Wednesday, February 11, 2026

अध्याय ३.३७, श्लोक १–२०

योगवशिष्ट ३.३७.१–२०
(ये छंद रानी लीला की कहानी में एक विशाल मायावी युद्ध का वर्णन करते हैं, ताकि जगत की स्वप्न-सदृश प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझाया जा सके)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
रणे रभसनिर्लूननरवारणदारुणे ।
अहंपूर्वमहंपूर्वमिति वृन्दानुपातिनि ॥ १॥
एते चान्ये च बहवस्तत्र भस्मत्वमागताः।
प्रविशन्तः प्रयत्नेन शलभा इव पावके ॥ २ ॥
अत्रान्ये मध्यदेशीया जना नोदाहृता मया ।
तानिमाञ्छृणु वक्ष्यामि पक्षाँल्लीलामहीभृतः ॥ ३ ॥
तद्देहिकाः शूरसेना गुडा अश्वघनायकाः।
उत्तमज्योतिभद्राणि मदमध्यमिकादयः ॥ ४ ॥
सालूकाकोद्यमालास्या दौज्ञेयाः पिप्पलायनाः ।
माण्डव्याः पाण्डुनगराः सौग्रीवाद्या गुरुग्रहाः ॥ ५ ॥
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दशार्णाः पाशनिर्मुक्तश्रृङ्खला जालभीरवः ।
निलीना रक्तजम्बाले वैतसास्तिमयो यथा ॥ १८ ॥
गुर्जरानीकनाशेन गुर्जरीकेशलुञ्चनम् ।
विहितं तङ्गणोत्तुङ्गनासिशङ्कुशतै रणे ॥ १९ ॥
सिषिचुः शस्त्रकर्णौघाद्विन्दुभ्यो निगडा गुहान् ।
शरधारावनानीव वीरहेतिप्रभाम्बुदाः ॥ २० ॥

ऋषि वसिष्ठ बोले: 
३.३७.१–५
> उस भयंकर युद्ध में जहाँ बहुत से मनुष्य और हाथी तेज़ी से काट दिए गए, भीड़ आगे बढ़ी और चिल्लाई "मैं पहले! मैं पहले!"
> वहाँ बहुत से अन्य योद्धा इनके साथ राख हो गए। वे प्रयत्न से युद्ध में घुसे, जैसे पतंगे आग में कूदते हैं।
> अब तक मैंने मध्य देश के लोगों का वर्णन नहीं किया। सुनो, अब बताता हूँ लीला की पृथ्वी के पक्ष की सेनाओं के बारे में।
> उनकी शूर सेना में शूरसेना, गुडा, अश्वघन के नायक, उत्तमज्योति, भद्र, मध्यमिका आदि थे।
> साथ ही सालूक, कोद्यमाला, दौज्ञेय, पिप्पलायन, माण्डव्य, पाण्डुनगर, सौग्रीव आदि महान ग्रहों जैसी सेनाएँ थीं।

३.३७.६–१७
> सेनाओं और योद्धाओं की सूची विभिन्न क्षेत्रों से जारी है, जो युद्ध में प्रवेश करती हैं।

३.३७.१८–२०
> दशार्ण योद्धा, जो बेड़ियों और जंजीरों से मुक्त थे, जाल से डरने वाले, लाल कीचड़ में छिपे हुए थे जैसे बाँस पानी में डूबे हों।
> गुर्जर सेना के नाश से गुर्जरी स्त्रियों के केश युद्ध में तंगना के सैकड़ों ऊँचे तलवारों और भालों से खींचे गए।
> हथियारों और बाणों की वर्षा से जंजीरें और बेड़ियाँ गुफाओं में गिर रही थीं, जैसे वीर हथियारों के बादल जंगल में धाराएँ बरसा रहे हों।

शिक्षाओं का विस्तृत सार:
ये श्लोक योग वासिष्ठ में ऋषि वसिष्ठ द्वारा रानी लीला की कथा में वर्णित भ्रमपूर्ण युद्ध का हिस्सा हैं। जहाँ सेनाएँ टकराती हैं, योद्धा "मैं पहले!" चिल्लाते हुए आगे बढ़ते हैं और मृत्यु की ओर दौड़ते हैं, यह दर्शाता है कि अहंकार और इच्छाएँ कैसे प्राणियों को विनाश की ओर ले जाती हैं। "मैं पहले!" की पुकार संसार में अलग-अलग आत्मा की भ्रांति और प्रतिस्पर्धा को दिखाती है, जो संघर्ष और दुख का कारण बनती है।

विभिन्न क्षेत्रों से सेनाओं की विस्तृत सूची—जो विविध जातियों, कबीलों और बलों को दर्शाती है—प्रकट जगत की विशाल बहुलता को दिखाती है। सभी योद्धा, चाहे कितने भी बहादुर, मजबूत या अधिक संख्या में हों, अंत में राख हो जाते हैं या युद्ध में गिर जाते हैं। इससे शिक्षा मिलती है कि जीवन के दिखावे कितने भी भव्य या विविध क्यों न हों, सब क्षणभंगुर और नाशवान हैं। जगत चेतना का प्रक्षेपण है और उसके घटनाएँ, युद्ध सहित, स्वप्न जैसी अवास्तविक हैं।

योद्धाओं को पतंगों की तरह आग में कूदते हुए दिखाना अज्ञान (अविद्या) और आसक्ति को दर्शाता है जो प्राणियों को विनाश की ओर खींचती है। "आग" समय, मृत्यु या भ्रम की भस्म करने वाली शक्ति है। वसिष्ठ इससे बताते हैं कि आत्मज्ञान के बिना जीव बार-बार व्यर्थ संघर्ष में पड़ते हैं, जो केवल विनाश लाते हैं।

कीचड़ में छिपे योद्धा, सेनाओं का नाश और केश खींचने जैसी हिंसा का वर्णन संसारिक संघर्षों की अराजकता और भयावहता दिखाता है। ये जीवंत चित्र जगत की अवास्तविकता को स्पष्ट करते हैं—ऐसा तीव्र दुख और हिंसा केवल अज्ञान के स्वप्न में ही उत्पन्न होती है। शिक्षा है कि बाहरी युद्धों से हटकर आंतरिक सत्य की ओर मुड़ें, क्योंकि असली विजय दूसरों पर नहीं, अलगाव की भ्रांति से ऊपर उठने में है।

कुल मिलाकर, ये श्लोक योग वासिष्ठ की मुख्य अद्वैत शिक्षा को मजबूत करते हैं: पूरा ब्रह्मांड, उसके युद्ध और नायक सहित, मानसिक रचना (कल्पना) है जिसमें कोई अंतिम सत्य नहीं। ऐसी घटनाओं की क्षणभंगुरता और स्वप्न-सदृश प्रकृति पर चिंतन से वैराग्य और विवेक उत्पन्न होता है। इससे साधक अलग-अलगता की भ्रांति से मुक्त होकर आत्मा को अपरिवर्तनीय साक्षी के रूप में पहचानता है, जो जन्म-मृत्यु के चक्र और भ्रमपूर्ण संघर्ष से मुक्ति (मोक्ष) दिलाती है।

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