योगवशिष्ट ३.३०.११–२३
(अनंतकोटि ब्रह्मांड परम ब्रह्म के विशाल विस्तार में बस धूल के कण मात्र हैं)
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्वातन्त्र्यात्प्रधावन्ति पदार्थाः सर्व एव यत् ।
ब्रह्माण्डे पार्थिवो भागस्तदधस्तूर्ध्वमन्यथा ॥ ११ ॥
पिपीलिकानां महतां व्योम्नि वर्तुललोष्टके ।
दशदिक्कमधः पादाः पृष्ठमूर्ध्वमुदाहृतम् ॥ १२ ॥
वृक्षवल्मीकजालेन केषांचिद्धृदि भूतलम् ।
ससुरानरदैत्येन वेष्टितं व्योम निर्मलम् ॥ १३ ॥
संभूतं सह भूतेन सग्रामपुरपर्वतम् ।
इदं कल्पनभूतेन पक्वाक्षोटमिव त्वचा ॥ १४ ॥
यथा विन्ध्यवनाभोगे प्रस्फुरन्ति करेणवः ।
तथा तस्मिन्पराभोगे ब्रह्माण्डत्रसरेणवः ॥ १५ ॥
तस्मिन्सर्वं ततः सर्वं तत्सर्वं सर्वतश्च यत् ।
तच्च सर्वमयो नित्यं तथा तदणुकं प्रति ॥ १६ ॥
शुद्धबोधमये तस्मिन्परमालोकवारिधौ।
अजस्रमेत्य गच्छन्ति ब्रह्मण्डाख्यास्तरङ्गकाः ॥ १७ ॥
अन्तःशून्याः स्थिताः केचित्संकल्पक्षयरात्रयः ।
तरङ्गा इव तोयेऽब्धौ प्रोह्यन्ते शून्यतार्णवे ॥ १८ ॥
केषांचिदन्तःकल्पान्तः प्रवृत्तो घर्घरारवः ।
न श्रुतोऽन्यैर्न च ज्ञातः स्वभावेन रसाकुलैः ॥ १९ ॥
अन्येषां प्रथमारम्भे शुद्धभूषु विजृम्भते ।
सर्गः संसिक्तबीजानां कोशेऽङ्कुरकला यथा ॥ २० ॥
महाप्रलयसंपत्तौ सूर्यार्चिर्विद्युतोऽद्रयः।
प्रवृत्ता गलितुं केचित्तापे हिमकणा इव ॥ २१ ॥
आकल्पं निपतन्त्येव केचिदप्राप्तभूमयः।
यावद्विशीर्य जायन्ते तथा संविन्मयाः किल ॥ २२ ॥
स्तब्धा इव स्थिताः केचित्केशोण्ड्रकमिवाम्बरे ।
वायोः स्पन्दा इवाभान्ति तथा प्रोदितसंविदः ॥ २३ ॥
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.३०.११–१४
> सारे पदार्थ अस्वतंत्रता के कारण बिना अपनी इच्छा के दौड़ते हैं। ब्रह्मांड में पृथ्वी भाग नीचे है, और बाकी ऊपर अलग तरह से।
> आकाश में गोल ढेले पर बड़ी चींटियों के लिए दसों दिशाएँ पैरों के नीचे हैं, और पीठ ऊपर कही जाती है।
> कुछ प्राणियों के हृदय में पेड़ों की जड़ों और बाँबी से पृथ्वी ढकी है; देवता, मनुष्य और दैत्य से घिरा हुआ शुद्ध आकाश है।
> यह जगत प्राणियों के साथ उत्पन्न हुआ है, जिसमें गाँव, शहर और पर्वत हैं; यह कल्पना से ढका है, जैसे पके बेर की छिलके से।
३.३०.१५–१८
> जैसे विंध्य वन के फैलाव में हाथी चमकते हैं, वैसे ही उस परम फैलाव में ब्रह्मांड सूक्ष्म धूल कणों जैसे हैं।
> उसमें सब कुछ है, उससे सब कुछ है, वह सब कुछ हर जगह है, और वह सब कुछ से बना हुआ नित्य है; प्रत्येक अणु के लिए भी ऐसा ही है।
> उस शुद्ध बोध रूपी परम प्रकाश के समुद्र में ब्रह्मांड नामक तरंगें निरंतर आती-जाती रहती हैं।
> कुछ तरंगें अंदर से खाली रहती हैं, संकल्प नष्ट होने की रात्रियों जैसी; वे शून्यता के समुद्र में तरंगों की तरह घुल जाती हैं।
३.३०.१९–२३
> कुछ में अंदर कल्पांत के समय घर्घराहट की ध्वनि शुरू होती है, लेकिन दूसरों को सुनाई या ज्ञात नहीं होती, क्योंकि वे अपनी प्रकृति में रसे भरे हैं।
> दूसरों में शुरू में ही शुद्ध प्राणियों में सृष्टि फैलती है, जैसे सींचे गए बीजों में अंकुर की कली।
> महाप्रलय के समय कुछ सूर्य की किरणें, बिजली, पर्वत गलने लगते हैं, जैसे गर्मी में बर्फ के कण।
> कुछ पूरे कल्प तक गिरते रहते हैं बिना जमीन पहुंचे; वे घुलकर फिर उसी तरह जन्म लेते हैं, क्योंकि वे संवित्ति से बने हैं।
> कुछ स्थिर रहते हैं जैसे आकाश में बाल खड़े या वायु की हलचल; जागृत संवित्तियाँ उसी तरह चमकती हैं।
शिक्षाओं का विस्तृत सार:
ये श्लोक ब्रह्मांड की मायावी और परतंत्र प्रकृति का वर्णन करते हैं। ऋषि वसिष्ठ बताते हैं कि सृष्टि में कोई भी वस्तु स्वतंत्र नहीं है—सारे पदार्थ और प्राणी माया या कल्पना के बल पर बिना अपनी इच्छा के चलते हैं। ब्रह्मांड की संरचना सापेक्ष है: नीचे-ऊपर दिशाएँ दृष्टिकोण पर निर्भर हैं, जैसे चींटियों का उदाहरण या प्राणियों की अलग-अलग अनुभूति से स्पष्ट होता है। इससे पता चलता है कि स्थान, दिशा और भौतिक वास्तविकता परम नहीं, बल्कि भ्रम से बंधी हैं।
ब्रह्मांड को कल्पना का उत्पाद बताया गया है, जो शुद्ध चेतना पर छिलके की तरह लिपटा है। असंख्य ब्रह्मांड परम विस्तार में धूल कणों जैसे दिखते हैं। सब कुछ उसी परम में समाया है, उसी से निकलता है और उसी से व्याप्त है—यहाँ तक कि प्रत्येक अणु में भी। यह अद्वैत का उपदेश है: दिखाई देने वाली बहुलता मात्र एक अनंत चेतना का विभिन्न रूप है।
ब्रह्मांडों को शुद्ध बोध के समुद्र में उठती-गिरती तरंगों से तुलना की गई है। कुछ ब्रह्मांड कल्पना के समाप्त होने पर शून्य में घुल जाते हैं, जबकि अन्य अंदर चक्र चलाते रहते हैं। इससे जगत की क्षणभंगुर और स्वप्न जैसी प्रकृति स्पष्ट होती है—सृष्टि और प्रलय चेतना के क्षेत्र में निरंतर होते रहते हैं, बिना उसके शुद्ध स्वरूप को छुए।
ब्रह्मांडीय चक्रों के विभिन्न चरण दिखाए गए हैं: कुछ में नई सृष्टि अंकुरित बीजों जैसी शुरू होती है, कुछ में महाप्रलय पर ठोस रूप (पर्वत, सूर्य) बर्फ की तरह पिघलते हैं। कुछ कल्प भर गिरते रहते हैं बिना आधार पहुंचे, फिर जन्म लेते हैं। इससे जन्म-मृत्यु मात्र चेतना में दिखने वाले बदलाव हैं। कुछ अवस्थाएँ स्थिर रहती हैं, फिर भी जागृत चेतना से चमकती हैं।
अंत में, सच्ची वास्तविकता शुद्ध, अपरिवर्तनीय चेतना (चित् या संविद्) है। सारी घटनाएँ—सृष्टि, पालन, प्रलय—उसकी लीला मात्र हैं। इस अद्वैत का बोध होने से अलगाव का भ्रम मिट जाता है और जगत आत्म-प्रकाशित अनंत स्वरूप पर आरोपित दिखाई देता है।
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