यथा पृथ्व्यादिना भातमपृथ्व्यादि भवेत्क्षणात् ।
स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानात्तथा जाग्रत्यपि स्फुटम् ॥ ४६ ॥
पृथ्व्यादि खतया बुद्धं खमित्येवानुभूयते ।
तथाहि क्षुब्धधातूनां कुड्येषु ख इवोद्यमः ॥ ४७॥
स्वप्ने नगरमुर्वीं वा शून्यं खातं च बुध्यते ।
स्वप्राङ्गना च कुरुते शून्याप्यर्थक्रियां नृणाम् ॥ ४८ ॥
खं पृथ्व्यादितया बुद्धं पृथ्व्यादि भवति क्षणात् ।
मूर्च्छायां परलोकोऽपि प्रत्यक्षमनुभूयते ॥ ४९ ॥
बालो व्योमैव वेतालं म्रियमाणोऽम्बरे वनम् ।
केशोण्ड्रकं खमन्यस्तु खमन्यो वेत्ति मौक्तिकम् ॥ ५० ॥
त्रस्तक्षीबार्धनिद्राश्च नौयानाश्च सदैव स्ये ।
वेतालवनवृक्षादि पश्यन्त्यनुभवन्ति च ॥ ५१॥
यथाभावितमेतेषां पदार्थानामतो वपुः ।
अभ्यासजनितं भाति नास्त्येकं परमार्थतः ॥ ५२॥
लीलया तु यथावस्तु बुद्ध्वा पृथ्व्यादिनास्तिता।
आकाशमेव संवित्त्या भाति भ्रान्तितयोदितम् ॥ ५३ ॥
ब्रह्मात्मैकचिदाकाशमात्रबोधवतो मुनेः।
पुत्रमित्रकलत्राणि कथं कानि कदा कुतः ॥ ५४ ॥
दृश्यमादावनुत्पन्नं यच्च भात्यजमेव तत् ।
सम्यग्ज्ञानवतामेव रागद्वेषदृशो कृतः ॥ ५५ ॥
हस्तः शिरसि यद्दत्तो लीलया ज्येष्ठशर्मणः ।
तत्प्रभावस्थितारम्भसंबोधायाश्चितेः फलम् ॥ ५६॥
बोधो हि चेतति यथैव तथा शुभानि सूक्ष्मस्तु खादपि तथातितरां विशुद्धः।
सर्वत्र राघव स एव पदार्थजालं स्वप्नेषु कल्पितपुरेष्वनुभूतमेतत् ॥ ५७ ॥
Sunday, January 11, 2026
अध्याय ३.२६, श्लोक ४६–५७
योगवशिष्ट ३.२६.४६–५७
(चेतना ही एकमात्र वास्तविकता है — शुद्ध, सूक्ष्म और सर्वव्यापी। यह अपनी इच्छानुसार सब कुछ रचती है, ठीक वैसे ही जैसे स्वप्न के नगर या कल्पना के संसार)
महर्षि वशिष्ठ उवाच।
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.२६.४६
जैसे स्वप्न में पृथ्वी आदि न होने पर भी क्षण में पृथ्वी आदि बन जाता है स्वप्न के ज्ञान से, वैसे ही जागृत अवस्था में भी यह स्पष्ट रूप से होता है।
३.२६.४७
पृथ्वी आदि जो समझा जाता है, वह केवल आकाश के रूप में अनुभव होता है। वास्तव में, जब तत्व क्षुब्ध होते हैं तो दीवारों में भी आकाश-सा उदय होता है।
३.२६.४८
स्वप्न में नगर, पृथ्वी या शून्य गड्ढा समझा जाता है; स्वप्न की स्त्री भी शून्य होते हुए लोगों पर कार्य करती है।
३.२६.४९
आकाश पृथ्वी आदि के रूप में समझा जाए तो क्षण में पृथ्वी आदि बन जाता है। मूर्छा में परलोक भी प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
३.२६.५०
बच्चा आकाश को ही वेताल समझता है; मरते हुए व्यक्ति आकाश में वन देखता है; कोई केश को कीड़ा मानता है, दूसरा आकाश को मोती जानता है।
३.२६.५१
डरे हुए, नशे में, आधी नींद में या नाव पर रहने वाले हमेशा वेताल-वन, वृक्ष आदि देखते और अनुभव करते हैं।
३.२६.५२
जैसा इन पदार्थों का भाव किया जाता है, वैसा ही उनके शरीर अभ्यास से चमकते हैं। परमार्थ में एक भी वास्तविक नहीं है।
३.२६.५३
लीला से यथार्थ समझकर पृथ्वी आदि की नास्तिता जानने पर केवल आकाश ही संवित्ति से चमकता है, भले भ्रम से ऐसा कहा जाए।
३.२६.५४
ब्रह्म-आत्मा एक चित्-आकाश मात्र जानने वाले मुनि के लिए पुत्र, मित्र, पत्नी आदि कैसे, कब, कहाँ और कौन?
३.२६.५५
दृश्य आदि में कभी उत्पन्न नहीं हुआ; जो चमकता है वह अजन्मा ही है। सच्चे ज्ञानियों के लिए राग-द्वेष की दृष्टि से ही यह सृष्टि लगती है।
३.२६.५६
ज्येष्ठ शर्मा के सिर पर हाथ लीला से रखने से वह चित् की प्रभाव-स्थिति और आरम्भ-बोध का फल था।
३.२६.५७
बोध जैसा चाहता है वैसा ही चेतता है; शुभ सूक्ष्म और आकाश से भी अधिक विशुद्ध है। सर्वत्र हे राघव वही पदार्थ-जाल है, जो स्वप्नों और कल्पित नगरों में अनुभव होता है।
शिक्षा का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक संसार की मिथ्या प्रकृति पर बल देते हैं तथा स्वप्न, भ्रम और जागृत अवस्था की समानता दिखाते हैं। महर्षि वशिष्ठ बताते हैं कि जैसे स्वप्न में कुछ भी नहीं से पदार्थ बन जाते हैं, वैसे ही जागृत संसार भी चेतना का प्रक्षेपण है। तत्व जैसे पृथ्वी आदि मन के अनुसार क्षण में प्रकट होते हैं, जो दर्शाता है कि वास्तविकता मन की धारणा पर निर्भर है, न कि स्वतंत्र अस्तित्व पर।
शिक्षा में धारणा और संस्कार की भूमिका बताई गई है। आकाश को मनुष्य ठोस पदार्थ या शून्य के रूप में अनुभव करता है—स्वप्न, मूर्छा, नशा, भय या आदत से। अलग-अलग लोग एक ही चीज को भिन्न देखते हैं (जैसे आकाश को वेताल, मोती या कीड़ा), जो सिद्ध करता है कि पदार्थों का कोई स्थिर, वस्तुनिष्ठ रूप नहीं; वे मानसिक अभ्यास और कल्पना से उत्पन्न होते हैं।
परमार्थ में कोई स्थायी द्रव्य नहीं है। संसार केवल चेतना से चमकता है, किंतु जो ज्ञानी ऋषि आत्मा को शुद्ध, अनंत चेतना (ब्रह्म) मान लेता है, उसके लिए परिवार या वस्तुओं की बहुलता नहीं रहती। ये सब अज्ञान से उत्पन्न भ्रम हैं।
श्लोक स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मांड कभी वास्तव में उत्पन्न नहीं हुआ; वह अजन्मा है और केवल राग-द्वेष की गलत दृष्टि से लगता है। सच्चा ज्ञान भौतिक जगत की नास्तिता दिखाता है, सब कुछ शुद्ध आकाश-सदृश चेतना में समाहित है।
अंत में, चेतना ही एकमात्र वास्तविकता है—शुद्ध, सूक्ष्म और सर्वव्यापी। यह जैसा चाहती है वैसा बनाती है, जैसे स्वप्न के नगर या कल्पित संसार। साधक के लिए इसको जानना मुक्ति है, क्योंकि समस्त दृश्य जगत इसी एक चेतना की लीला है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
अध्याय ३.५७, श्लोक २८–३७
योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७ (ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उ...
-
योग वशिष्ठ २.१३.३१–४१ (विवेक पर भरोसा, सांसारिक मोह-माया से विरक्ति, और मन पर नियंत्रण पाने पर ध्यान) श्रीवसिष्ठ उवाच । विवेकं परमाश्रित्य व...
-
योग वशिष्ठ १.१९.१ – १० (बचपन के खतरे) श्रीराम उवाच । लब्ध्वापि तरलाकारे कार्यभारतरंगिणि । संसारसागरे जन्म बाल्यं दुःखाय केवलम् ॥ १ ॥ अशक्तिर...
-
योग वशिष्ठ १.२८.१–१० (अभूतपूर्व जगत की क्षणिक प्रकृति) श्रीराम उवाच । यच्चेदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजंगमम् । तत्सर्वमस्थिरं ब्रह्मन्स्वप्...
No comments:
Post a Comment