योगवशिष्ट ३.२६.२२–३२
(सच्ची शांति स्व: (आत्मा) में स्थित होने से आती है, जहाँ न तो कोई हानि है, न मृत्यु, न शोक—केवल अनंत आनंद है)
श्रीवशिष्ठजी उवाच:।
ज्येष्ठशर्मादयस्ते ते देव्यौ प्रति यथाक्रमम् ।
निजं तद्दुःखमाचख्युर्दम्पतिव्यसनात्मकम् ॥ २२ ॥
ज्येष्ठशर्मादय ऊचुः ।
देव्यावभवतां स्निग्धाविह ब्राह्मणदम्पती ।
सर्वातिथी कुलकरौ स्तम्भाभूतौ द्विजस्थितेः ॥ २३ ॥
तावद्य गृहमुत्सृज्य सपुत्रपशुबान्धवम्।
स्वर्गं गतौ नः पितरौ तेन शून्यं जगत्त्रयम् ॥ २४ ॥
पक्षिणो गृहमारुह्य विक्षिपन्तः प्रतिक्षणम् ।
देहं शून्ये मृतं भक्त्या शोचन्ति मधुरैः स्वरैः ॥ २५ ॥
गुहागुरुगुरारावप्रलापलपनाकुलः ।
सरित्स्थूलाश्रुधाराभिः परिरोदिति पर्वतः ॥ २६ ॥
निर्जराक्रन्दकारिण्यो मुक्ताम्बरपयोधराः ।
तप्तनिःश्वासविध्वस्ताः परं कार्श्यमिता दिशः ॥ २७ ॥
क्षतविक्षतसर्वाङ्गः करुणाक्रन्दकर्कशः।
उपवासरतो ग्रामो दीनो मृतिपरः स्थितः ॥ २८ ॥
दिवसं प्रति वृक्षाणामवश्यायाश्रुबिन्दवः ।
गुच्छलोचनकोशेभ्यस्तापोष्णानि पतन्त्यधः ॥ २९ ॥
प्रशान्तजनसंचारा रथ्या क्षारविधूसरा ।
विधवाविगतानन्दा संशून्यहृदया स्थिता ॥ ३० ॥
कोकिलालिप्रलापिन्यो वृष्टिबाष्पहता लताः ।
उष्णोष्णश्वसना देहं घन्ति पल्लवपाणिभिः ॥ ३१ ॥
आत्मानं शतधा कर्तुं बृहच्छ्वभ्रशिलातले ।
निर्झराः प्रपतन्त्येते तापतप्तशरीरकाः ॥ ३२ ॥
३.२६.२२
महर्षि वशिष्ठ बोले:
ज्येष्ठशर्मा आदि ने क्रम से उन दोनों देवियों को दंपति के वियोग से उत्पन्न अपना वह दुख बताया॥
३.२६.२३
ज्येष्ठशर्मा आदि बोले -
हे देवियों! हम दोनों यहां स्नेही ब्राह्मण दंपति थे, सभी अतिथियों के कुल को धारण करने वाले तथा द्विज समाज के खंभे के समान थे॥
३.२६.२४
हमारे माता-पिता पुत्र-पशु-बांधवों सहित इस गृह को त्यागकर स्वर्ग को चले गए, इसलिए हमारे लिए तीनों लोक शून्य हो गए॥
३.२६.२५
पक्षी शून्य गृह पर चढ़कर हर क्षण विक्षेप करते हैं तथा भक्ति से मृत देह का मधुर स्वरों से शोक करते हैं॥
३.२६.२६
गुहाओं से गुरु गुरु शब्द वाले प्रलाप से व्याकुल पर्वत, स्थूल अश्रु धाराओं से भरकर बहुत रो रहा है॥
३.२६.२७
निर्झरों जैसे क्रंदन करने वाली, मुक्ताओं जैसे जल वाले मेघ रूपी स्तनों वाली, तप्त निःश्वासों से नष्ट हुई दिशाएं अत्यंत दुबली हो गई हैं॥
३.२६.२८
सर्व अंग क्षत-विक्षत, करुण क्रंदन से कर्कश, उपवास में रत, दीन ग्राम मृत्यु के निकट स्थित है॥
३.२६.२९
वृक्षों के गुच्छ रूपी नेत्र कोशों से प्रतिदिन अवश्यांबु जैसे अश्रु बिंदु ताप से गर्म होकर नीचे गिरते हैं॥
३.२६.३०
जन संचार से शांत, क्षार जैसे धूल से भरी रथ्या विधवा की तरह आनंद रहित, शून्य हृदया स्थित है॥
३.२६.३१
कोकिल और भ्रमरों के प्रलाप वाली, वर्षा जैसे बाष्प से आहत लताएं उष्ण श्वास लेती हुई पल्लव रूपी हाथों से देह पीट रही हैं॥
३.२६.३२
ये निर्झर ताप से तप्त शरीर वाले आत्मा को शतधा करने के लिए बड़े गर्त की शिला पर गिर रहे हैं॥
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक योगवासिष्ठ के सरस्वती और लीलां की कथा के भाग हैं, जहां लीलां अपने सूक्ष्म शरीर से मृत्यु के बाद अपने पूर्व गृह में जाती है। ज्येष्ठशर्मा आदि पुत्र अदृश्य देवियों को अपना गहन शोक बताते हैं। यहां की शिक्षा यह है कि देह और सांसारिक संबंधों से आसक्ति के कारण ही इतना गहरा दुख उत्पन्न होता है, जिससे प्रियतम के खोने पर सारा विश्व शून्य और उदास लगने लगता है।
प्रकृति का मानवीकरण—पक्षी, पर्वत, दिशाएं, ग्राम, वृक्ष, पथ, लताएं और निर्झर—सब मानो शोक मना रहे हैं, यह दर्शाता है कि दुख मन की उपज है। वास्तव में प्रकृति अपरिवर्तित रहती है, किंतु शोकाकुल मन अपनी पीड़ा को सर्वत्र थोप देता है, ओस की बूंदों में अश्रु, हवा में क्रंदन और शून्यता में निराशा देखता है।
यह सार्वभौमिक शोक की अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन केवल एक परिवार के नुकसान पर सारे जगत के शोक करने की असंभवता दिखाकर दुख की मिथ्या प्रकृति को उजागर करता है। व्यक्तिगत शोक अज्ञान और क्षणभंगुर देह-संबंधों से पहचान के कारण उत्पन्न मायाजाल मात्र है।
गहन अद्वैत शिक्षा यह है कि मृत्यु केवल विश्व के स्वप्न जैसे प्रकट रूप में परिवर्तन है। माता-पिता "स्वर्ग गए" किंतु सत्य में सब रूप एक ही चेतना के अभिव्यक्ति हैं। रूपों से चिपकना दुख का कारण है, जबकि देह-मन से परे स्थिर आत्मा की समझ से इस दुख से मुक्ति मिलती है।
अंततः ये श्लोक वैराग्य की शिक्षा देते हैं कि विश्व को स्वप्नवत मानसिक प्रक्षेप समझकर दुख से ऊपर उठें। आत्मा में स्थित रहने से कोई हानि, मृत्यु या शोक नहीं रहता—केवल अनंत आनंद ही रहता है।
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