Tuesday, January 27, 2026

अध्याय ३.३०, श्लोक २४–३४

योगवशिष्ट ३.३०.२४–३४
(अस्तित्व में अनगिनत ब्रह्मांड सम्मिलित हैं, जो अनंत आकाश में अनजाने ही नृत्य कर रहे हैं—रहस्यमय, स्वस्फूर्त और मुक्त)

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आचाराद्वेदशास्त्राणामाद्य एवान्यथोदिते ।
आरम्भोऽपि तथान्येषामनित्यः संस्थितः क्रमः ॥ २४ ॥
केचिद्ब्रह्मादिपुरुषाः केचिद्विष्ण्वादिसर्गपाः ।
केचिच्चान्यप्रजानाथाः केचिन्निर्नाथजन्तवः ॥ २५ ॥
केचिद्विचित्रसर्गेशाः केचित्तिर्यङ्मयान्तराः ।
केचिदेकार्णवापूर्णा इतरे जनिवर्जिताः ॥ २६ ॥
केचिच्छिलाङ्गनिष्पिण्डाः केचित्कृमिमयान्तराः ।
केचिद्देवमया एव केचिन्नरमयान्तराः ॥ २७ ॥
केचिन्नित्यान्धकाराढ्यास्तथा शीलितजन्तवः ।
केचिन्नित्यप्रकाशाढ्यास्तथा शीलितजन्तवः ॥ २८ ॥
केचिन्मशकसंपूर्णा उदुम्बरफलश्रियः।
नित्यं शून्यान्तराः केचिच्छून्यस्पन्दात्मजन्तवः ॥ २९ ॥
सर्गेण तादृशेनान्ये पूर्णा येऽन्तर्धियामिह ।
कल्पनामपि नायान्ति व्योमपूर्णाचलो यथा ॥ ३० ॥
तादृगम्बरमेतेषां महाकाशं ततं स्थितम्।
आजीवितं प्रगच्छद्भिर्विष्ण्वाद्यैर्यन्न मीयते ॥ ३१ ॥
प्रत्येकस्याण्डगोलस्य स्थितः कटकरत्नवत् ।
भूताकृष्टिकरो भावः पार्थिवः स्वस्वभावतः ॥ ३२ ॥
यः सर्वविभवोऽस्माकं धियां न विषयं ततः ।
तज्जगत्कथने शक्तिर्न ममास्ति महामते ॥ ३३ ॥
भीमान्धकारगहने सुमहत्यरण्ये नृत्यन्त्यदर्शितपरस्परमेव मत्ताः ।
यक्षा यथा प्रवितते परमाम्बरेऽन्तरेवं स्फुरन्ति सुबहूनि महाजगन्ति ॥ ३४॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.३०.२४–२८
> सभी आचार, वेद और शास्त्र पहले एक रूप में आरम्भ होते हैं और बाद में बदल जाते हैं। उनका आरम्भ और व्यवस्था भी स्थायी नहीं होती।
> कुछ जीव ब्रह्मा जैसे हैं, कुछ विष्णु जैसे सृष्टि के पालनकर्ता हैं, कुछ अन्य प्राणियों के स्वामी हैं, और कुछ जीव बिना किसी स्वामी के ही रहते हैं।
> कुछ विचित्र सृष्टियों के अधिपति हैं, कुछ पशु-योनि में हैं, कुछ विशाल समुद्रों से भरे हुए हैं, और कुछ जन्म से ही रहित हैं।
> कुछ पत्थर जैसे शरीर वाले हैं, कुछ कीटों से बने हैं, कुछ पूर्णतः दिव्य हैं, और कुछ मानव रूप में हैं।
> कुछ सदा गहरे अन्धकार में रहते हैं और उसी के अभ्यस्त हैं; कुछ सदा प्रकाश में रहते हैं और उसी के अभ्यस्त हैं।

३.३०.२९–३४
> कुछ लोक मच्छरों और कीटों से भरे हैं, कुछ अंजीर के फल की तरह समृद्ध हैं; कुछ सदा शून्य हैं, और कुछ ऐसे जीव हैं जिनका स्वरूप ही शून्यता और सूक्ष्म स्पन्दन है।
> कुछ लोक ऐसे हैं जो पूर्ण होते हुए भी हमारी कल्पना में कभी आते ही नहीं—जैसे आकाश में स्थित अचल पर्वत।
> उन लोकों के लिए विशाल आकाश ही उनका क्षेत्र है, जो चारों ओर फैला हुआ है; विष्णु जैसे सृष्टिकर्ताओं का जीवनकाल भी उसे माप नहीं सकता।
> प्रत्येक ब्रह्माण्ड में एक स्थिर भौतिक शक्ति होती है, जो कंगन में जड़े रत्न की तरह स्थित होकर जीवों को उनके स्वभाव के अनुसार आकर्षित करती है।
> जो शक्ति सभी जगतों की उत्पत्ति का कारण है, वह हमारी बुद्धि का विषय नहीं बनती; इसलिए उसका पूर्ण वर्णन करना मेरे लिए भी सम्भव नहीं है।
> जैसे घोर अन्धकार वाले वन में मदमत्त यक्ष एक-दूसरे को देखे बिना नृत्य करते हैं, वैसे ही अनन्त आकाश में असंख्य महान जगत चमकते और गतिमान हैं।

शिक्षाओं का सार:

इन श्लोकों में यह बताया गया है कि न कोई शास्त्र, न कोई नियम, न ही कोई व्यवस्था स्थायी है। सभी संरचनाएँ समय के साथ बनती, बदलती और विलीन होती हैं। यह दृष्टि हमें बाहरी रूपों से मुक्त होकर सत्य की गहराई में जाने के लिए प्रेरित करती है।

यहाँ सृष्टि की असीम विविधता का चित्रण है—असंख्य लोक, असंख्य प्रकार के जीव, प्रकाश और अन्धकार, स्थूल और सूक्ष्म, रूप और शून्यता। मानव संसार केवल एक छोटा सा अंश है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अनेक पूर्ण जगत हमारी कल्पना से परे हैं। हमारी सोच की सीमा वास्तविकता की सीमा नहीं है। इससे अहंकार टूटता है और बौद्धिक विनम्रता जन्म लेती है।

प्रत्येक लोक का अपना स्वाभाविक नियम और आकर्षण शक्ति होती है, जो जीवों को उनके कर्म और प्रकृति के अनुसार अनुभवों में बाँधती है। कोई एक सार्वभौमिक व्यवस्था सभी पर समान रूप से लागू नहीं होती।

अन्ततः वसिष्ठ यह स्पष्ट करते हैं कि परम सत्य शब्दों और बुद्धि से परे है। असंख्य ब्रह्माण्ड अनन्त आकाश में स्वतन्त्र रूप से स्पन्दित हो रहे हैं। यह ज्ञान साधक को मौन, विस्मय और आन्तरिक जागरूकता की ओर ले जाता है।

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