरपि वर्णयितुं न समर्थो रणवरं राम ॥ ५९ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.३७.२१–२९
> भुशुण्डी के मंडल से निकलते काले सूर्य जैसे उत्पात से डरे अभीरों में शत्रु हरे खेतों में गायों के झुंड की तरह गिर पड़े।
> सुंदर स्वर्णिम चमक वाली और तांबे के हथियारों वाली सेना को गौड़ योद्धाओं ने, हे प्रिय, नाखून और बाल खींचकर भोग लिया।
> युद्ध में तंगण कण-कण बिखर गए, पर्वत जैसे चक्रों से कटकर और बगुले, गिद्ध तथा चमकते बाणों से।
> गौड़ों को लाठियों से पीटे जाने और उड़ते हुए गुड़गुड़ाहट सुनकर गंधार के सैनिक आगे दौड़कर भागे जैसे द्रविड़।
> आकाश सागर जैसे बहते शक दल ने पारसीकों के लिए घने रात के अंधेरे का भ्रम पैदा किया।
> मंदर के प्रहार से उड़ते स्वच्छ दूधिया सागर जैसे, शत्रुओं के हिमाच्छादित शिखरों पर हथियारों के वन लगे।
> जब बादलों जैसे शस्त्र आकाश में उड़े तो आकाश क्षेत्र लहरों से भरे समुद्र सा डूबा हुआ दिखा।
> सफेद छत्रों से सौ चंद्रमा, टिड्डियों जैसे बाणों से भरा और शक्तियों से बिना छेद का आकाश वन दिखा।
> केकय वीर रस पीने जैसे चीखते हुए, कंक और गिद्धों से सिर धूल-धूसरित और ढके हुए।
३.३७.३०–४९
> और अनेक राजाओं और देशों की सेनाएं और उनमें भीषण युद्ध की आगे कल्पना करते हैं महर्षि वशिष्ठ।
३.३७.५०–५९
> नंदनवन की युवा सुंदरियां मत्त यौवन से भरी, मेरु के वीरों के आश्रित वनों में आनंद से गूंजीं।
> तब उत्तम सेना वन तारों जैसे शब्दों से चमका जब तक शत्रु पक्ष कल्पाग्नि की ज्वाला से नहीं पहुंचा।
> कटे हुए, भूतों से जुड़े, हथियार भूतों द्वारा छीने, दशार्ण कान कटे हिरनों जैसे गिरे और चले गए।
> टूटे स्वामी अपनी कामना छोड़कर बल से चले जैसे सूखी नदियों में कमल अपनी शोभा छोड़ दें।
> तुषक मेसलों से बाण, शक्ति, तलवार, मुद्गर से बिखरे; भागे, नरक में फेंके, छलावे वाले भी।
> कौंत क्षेत्र प्रस्थवासियों से घिरे योद्धाओं से, दुष्टों से घिरी गुणों की तरह स्पष्ट अशक्ति को गए।
> बाहुधारी हाथियों ने क्षण में सिर ले भल्ल से तेज भागे जैसे कटे कमल।
> सरस्वत आपस में लेकर आदि से अंत तक विजयी, वाद-विवाद में पंडितों जैसे न उद्विग्न न पराजित।
> छोटे-मोटे खर्वग राक्षसों से खाए और घिरे, ईंधन से शांत अग्नि जैसे परम तेज को प्राप्त हुए।
> इस युद्ध का कितना वर्णन करें? जिह्वा के ढेर से थककर वासुकि भी राम, इस श्रेष्ठ रण का वर्णन करने में असमर्थ है।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
ये श्लोक संसारिक युद्धों और संघर्षों की भयानक तथा मायावी प्रकृति को दर्शाते हैं, जिसमें वीरता, शोर और विनाश से भरे बड़े युद्ध भी अंततः क्षणभंगुर और स्वप्न जैसे होते हैं। वसिष्ठ जी अत्यंत काव्यात्मक चित्रण से सेनाओं के टकराव, शरीरों के गिरने, हथियारों के उड़ने और सैनिकों के भागने का वर्णन करते हैं ताकि शारीरिक शक्ति और विजय की क्षणिकता स्पष्ट हो। यह भयंकर चित्रण युद्ध की महिमा के लिए नहीं, बल्कि उसकी व्यर्थता और दुख देने वाली प्रकृति दिखाने के लिए है, जो साधक को ऐसे दृश्यों से परे देखने की प्रेरणा देता है।
शिक्षा अद्वैत दर्शन पर जोर देती है: सभी घटनाएँ, चाहे जनजातियों, राष्ट्रों या शक्तियों के बीच युद्ध हों, चेतना में प्रकट होने वाले भास मात्र हैं जिनकी स्वतंत्र सत्ता नहीं। विभिन्न समूह (अभीर, गौड़, तंगण, शक, पारसीक आदि) अज्ञान से बनी अहंकार की खंडितता के प्रतीक हैं। उनके उग्र संघर्ष और अंतिम पराजय यह दिखाते हैं कि अहंकार की कामनाएँ आत्म-विनाश की ओर ले जाती हैं। वसिष्ठ राम को याद दिलाते हैं कि ऐसे ब्रह्मांडीय या ऐतिहासिक युद्ध मन के प्रक्षेपण हैं, जैसे पूरा विश्व ब्रह्म का स्वप्न है, जो शरीर, विजय या पराजय से तादात्म्य छोड़ने की शिक्षा देते हैं।
गहन शिक्षा परिवर्तन और क्षय की अनिवार्यता में है, जो बिखरे टुकड़ों, भागती सेनाओं, टूटे कमलों और बुझी आग जैसे रूपकों से दिखाई गई है। ये चित्र बताते हैं कि कोई शक्ति, सौंदर्य या यश स्थायी नहीं; सब विलय के अधीन है। यह समझ वैराग्य पैदा करती है, क्योंकि सांसारिक उपलब्धियों या भय से चिपकना बंधन को बढ़ाता है। युद्ध का कोलाहल अनियंत्रित इच्छाओं और आसक्तियों के आंतरिक अशांति का दर्पण है, जो आत्म-विचार से उन्हें पार करने की प्रेरणा देता है।
श्लोक यह भी सूक्ष्म रूप से संकेत करते हैं कि परम सत्य या सर्वोच्च यथार्थ का वर्णन शब्दों से असंभव है, जैसा अंतिम श्लोक में वासुकि भी युद्ध की महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर पाता। यह भाषा और बुद्धि की सीमाओं को दर्शाता है और प्रत्यक्ष अनुभव से ज्ञान की ओर निर्देश करता है, मौन, ध्यान और आंतरिक शांति की ओर।
कुल मिलाकर, ये श्लोक सिखाते हैं कि क्रिया, संघर्ष और बहुलता वाला जगत माया है, और सच्ची मुक्ति इस आत्म-साक्षी चेतना को पहचानने में है जो इन घटनाओं से अछूती रहती है। सबसे तीव्र अनुभवों की क्षणभंगुर और स्वप्न जैसी प्रकृति पर चिंतन से व्यक्ति जन्म-मृत्यु और सभी द्वंद्वों से मुक्त होकर शांत, शाश्वत यथार्थ में जागृत होता है।
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