Wednesday, January 7, 2026

अध्याय ३.२६, श्लोक १–१०

योगवशिष्ट ३.२६.१–१०
(सांसारिक आसक्ति से उत्पन्न दुख, तथा आत्म-साक्षात्कार की मुक्तिदायक आनंद)
 
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति ते वरवर्णिन्यौ ततो ब्रह्माण्डमण्डलात् ।
निर्गत्यान्यदनुप्राप्ते यत्र तद्ब्राह्मणास्पदम् ॥ १ ॥
ततो ददृशतुः सद्म स्वमेवं सिद्धयोषितौ ।
अदृश्ये एव लोकस्य मण्डपं ब्राह्मणास्पदम् ॥ २ ॥
चिन्ताविधुरदासीकं बाष्पक्लिन्नाङ्गनामुखम् ।
विध्वस्तप्रायवदनं शीर्णपर्णाम्बुजोपमम् ॥ ३ ॥
नष्टोत्सवपुरप्रायमगस्त्यात्तमिवार्णवम् ।
ग्रीष्मदग्धमिवोद्यानं विद्युद्दग्धमिव द्रुमम् ॥ ४ ॥
वातच्छिन्नमिवाम्भोदं हिमदग्धमिवाम्बुजम् ।
अल्पस्नेहदशं दीपमिवालोकनभेदनम् ॥ ५ ॥
आसन्नमृत्युकरुणाकुलवक्त्रकान्ति संशीर्णजीर्णतरुपर्णवनोपमानम् ।
वृष्टिव्यपायपरिधूसरदेशरूक्षं जातं गृहेश्वरवियोगहतं गृहं तत् ॥ ६ ॥
अथ सा निर्मलज्ञानचिराभ्यासेन सुन्दरी ।
संपन्ना सत्यसंकल्पा सत्यकामा च देववत् ॥ ७ ॥
चिन्तयामास मामेते देवीं चेमां स्वबन्धवः ।
पश्यन्तु तावत्सामान्यललनारूपधारणीम् ॥ ८॥
ततो गृहजनस्तत्र स ददर्शाङ्गनाद्वयम्।
लक्ष्मीगौर्योर्युगमिव समुद्भासितमन्दिरम् ॥ ९ ॥
आपादविविधाम्लानमालावसनसुन्दरम् ।
वसन्तलक्ष्म्योर्युगलमिवामोदितकाननम् ॥ १० ॥


महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
३.२६.१–२
>इस प्रकार उन दो सुंदर स्त्रियों ने ब्रह्मांड के गोले से निकलकर दूसरे स्थान पर पहुँच गईं, जहाँ वह ब्राह्मण का निवास था।  
>तब उन दो सिद्ध योगिनियों ने अपना ही घर देखा, ब्राह्मण का वह भवन जो संसार के लोगों के लिए अदृश्य था।

३.२६.३–६
>चिंता से व्याकुल दासियों से भरा, स्त्रियों के आँसुओं से गीले चेहरे, अधिकांशतः नष्ट हो चुके मुख, जैसे सूखे पत्ते और कमल।  
>जैसे उत्सवहीन नगर, जैसे अगस्त्य ऋषि द्वारा पी जाने के बाद शांत समुद्र, जैसे ग्रीष्म से जला हुआ उद्यान, जैसे बिजली से दग्ध वृक्ष।  
>जैसे वायु से छिन्न भिन्न बादल, जैसे हिम से दग्ध कमल, जैसे थोड़े तेल वाला दीपक जो अंधकार को भेद न सके।  
>मृत्यु के निकट करुणामय मुखों वाली, जीर्ण पुराने वृक्षों और पत्तों के जंगल जैसी, वर्षा जाने के बाद धूल से भरी सूखी भूमि जैसी, घर के स्वामी के वियोग से पीड़ित वह गृह हो गया था।

३.२६.७  
तब वह सुंदरी निर्मल ज्ञान के दीर्घ अभ्यास से सिद्ध हो गई, सत्य संकल्प वाली और सत्य कामना वाली, देवता के समान।

३.२६.८  
उसने सोचा: मेरे ये संबंधी मुझे और इस देवी को अभी सामान्य स्त्री रूप धारण करके देखें।

३.२६.९–१० 
>तब वहाँ के गृहजन ने उन दो स्त्रियों को देखा, जैसे लक्ष्मी और गौरी का जोड़ा घर को प्रकाशित कर रहा हो। 
>पैर से सिर तक अम्लान मालाओं और वस्त्रों से सुंदर, जैसे वसंत की लक्ष्मियों का जोड़ा जंगल को सुगंधित कर रहा हो।

श्लोकों की शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये योग वासिष्ठ के श्लोक लीला और सरस्वती देवी की सूक्ष्म शरीर वाली यात्रा की कहानी को आगे बढ़ाते हैं, जो अद्वैत वेदांत के गहन सिद्धांतों को कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं।

पहले दो श्लोकों में लीला और सरस्वती एक ब्रह्मांडीय क्षेत्र से निकलकर ब्राह्मण के घर अदृश्य रूप से पहुँचती हैं। यह भौतिक जगत की मायावी प्रकृति और जागृत चेतना की सीमाओं से परे यात्रा करने की क्षमता को दर्शाता है, यह सिखाता है कि सच्ची वास्तविकता स्थूल पदार्थ से परे है।

तीसरे से छठे श्लोक तक घर में ब्राह्मण पति की मृत्यु के बाद गहन शोक का चित्रण है। सूखे कमल, जले उद्यान और मद्धम दीपक जैसे उपमाओं से यह बताते हैं कि शरीर और सांसारिक संबंधों से आसक्ति कितना दुख पैदा करती है। शिक्षा यह है कि शोक अस्थायी वस्तुओं से तादात्म्य के कारण होता है, सब कुछ क्षणभंगुर है।

सातवें श्लोक में लीला शुद्ध ज्ञान के लंबे अभ्यास से सिद्धि प्राप्त करती है, जहाँ उसकी इच्छा देवताओं की तरह सत्य हो जाती है। यह सिखाता है कि आत्मा पर स्थिर चिंतन से माया पर विजय मिलती है और संकल्प सृष्टि करने लगते हैं।

आठवें श्लोक में लीला परिवार के लिए सामान्य रूप धारण करने का निर्णय लेती है, जो आध्यात्मिक शक्तियों का करुणापूर्ण उपयोग दिखाता है। यह बताता है कि जागृत व्यक्ति बंधन में पड़े बिना जगत से संवाद कर सकता है।

अंतिम दो श्लोकों में घरवाले चमकदार स्त्रियों को देखकर आनंदित होते हैं, जो दिव्य जोड़ों जैसे घर को प्रकाशित करती हैं। पहले के अंधकार से यह विपरीत दिखाता है कि सच्चा ज्ञान अज्ञान के अंधकार को दूर कर आंतरिक प्रकाश और सामंजस्य लाता है।

कुल मिलाकर, ये श्लोक चेतना की शक्ति से प्रकट वास्तविकता को बदलने, सांसारिक आसक्ति से दुख और आत्मज्ञान से मुक्ति की शिक्षा देते हैं।

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