योगवशिष्ट ३.३५.१–१४
(ये छंद युद्ध के भयानक और विनाशकारी स्वरूप को दिखाने के लिए शक्तिशाली रूपकों का उपयोग करते हुए, एक विशाल, अराजक युद्धक्षेत्र को उग्र समुद्र के रूप में जीवंत रूप से वर्णित करते हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ प्रोड्डयनोद्युक्ततुरङ्गमतरङ्गकः ।
उत्ताण्डव इवोन्मत्तो बभूव स रणार्णवः ॥ १ ॥
छत्रडिण्डीरविश्रान्तसितेषुशफरोत्करः ।
अश्वसैन्योल्लसल्लोलकल्लोलाकुलकोटरः ॥ २ ॥
नानायुधनदीनीतसैन्यावर्तविवृत्तिमान् ।
मत्तहस्तिघटापीठचलाचलकुलाचलः ॥ ३ ॥
कचच्चक्रशतावर्तवृत्तिभ्रान्तशिरस्तृणः ।
धूलीजलधरापीतभ्रमत्खड्गप्रभाजलः ॥ ४ ॥
मकरव्यूहविस्तारभग्नाभग्नभटौघनौ ।
महागुडुगुडावर्तप्रतिश्रुद्धनकन्दरः ॥ ५ ॥
मीनव्यूहविनिष्क्रान्तशरबीजौघसर्षपः ।
हेतिवीचीवरालूनपताकावीचिमण्डलः ॥ ६ ॥
शस्त्रवारिकृताम्भोदसदृशावर्तकुण्डलः ।
संरम्भघनसंचारसेनातिमितिमिङ्गिलः ॥ ७ ॥
कृष्णायसपरीधानवलत्सेनाम्बुभीषणः ।
कबन्धावर्तलेखान्तर्बद्धसैन्यादिभूषणः ॥ ८ ॥
शरसीकरनीहारसान्धकारककुब्गणः ।
निर्घोषाशोषिताशेषशब्दैकघनघुंघुमः ॥ ९ ॥
पतनोत्पतनव्यग्रशिरःशकलसीकरः ।
आवर्तचक्रव्यूहेषु प्रभ्रमद्भटकाष्ठकः ॥ १० ॥
कष्टटाङ्कारकोदण्डकुण्डलोन्मथनोद्भटः ।
अशङ्कमेव पातालादिवोद्यत्सैनिकोर्मिमान् ॥ ११॥
गमागमपरानन्तपताकाच्छत्रफेनिलः ।
वहद्रक्तनदीरंहःप्रोह्यमानरथद्रुमः ॥ १२॥
गजप्रतिमसंपन्नमहारुधिरबुद्बुदः ।
सैन्यप्रवाहविचलद्धयहस्तिजलेचरः ॥ १३ ॥
ससंग्रामोऽम्बरग्राम इवाश्चर्यकरो नृणाम् ।
अभूत्प्रलयभूकम्पकम्पिताचलचञ्चलः ॥ १४ ॥
महर्षि वशिष्ठ बोले:
३.३५.१–७
> तब युद्ध का समुद्र उन्मत्त हाथी की तरह नाचते हुए घोड़ों की लहरों से उत्तेजित हो उठा।
> यह सफेद छत्रों और चमकते बाणों पर विश्राम करता था जैसे मछलियाँ, घोड़ों की सेना खोखलों में लहरें उठाती थी।
> विभिन्न हथियारों की नदियों से लाई गई सेनाओं के भँवर लिए हुए, मतवाले हाथियों के झुंड पहाड़ों को हिलाते हुए।
> सैकड़ों घूमते चक्रों के घुमाव से सिर के बाल उड़े हुए, धूल के बादल घूमते तलवारों की रोशनी पीते हुए।
> मगरमच्छ जैसे व्यूह में टूटे-न टूटे योद्धाओं के झुंड, बड़े गड़गड़ाते भँवर गुफाओं में गूँजते हुए।
> मछली व्यूह से निकले बाणों के बीजों की बाढ़, हथियारों की लहरों से कटे ध्वजों के वृत्त बनाते हुए।
> हथियारों के पानी से बने बादलों जैसे घूमते कुंडल, घनी सेनाओं के घूमने से विशाल जल-राक्षस जैसे।
३.३५.८–१४
> काले लोहे के वस्त्र वाली सेना से भयानक, कबन्धों के भँवरों में सजे हुए।
> बाणों की बूँदें कोहरे जैसी दिशाओं को अंधेरा करती हुईं, गर्जना से सारे शब्द एक घने घुँघुर में बदल गए।
> गिरते-उठते सिरों से बूँदें बिखेरता, घूमते भँवरों में लकड़ी के टुकड़ों जैसे योद्धा।
> धनुषों की टंकार से गरजता, निर्भय होकर पाताल से उठती सेना की लहरों जैसा।
> अनंत ध्वज और छत्र फेन जैसे, खून की नदियाँ बहाते और रथों के पेड़ उखाड़ते हुए।
> हाथियों जैसे बड़े खून के बुलबुले, सेना के प्रवाह में दो दाँत वाले हाथी तैरते हुए।
> यह संग्राम मनुष्यों के लिए आश्चर्यजनक हो गया, जैसे आकाश में गाँव, प्रलय के भूकंप से पहाड़ काँपते हुए।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक युद्ध के मैदान को एक उफनते समुद्र के रूप में चित्रित करते हैं, जहाँ सेनाएँ, हथियार, घोड़े, हाथी और रक्त सब एक भयंकर तूफान में मिल जाते हैं। वसिष्ठ जी इस वर्णन से युद्ध की भयावहता और विनाशकारी शक्ति को दर्शाते हैं, जो मनुष्य की छोटी-छोटी लड़ाइयों को ब्रह्मांडीय प्रलय जैसा बना देता है। यह दिखाता है कि हिंसा सब कुछ निगल लेती है और व्यक्ति को उसकी लहरों में बहा देती है।
इस वर्णन का मुख्य संदेश माया और क्षणभंगुरता का है। योग वासिष्ठ में संसार और उसके घटनाएँ—यहाँ तक कि भव्य युद्ध—चेतना में कल्पित स्वप्न या मृगमरीचिका मात्र हैं। युद्ध को समुद्र या प्रलय से तुलना करके वसिष्ठ जी सिखाते हैं कि ये दृश्य कितने भी भयानक क्यों न लगें, वे क्षणिक हैं और आत्मा से परे कोई सत्ता नहीं रखते।
एक महत्वपूर्ण शिक्षा वैराग्य और दर्शक भाव की है। योद्धा या साधक को ऐसे उथल-पुथल को देखते हुए भी उसमें खोना नहीं चाहिए, बल्कि इसे असत्य या स्वप्न समझना चाहिए। राम जी को ये वचन इसलिए सुनाए जा रहे हैं कि वे इंद्रियों के जाल से ऊपर उठकर आंतरिक शांति प्राप्त करें। भयावह विवरण आकर्षण और भय से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
ये श्लोक माया की शक्ति को भी उजागर करते हैं। युद्ध का वैभव और भय इंद्रियों को मोहित कर देते हैं, पर वे खोखले रूप हैं जिनमें कोई स्थायी सत्य नहीं। वसिष्ठ जी इस अतिशयोक्ति से विवेक जगाते हैं—जो शक्तिशाली और शाश्वत लगता है (जैसे युद्ध का समुद्र), वह जाँच पर क्षीण हो जाता है और सबके नीचे ब्रह्म ही रह जाता है।
अंत में, यह मार्गदर्शन दुख के बीच आध्यात्मिक जिज्ञासा जगाता है। युद्ध को इतने तीव्र रूप से चित्रित करके वसिष्ठ जी बताते हैं कि बाहरी संघर्षों से बचना नहीं, बल्कि उनकी स्वप्नवत् प्रकृति को जानना मुक्ति का मार्ग है। सच्चा ज्ञान द्वंद्वों से परे शांति देता है, जहाँ जन्म-मृत्यु और युद्ध का चक्र समाप्त हो जाता है।
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