Thursday, January 15, 2026

अध्याय ३.२७, श्लोक ४३–५०

योग्वशिष्ठ ३.२७.४३–५०
(आत्मा शाश्वत और शुद्ध चेतना है, जो किसी भी रूप से बंधी नहीं है, फिर भी शरीरों और इच्छाओं के साथ तादात्म्य के कारण बंधी हुई प्रतीत होती है)

लीलोवाच ।
वर्षाण्यष्टौ सुराष्ट्रेषु देवि गोत्वं कृतं मया ।
मोहाद्दुर्जनदुष्टाज्ञबालगोपाललीलया ॥ ४३ ॥
विहंग्या वैरविन्यस्ता वागुरा विपिनावनौ ।
क्लेशेन महता च्छिन्ना अधमा वासना इव ॥ ४४॥
कर्णिकाक्रोडशय्यासु विश्रान्तमलिना सह ।
पद्मकुड्मलकोशेषु भुक्तकिंजल्कया रहः ॥ ४५॥
भ्रान्तमुत्तुङ्गशृङ्गासु हरिण्या हारिनेत्रया ।
वनस्थलीषु रम्यासु किराताहतमर्मया ॥ ४६ ॥
दृष्टं नष्टासु दिक्ष्वब्धिकल्लोलैरुह्यमानया ।
मत्स्याम्बुकच्छपाच्छोडे मोघमाननताडनम् ॥ ४७॥
पीतं चर्मण्वतीतीरे गायन्त्या मधुरस्वरम् ।
पुलिन्द्या सुरतान्तेषु नालिकेररसासवम् ॥ ४८॥
सारसीसरसालिन्या सीत्कारमधुरस्वरम् ।
सारसः सुरतैः स्वैरं सामन्तश्चारुरञ्जितः ॥ ४९ ॥
तालीतमालकुञ्जेषु तरलानननेत्रया।
क्षीबप्रेक्षणविक्षोभैः कृतं कान्तावलोकनम् ॥ ५० ॥

रानी लीला आगे बोलीं:
३.२७.४३
आठ वर्ष सुराष्ट्र देश में, हे देवी, मैंने मोह से दुर्जन दुष्ट अज्ञानी बाल गोपाल की लीला में गाय का रूप धारण किया था।

३.२७.४४
वन में विहंगमा द्वारा वैर से बिछाई गई जाल की तरह मेरी अधम वासनाएँ महान् क्लेश से काटी गईं, जैसे नीच आदतें।

३.२७.४५
कमल की डंठल की कोटरों में और कुड्मल के कोश में गंदे भौंरे के साथ रहस्य में विश्राम किया, जिसमें किंजल्क का भोग किया।

३.२७.४६
ऊँचे शिखरों पर हिरण के साथ, आकर्षक नेत्रों वाली हरिणी बनकर सुंदर वनस्थलियों में भटकी, जहाँ किरात ने मर्मस्थल पर प्रहार किया।

३.२७.४७
खोई हुई दिशाओं में समुद्र की लहरों द्वारा बहाई जाती हुई मत्स्य, कछुए या मेंढक द्वारा व्यर्थ मुख पर थप्पड़ मारना देखा।

३.२७.४८
चर्मण्वती नदी के तट पर पुलिंद स्त्री द्वारा मधुर स्वर में गाते हुए प्रेमांत में नारियल के रस का आसव पिया।

३.२७.४९
सरसों वाली सरस (हंसिनी) द्वारा मधुर सीत्कार स्वर में सरस (हंस) स्वेच्छा से रति-क्रीड़ा में आनंदित हुआ, सामंतों द्वारा सुंदर रंजित।

३.२७.५०
ताड़ और तमाल के कुंजों में तरल मुख-नेत्र वाली स्त्री द्वारा मदमत्त दृष्टि के विक्षोभ से प्रिय का अवलोकन किया।

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:

ये श्लोक लीला द्वारा अपनी अनेक पूर्व जन्मों की स्मृति का हिस्सा हैं, जो योगबल और देवी की कृपा से प्रकट हुई। लीला विभिन्न निम्न योनि—पशु, पक्षी, कीट और मानव-सदृश आदिवासी रूपों में भटकने का वर्णन करती हैं, जो अज्ञान (मोह) और गहरी वासनाओं से प्रेरित हैं। यह दर्शाता है कि जीव एक ही रूप में स्थिर नहीं रहता, बल्कि कर्म और वासना के कारण अनंत चक्र में भटकता है। वर्णन गाय के रूप से शुरू होता है, जहाँ खेल-कूद में भी दुष्ट संगति से बंधन होता है। यह शिक्षा देता है कि सांसारिक पहचान कितनी भी निर्दोष लगे, वह आत्मा को बाँधती है और जन्म-मृत्यु का कारण बनती है।

"महान् क्लेश से काटी गई अधम वासना" की उपमा क्रूर जाल से बंधे पक्षी की तरह है, जो दर्शाती है कि आध्यात्मिक शुद्धि कठिन परिश्रम माँगती है। वासनाएँ जीव को जन्मों तक फँसाती हैं। योगवासिष्ठ सिखाता है कि मुक्ति जन्मों से बचने में नहीं, बल्कि सूक्ष्म वासनाओं को पहचानकर नष्ट करने में है, जो विवेक और साधना से संभव है।

श्लोकों में कामुक और प्रवृत्ति-प्रधान अनुभवों का जीवंत चित्रण है—भौंरे के साथ कमल में विश्राम (क्षणिक सुख की आसक्ति), शिकारी द्वारा मारी गई हिरणी (मृत्यु और कामना की असुरक्षा), या नशीले पेय और प्रेम-क्रीड़ा में लिप्त आदिवासी स्त्रियाँ या पक्षी। ये दिखाते हैं कि एक ही चेतना विभिन्न शरीर धारण कर छिपी इच्छाओं को पूरा करती है। शिक्षा यह है कि सभी शरीर—उच्च या निम्न—मन की कल्पना और संस्कार हैं; मानव "श्रेष्ठता" और पशु "निम्नता" में कोई मूल अंतर नहीं—दोनों अज्ञान के भ्रम हैं।

इन जीवनियों में व्यर्थता और दुःख स्पष्ट है: समुद्र की लहरों में व्यर्थ थप्पड़, शिकारी का प्रहार, या प्रेम-मदिरा का क्षणिक आनंद। ये संसार की क्षणभंगुर, दुखद और शून्य प्रकृति दिखाते हैं। लीला की ये स्मृतियाँ वैराग्य जगाती हैं, कि सुख की खोज रूपों में भटकने से केवल बंधन बढ़ता है। ग्रंथ इन चित्रों से दर्शाता है कि जगत चेतना का स्वप्न-सा खेल है, जहाँ जन्म वासनाओं से होते हैं।

अंततः, ये श्लोक योगवासिष्ठ के मूल सिद्धांत को मजबूत करते हैं: आत्मा शाश्वत शुद्ध चेतना है, किसी रूप से बंधी नहीं, परंतु शरीर और इच्छाओं से तादात्म्य के कारण बंधी दिखती है। लीला द्वारा इन जन्मों का स्मरण ज्ञान की शक्ति दिखाता है जो काल और पुनर्जन्म से परे ले जाता है। शिक्षा है कि सभी रूपों और वासनाओं के भ्रम को देखकर ही—जैसा लीला करती है—खोजी यहाँ और अभी मुक्त हो जाता है।

No comments:

Post a Comment

अध्याय ३.५७, श्लोक २८–३७

 योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७ (ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उ...