योगवशिष्ट ३.२२.१०–२०
(जैसे स्वप्न या कल्पना की घटनाएँ असत्य होती हैं, वैसे ही जन्म और मृत्यु मन के प्रक्षेपित संसार में मात्र प्रतीतियाँ हैं)
श्रीदेव्युवाच ।
आतिवाहिकतां यातं बुद्धं चित्तान्तरैर्मनः ।
सर्गजन्मान्तरगतैः सिद्धैर्मिलति नेतरत् ॥ १० ॥
यदा तेऽयमहंभावः स्वभ्यासाच्छान्तिमेष्यति ।
तदोदेष्यति ते स्फारादृश्यान्ता बोधता स्वयम् ॥ ११ ॥
आतिवाहिकताज्ञानं स्थितिमेष्यति शाश्वतीम् ।
यदा तदा ह्यसंकल्पाँल्लोकान्द्रक्ष्यसि पावनान् ॥ १२ ॥
वासनातानवे तस्मात्कुरु यत्नमनिन्दिते।
तस्मिन्प्रौढिमुपायाते जीवन्मुक्ता भविष्यसि ॥ १३ ॥
यावन्न पूरितस्त्वेष शीतलो बोधचन्द्रमाः ।
तावद्देहमवस्थाप्य लोकान्तरमवेक्ष्यताम् ॥ १४ ॥
मांसदेहो मांसदेहेनैव संश्लेषमेष्यति।
नतु चित्तशरीरेण व्यवहारेषु कर्मसु ॥ १५ ॥
यथानुभव मे वैतद्यथास्थितमुदाहृतम् ।
आबालसिद्धसंसिद्धं न नाम वरशापवत् ॥ १६ ॥
अवबोधघनाभ्यासाद्देहस्यास्यैव जायते।
संसारवासनाकार्श्ये नूनं चित्तशरीरता ॥ १७ ॥
उदेष्यन्ती च सैवात्र केनचिन्नोपलक्ष्यते।
केवलं तु जनैर्देहो म्रियमाणोऽवलोक्यते ॥ १८ ॥
देहस्त्वयं न म्रियते न च जीवति किंच ते ।
के किल स्वप्नसंकल्पभ्रान्तौ मरणजीविते ॥ १९ ॥
जीवितं मरणं चैव संकल्पपुरुषे यथा।
असत्यमेव भात्येव तस्मिन्पुत्रि शरीरके ॥ २० ॥
३.२२.१०–१३
देवी सरस्वती आगे बोलीं:
मन जो आतिवाहिक अवस्था को प्राप्त हो जाता है, वह पिछले सर्गों और जन्मों के सिद्ध पुरुषों से अन्य मन में मिलता है, अन्यथा नहीं।
जब यह अहंभाव अभ्यास से शांत हो जाएगा, तब तुममें स्वयं ही विशाल आत्मबोध उदय होगा।
जब आतिवाहिक ज्ञान शाश्वत रूप से स्थिर हो जाएगा, तब तुम संकल्परहित पवित्र लोकों को देखोगी।
इसलिए हे निष्पापे, वासना के जाल को कम करने का प्रयत्न करो। जब वह प्रयत्न परिपक्व हो जाएगा, तब तुम जीवन्मुक्त हो जाओगी।
३.२२.१४–१६
जब तक यह शीतल बोधचंद्रमा पूर्ण न हो जाए, तब तक इस देह को बनाए रखकर अन्य लोकों को देखो।
मांस का देह केवल मांस के देह से ही संयोग करता है, चित्तशरीर से कर्मों और व्यवहारों में नहीं।
जैसा मैंने बताया है, वैसा ही इसका अनुभव करो। यह बाल्य से ही सिद्ध पुरुषों द्वारा साधित होता है, न कि शाप-वरण की तरह।
३.२२.१७–१८
देह के इसी अभ्यास से घने बोध के कारण संसार वासना के क्षीण होने पर निश्चय ही चित्तशरीरता उत्पन्न होती है।
वह यहीं उदय होती है, पर किसी को दिखाई नहीं देती। केवल लोग मरते हुए देह को देखते हैं।
३.२२.१९–२०
हे, यह देह न मरता है न जीता है। स्वप्न और संकल्प की भ्रांति में मरण और जीवन क्या हैं?
जैसे संकल्प पुरुष में जीवन और मरण असत्य ही प्रतीत होते हैं, वैसे ही हे पुत्री, इस शरीर में।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये श्लोक देवी सरस्वती द्वारा रानी लीला को दिए गए हैं, जो सूक्ष्म शरीर (आतिवाहिक) की प्रकृति, स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद सिद्ध आत्मा के संक्रमण और जीवन्मुक्ति के मार्ग की व्याख्या करते हैं।
प्रथम श्लोक समूह (१०-१३) बताता है कि सूक्ष्म शरीर में परिवर्तित मन पिछले सृष्टियों के सिद्धों से अन्य मन में मिलता है। निरंतर अभ्यास से अहंकार शांत होता है, जिससे विशाल आत्मबोध स्वतः उदित होता है। यह ज्ञान शाश्वत स्थिर होकर कल्पनारहित शुद्ध लोकों का दर्शन कराता है। मुख्य उपदेश है वासनाओं को कम करने का प्रयास करना, जिससे जीवित अवस्था में ही मुक्ति मिलती है।
अगले श्लोक (१४-१६) पूर्ण ज्ञान तक स्थूल देह बनाए रखने की सलाह देते हैं, जैसे चंद्रमा के पूर्ण होने की प्रतीक्षा। स्थूल देह केवल स्थूल जगत से ही संयोग करता है, सूक्ष्म से नहीं। यह परिवर्तन आजीवन साधना का स्वाभाविक फल है, न कि कोई जादुई वरदान या शाप।
श्लोक १७-१८ में कहा गया है कि गहन बोधाभ्यास से संसार वासनाएं क्षीण होकर इसी स्थूल देह से सूक्ष्म चित्तशरीर उत्पन्न होता है। यह किसी को दिखाई नहीं पड़ता, लोग केवल स्थूल देह की मृत्यु देखते हैं।
अंत में श्लोक १९-२० बताते हैं कि देह वास्तव में न मरता है न जीता। स्वप्न और कल्पना की भांति जीवन-मृत्यु मात्र भ्रम हैं। सच्चा ज्ञान इन भ्रमों से परे देखता है।
कुल मिलाकर ये शिक्षाएं वासनाओं का क्षय और बोध की साधना पर जोर देती हैं, शरीर और जगत को स्वप्नवत् मानकर सूक्ष्म शरीर से सचेत संक्रमण की बात करती हैं।
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