योगवशिष्ट ३.३४.४०–५३
(ये छंद एक महान युद्ध के उग्र और भयावह दृश्य का जीवंत वर्णन करते हैं, इसे मृत्यु और विनाश के प्रकटीकरण के रूप में चित्रित करते हुए)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एषा प्रसृतदोर्दण्डभटखड्गच्छटात्कृतिः।
कठिनात्कंकटाज्जाता मृत्योरेवोग्रहुंकृतिः ॥ ४० ॥
हेतिकल्पानिलक्षुण्णा दन्तनिर्झरवारयः।
जनताक्षयकालेऽस्मिन्भग्ना नागा नगा इव ॥ ४१ ॥
सचक्रनाथसूताश्वं व्यूढं रक्तमहाहृदे ।
हाहाभिभूतगतिकं चेष्टते रथपत्त्नम् ॥ ४२ ॥
करकंकटकुट्यङ्कखड्गसंघट्टटांकृतैः ।
कालरात्र्या प्रनृत्यन्त्या रणवीणेव वाद्यते ॥ ४३ ॥
नरेभखरवाजिभ्यो ये च्युता रक्तनिर्झराः ।
पश्य तद्बिन्दुसिक्तेन वायुनारुणिता दिशः ॥ ४४ ॥
शस्त्रांशुजलदे व्योम्नि कालीचिकुरमेचके ।
शरकोरकभारस्रङ्मेघे विद्युदिवोदिता ॥ ४५ ॥
अनन्तरक्तसंसक्तसन्नावनितलायुधैः ।
भुवनं भात्यभिज्वालमग्निलोक इवाकुलम् ॥ ४६ ॥
भुशुण्डीशक्तिशूलासिमुसलप्रासवृष्टयः ।
अन्योन्यच्छेदभेदाभ्यां करप्रकरतोऽपतन् ॥ ४७ ॥
अक्षोभैकप्रहरणाद्यातुधान्योऽन्यचेष्टितम् ।
संरम्भावेक्षणप्रज्ञं रणं स्वप्नमिव स्थितम् ॥ ४८ ॥
अनन्यशब्दाविरतहताहतिरणज्झणैः ।
गायतीव क्षतक्षोभमुदितो रणभैरवः ॥ ४९ ॥
अन्योन्यरणहेत्युग्रचूर्णपूर्णो रणार्णवः।
वालुकामय एवाभूच्छिन्नच्छत्रतरङ्गकः ॥ ५० ॥
सरभसरसवद्विसारितूर्यप्रतिरवपूरितलोकपाललोकः ।
रणगिरिरयमुग्रपक्षदक्षप्रतिसृतिवृत्त इवाम्बरे युगान्ते ॥ ५१ ॥
हा हा धिक्प्रविकटकङ्कटाननोद्यत्प्रोड्डीनप्रकटतडिच्छटाप्रतप्ताः ।
क्रेङ्कारस्फुरितगुणेरिता रणन्तो नाराचाः शिखरिशिलागणं वहन्ति ॥ ५२ ॥
छिन्नेच्छाच्छमिति न यावदङ्गभङ्गं कुर्वन्तो ज्वलदनलोज्ज्वलाः पृषत्काः ।
तावद्द्राग्द्रुतमित एहि मित्र यामो यामोऽयं प्रवहति वासरश्चतुर्थः ॥ ५३॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.३४.४०–४७
> योद्धाओं के फैले हुए मजबूत बाहुओं से तलवारों की टकराहट की यह ध्वनि, कठोर कवच से निकली हुई, मृत्यु की ही भयंकर गरज के समान है।
> हथियारों से कुचले हाथियों के दाँतों से खून की धाराएँ झरने-सी बहती हैं; इस जन-संहार के समय में हाथी पर्वतों की तरह टूटकर गिरे हुए हैं।
> पहियों, सारथी, घोड़ों और सैनिकों से भरे रथ खून के महासागर में डूबते-उतराते हैं, "हा हा" की करुण पुकारों से व्याकुल होकर।
> कवच, ढाल और तलवारों की टकराहट से कालरात्रि के नृत्य जैसी वीणा की ध्वनि बज रही है।
> मनुष्यों, गधों और घोड़ों से गिरते खून की बूँदों से छिड़का हुआ वायु दिशाओं को लाल कर रहा है, देखो।
> आकाश में तीरों के बादल में, काली के काले बालों-से और बिजली की चमक के साथ, फूलों की माला-सा बोझ लिये तीर चमक रहे हैं।
> अनंत खून, भीड़भाड़ वाले हथियारों और जलती आग से संसार अग्नि-लोक की तरह अत्यंत व्याकुल और चमकता हुआ दिखता है।
> भुशुण्डी, शक्ति, शूल, तलवार, मुसल और प्रास की वर्षा हाथों से गिरती है, एक-दूसरे को काटते और चीरते हुए।
३.३४.४८–५३
> बिना क्षोभ के प्रहार करने वाले राक्षस एक-दूसरे की चेष्टा क्रोधपूर्ण नजरों से देखते हैं; यह युद्ध स्वप्न की तरह स्थित है।
> हथियारों के निरंतर टकराने की ध्वनियों से रण-भैरव आनंदित होकर घायलों के बीच गाता-सा प्रतीत होता है।
> परस्पर हथियारों के उग्र घिसने से भरा युद्ध का समुद्र टूटे छत्र-तरंगों वाला बालू-मय मैदान-सा बन गया है।
> यह युद्ध-पर्वत उग्र पंख फैलाकर गूँज रहा है, नगाड़ों और ढोलों की ध्वनि से लोकपालों के लोक भरकर, युगांत में आकाश में व्याप्त है।
> हा हा धिक्कार है! काले कवच के बादलों से निकली बिजली-सी चमकती तीर, कंकट मुख वाले योद्धाओं से छूटकर, पर्वत-शिलाओं के समूह को ढोते हुए गूँज रहे हैं।
> जलते तीर "छिन्न-इच्छ-च्छ" की ध्वनि करते हुए अंग-भंग करने से पहले ही जलते रहते हैं; तब तक, मित्र, जल्दी आओ—चलो, यह चौथा दिन तेजी से बीत रहा है।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक योग वासिष्ठ में ऋषि वसिष्ठ द्वारा राम को युद्ध के भयावह दृश्य का वर्णन हैं, जो संसार की माया और क्षणभंगुरता को दर्शाते हैं। युद्ध का यह भयंकर चित्र—खून, हथियार, चीखें और विनाश—मृत्यु के नृत्य का प्रतीक है। मुख्य शिक्षा यह है कि संसार स्वप्नवत् और क्षणिक है; जो कुछ दिखता है, वह चेतना में उदित होने वाली माया मात्र है। यह दृश्य राम को वैराग्य उत्पन्न करने के लिए है, ताकि वे शरीर और जगत से मोह छोड़कर आत्मा की खोज करें।
मृत्यु और काल को इन श्लोकों में जीवंत रूप दिया गया है। मृत्यु दूर नहीं, बल्कि हर तलवार की टकराहट, हर खून की बूँद में मौजूद है। कालरात्रि का नृत्य, भयंकर गरज और जलते तीर दर्शाते हैं कि काल सब कुछ निगल लेता है। यह सिखाता है कि शरीर, विजय या सांसारिक गौरव से लगाव दुख का कारण है; सच्चा सुख अनंत आत्मा में है, जो विनाश से परे है।
श्लोकों में अद्वैत और स्वप्न-जगत की शिक्षा प्रमुख है। युद्ध को स्वप्न, जलते नरक या बालू के मैदान से तुलना की गई है—सब कुछ देखने पर मिट जाता है। योद्धा क्रोध से लड़ते हैं, पर उनकी चेष्टाएँ स्वप्न की तरह हैं; हथियारों की ध्वनि "गाती" है, जो संघर्ष की व्यर्थता दिखाती है। यह समझाता है कि सुख-दुख, युद्ध-शांति सब मन की कल्पना हैं, जो चेतना में उदित होकर लीन हो जाते हैं।
इस भयानक चित्रण से वैराग्य की शिक्षा दी गई है। खून से लाल दिशाएँ, टूटे हाथी, बीतते दिन—सब संसार की नश्वरता दिखाते हैं। कोई विजय स्थायी नहीं; सब नष्ट हो जाता है। यह मन को झकझोरकर सांसारिक मोह से मुक्त करता है और आत्म-विचार की ओर ले जाता है, जहाँ साक्षी-भाव से सब कुछ देखा जाता है।
अंत में, ये श्लोक अनित्यता और आत्म-साक्षात्कार की शिक्षा देते हैं। युद्ध का यह दृश्य राम को माया से जगाने के लिए है। पूरा जगत, युद्ध सहित, चेतना की अभिव्यक्ति मात्र है—एक क्षणिक स्वप्न। सच्ची शांति आत्म-ज्ञान में है, जहाँ शरीर या जगत से तादात्म्य समाप्त हो जाता है।
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