Sunday, December 28, 2025

अध्याय ३.२३, श्लोक ९–१६

योगवशिष्ट ३.२३.९–१६
(जो आदि में नहीं था, वह वर्तमान में भी नहीं है, भले ही वह प्रतीत होता हो। इसलिए, चाहे वह चमका हो या नहीं, जगत मरीचिका के जल के समान है)
 
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
तदा दृश्यपिशाचोऽयमलमस्तं गतो द्वयोः ।
असत्त्वादेव चास्माकं शशशृङ्गमिवानघ ॥ ९ ॥
आदावेव हि यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
भातं वाऽभातमेवातो मृगतृष्णाम्बुवज्जगत् ॥ १० ॥
स्वभावकेवलं शान्तं स्त्रीद्वयं तद्बभूव ह।
चन्द्रार्कादिपदार्थौघैर्दूरमुक्तमिवाम्बरम् ॥ ११ ॥
तेनैव ज्ञानदेहेन चचार ज्ञप्तिदेवता ।
मानुषी त्वितरेणाशु ध्यानज्ञानानुरूपिणा ॥ १२ ॥
गेहान्तरेव प्रादेशमात्रमारुह्य संविदा ।
बभूवतुश्चिदाकाशरूपिण्यौ व्योमगाकृती ॥ १३ ॥
अथ ते ललने लीलालोले ललितलोचने।
स्वभावाच्चेत्यसंवित्तेर्नभो दूरमितो गते ॥ १४ ॥
तत्रस्थे वाथ चिद्वृत्त्या पुप्लुवाते नभस्थलम् ।
कोटियोजनविस्तीर्णं दूराद्दूरतरान्तरम् ॥ १५ ॥
दृश्यानुसन्धाननिजस्वभावादाकाशदेहे अपि ते मिथोऽत्र ।
परस्पराकारविलोकनेन बभूवतुः स्नेहपरे वयस्ये ॥ १६ ॥

३.२३.९
महर्षि वशिष्ठ आगे बोले:
तब दोनों के लिए यह दृश्य रूपी पिशाच पूरी तरह समाप्त हो गया। हे निष्पाप, यह केवल असत्य होने से ही गायब हुआ, जैसे खरगोश के सींग।

३.२३.१०
जो आदि में नहीं होता, वह वर्तमान में भी वैसा ही रहता है। चाहे भासित हुआ या नहीं, इसलिए जगत मृगतृष्णा के जल जैसा है।

३.२३.११
वह दोनों स्त्रियाँ स्वभाव से ही शांत और एकमात्र शुद्ध हो गईं, जैसे चन्द्र-सूर्य आदि पदार्थों के समूह से मुक्त आकाश।

३.२३.१२
उसी ज्ञान देह से चेतना की देवी विचरण करने लगीं। लेकिन दूसरी देह से शीघ्र ही ध्यान और ज्ञान के अनुरूप मानुषी रूप में चलीं।

३.२३.१३
महल के अंदर ही संवित् से मात्र प्रादेश भर ऊपर उठकर दोनों चिदाकाश रूपिणी और आकाश जैसी आकृति वाली हो गईं।

३.२३.१४ 
अथ हे लीला नाम वाली सुंदरियों, ललित नेत्रों वाली, खेलपूर्ण दृष्टि वाली, स्वभाव से जब चित्त की संवित्ति का आकाश यहाँ से दूर चला गया,

३.२३.१५ 
वहाँ स्थित होकर चित्त की वृत्ति से कोटि योजन विस्तीर्ण नभस्थल में उछल पड़ीं, दूर से भी दूरतर अंतर वाले।

३.२३.१६
दृश्य के अनुसंधान और निज स्वभाव से आकाश देह में भी यहाँ दोनों परस्पर आकार देखने से स्नेहपूर्ण मित्र जैसी हो गईं।

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक रानी लीला और देवी सरस्वती की गहन आध्यात्मिक अनुभूति का वर्णन करते हैं। "दृश्य जगत" — जो ठोस और वास्तविक लगता है — एक भ्रम मात्र है, जैसे पिशाच जो अपनी असत्यता समझते ही गायब हो जाता है। जैसे खरगोश के सींग कभी होते ही नहीं, वैसे जगत का आदि-अंत में अस्तित्व नहीं है। यह अद्वैत की मुख्य शिक्षा है कि दिखने वाला संसार निरपेक्ष रूप से असत्य है, केवल झूठी कल्पना से उत्पन्न।

भ्रामक जगत के विलय से लीला और सरस्वती शुद्ध, स्वाभाविक शांति की अवस्था में पहुँच जाती हैं। वे साफ आकाश जैसे हो जाती हैं, जिसमें सूर्य-चन्द्र आदि कोई वस्तु नहीं। यह सभी द्वैतों और आसक्तियों से मुक्ति का प्रतीक है, जहाँ मन अपनी मूल प्रकृति में विश्राम करता है — असीम चेतना के रूप में।

सरस्वती, शुद्ध चेतना की देवी होने से, ज्ञान देह में स्वतंत्र विचरण करती हैं, जबकि ध्यान-सिद्ध मानव रूप धारण करती हैं। दोनों चेतना के आंतरिक आकाश में सूक्ष्म रूप से ऊपर उठती हैं और शुद्ध चेतना के रूप में बदल जाती हैं — विशाल, निराकार और आकाश-समान। यह योग प्रक्रिया दर्शाती है कि ध्यान से स्थूल को पार कर सूक्ष्म लोकों में प्रवेश होता है।

जब मानसिक संकल्प और विचार दूर चले जाते हैं, तो लीला और सरस्वती असीम चेतना आकाश में उछल पड़ती हैं, करोड़ों योजन की दूरी आसानी से तय करती हैं। उनकी देहें आकाशीय हो जाती हैं, फिर भी वे एक-दूसरे को देखकर गहन स्नेहपूर्ण मित्रता विकसित करती हैं। यह दिखाता है कि अद्वैत अनुभूति में भी संबंध स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं, बिना बंधन के।

कुल मिलाकर, ये श्लोक अद्वैत की शिक्षा देते हैं: जगत असत्य है और सच्चे ज्ञान से विलीन हो जाता है, केवल शांत चेतना रह जाती है। ध्यान और अंतर्दृष्टि से सीमित रूपों को पार कर असीम चेतना में स्थित होते हैं, जहाँ सभी अनुभव — स्नेह सहित — स्वतः होते हैं बिना आसक्ति के। यह मुक्ति का मार्ग है, जहाँ परम वास्तविकता शुद्ध, असीम चेतना है सभी भेदों से परे।

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