Thursday, January 8, 2026

अध्याय ३.२६, श्लोक ११–२१

योगवशिष्ट ३.२६.११–२१
(दो वन देवियों का एक शोकाकुल ब्राह्मण ज्येष्ठ शर्मा के घर में चमत्कारिक आगमन)
 
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वौषधिवनग्रामं पूरयन्त्यौ रसायनैः।
शीतलाह्लादसुखदं चन्द्रद्वयमिवोदितम् ॥ ११ ॥
लम्बालकलतालोललोचनालिविलोकनैः ।
किरत्कुवलयोन्मिश्रमालतीकुसुमोत्करान् ॥ १२ ॥
द्रुतहेमरसापूरसरित्सरणहारिणा ।
देहप्रभाप्रवाहेण कनकीकृतकाननम् ॥ १३ ॥
सहजाया वपुर्लक्ष्म्या लीलादोलाविलासिनः ।
त एते च तरङ्गाढ्या निजलावण्यवारिधेः ॥ १४ ॥
विलोलबाहुलतिकायुगेनारुणपाणिना ।
किरन्नवनवं हैमं कल्पवृक्षलतावनम् ॥ १५ ॥
पादैरमृदिताम्लानपुष्पकोमलपल्लवैः ।
स्थलाब्जदलमालाभैरस्पृशद्भूतलं पुनः ॥ १६ ॥
तालीतमालखण्डानां शुष्काणां शुचिशोचिषाम् ।
आलोकनामृतासेकैर्जनयद्बालपल्लवान् ॥ १७ ॥
नमोऽस्तु वनदेवीभ्यामित्युक्त्वा कुसुमाञ्जलिम् ।
तत्याज ज्येष्ठशर्माथ सार्धं गृहजनेन सः ॥ १८ ॥
पपात पादयोर्गेहे तयोर्वै कुसुमाञ्जलिः।
प्रालेयसीकरासारः पद्मिन्या इव पद्मयोः ॥ १९ ॥

ज्येष्ठशर्मादय ऊचुः ।
जयतं वनदेव्यौ नो दुःखनाशार्थमागते ।
प्रायः परपरित्राणमेव कर्म निजं सताम् ॥ २० ॥
इति तद्वचनान्ते ते देव्यावूचतुरादरात् ।
आख्यात दुःखं येनायं लक्ष्यते दुःखितो जनः ॥ २१ ॥

महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.२६.११
वे दो चंद्रमाओं की तरह उदित हुईं, सभी औषधियों, वनों और गाँवों को रसायनों से भरकर, ठंडक और आनंद देने वाली।

३.२६.१२
लंबी झूमती पलकों और भँवरों से घिरे नेत्रों की दृष्टि से, नीले कमलों में मिले जैसमिन फूलों के समूह बिखेरती हुईं।

३.२६.१३
पिघले सोने की नदियों जैसे शरीर की कान्ति के प्रवाह से, पूरे जंगल को सोने जैसा बना दिया।

३.२६.१४
ये उनके अपने सौंदर्य के सागर की लहरें थीं, जो उनके शरीर की स्वाभाविक सुंदरता पर खेलते हुए डोल रही थीं।

३.२६.१५
लाल हथेलियों और लहराती बाँहों रूपी लताओं से, नई-नई सोने की कल्पवृक्ष लताओं का वन बिखेर रही थीं।

३.२६.१६
कोमल फूलों और पत्तियों को कुचलने वाले पैरों से, जो कमल दलों जैसे निशान छोड़ते हुए, फिर धरती को स्पर्श नहीं कर रही थीं।

३.२६.१७
सूखे ताली और तमाल वृक्षों के टुकड़ों पर, जिनमें शुद्ध अग्नि जल रही थी, अपनी दृष्टि के अमृत जैसे छींटों से नए कोमल पत्ते उत्पन्न कर रही थीं।

३.२६.१८
"वन देवियों को नमस्कार" कहकर, ज्येष्ठशर्मा ने अपने घरवालों के साथ फूलों की अंजलि अर्पित की।

३.२६.१९
उनके घर में उन दोनों के चरणों में वह फूलों की अंजलि गिरी, जैसे कमल तालाब से ठंडे ओस के छींटे कमलों पर गिरते हैं।

३.२६.२०
ज्येष्ठशर्मा आदि बोले: "हमारे वन देवियों की जय हो, जो हमारे दुःख नाश करने आई हैं। सज्जनों का स्वाभाविक कर्म ही दूसरों की रक्षा करना है।"

३.२६.२१
उनके उन वचनों के अंत में वे दोनों देवियाँ आदर से बोलीं: "वह दुःख बताओ जिससे यह व्यक्ति दुःखी लग रहा है।"

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:

ये योगवासिष्ठ के श्लोक एक दुःखी ब्राह्मण ज्येष्ठशर्मा के घर में दो वन देवियों के चमत्कारी आगमन का वर्णन करते हैं। यह कथा दुनिया की मायावी प्रकृति, दिव्य कृपा की शक्ति और दुःख निवारण में करुणा की भूमिका जैसे गहन दार्शनिक सत्यों को दर्शाती है।

देवियों के रूप का काव्यात्मक वर्णन उनकी अलौकिक सुंदरता और परिवर्तनकारी शक्ति पर जोर देता है। उनकी उपस्थिति से सूखा जंगल फिर से हरा-भरा हो जाता है, सोने जैसा चमकता है और मरे वृक्षों से नए अंकुर फूटते हैं। यह प्रतीक है कि दिव्य चेतना या कृपा कैसे एक निराश और शुष्क मन को पुनर्जीवित कर सकती है।

फूल अर्पित करने का कार्य और देवियों का तत्काल उत्तर भक्ति और समर्पण को उजागर करता है। ज्येष्ठशर्मा की साधारण पूजा से दिव्य हस्तक्षेप आकर्षित होता है, जो बताता है कि सच्ची श्रद्धा उच्च शक्तियों को बुलाती है। फूलों का ठंडे ओस जैसे गिरना आशीर्वाद का प्रतीक है जो आत्मा को शांत और पोषित करता है।

परिवार के वचन देवियों को दुःख नाशक मानते हैं और कहते हैं कि सज्जनों का स्वाभाविक कर्तव्य दूसरों की मदद करना है। यह शिक्षा देता है कि ज्ञानी या दिव्य प्राणी स्वार्थरहित होकर सबके कल्याण के लिए कार्य करते हैं।

अंत में, देवियाँ दुःख का कारण पूछती हैं, जो करुणामय सहभागिता दिखाता है। वे मानती नहीं बल्कि सुनना चाहती हैं, जो सिखाता है कि सच्ची मुक्ति दुःख की जड़—अज्ञान या आसक्ति—को समझकर और ज्ञान से दूर करके मिलती है।

कुल मिलाकर, ये श्लोक सिखाते हैं कि दुःख क्षणिक दुनिया से तादात्म्य से आता है, किंतु भक्ति से बुलाई दिव्य कृपा दुःख की मायावी प्रकृति उजागर कर आंतरिक शांति बहाल करती है, जो ग्रंथ के अद्वैत संदेश का मूल है।

No comments:

Post a Comment

अध्याय ३.५७, श्लोक २८–३७

 योगवशिष्ट ३.५७.२८–३७ (ये श्लोक बताते हैं कि जिसे हम भौतिक शरीर मानते हैं, वह वास्तव में अंतिम सत्य नहीं है, बल्कि मन की आदत और विश्वास से उ...