Monday, December 22, 2025

अध्याय ३.२१, श्लोक ५८–६८

योगवशिष्ट ३.२१.५८–६८
(सांसारिक रूप, जैसे सोने से बने कंगन या जल से बनी तरंगें, कल्पना के बाहर कोई स्वतंत्र वास्तविकता नहीं रखते)
 
श्रीदेव्युवाच ।
यदस्ति नाम तत्रैव नाशानाशक्रमो भवेत् ।
वस्तुतो यच्च नास्त्येव नाशः स्यात्तस्य कीदृशः ॥ ५८ ॥
रज्ज्वां सर्पभ्रमे नष्टे सत्यबोधवशात्सुते।
सर्पो न नष्ट उन्नष्टो वेत्येवं कैव सा कथा ॥ ५९ ॥
यथा सत्यपरिज्ञानाद्रज्ज्वा सर्पो न दृश्यते ।
तथातिवाहिकज्ञानाद्दृश्यते नाधिभौतिकः ॥ ६० ॥
कल्पनापि निवर्तेत कल्पिता यदि केनचित् ।
सा शिला समपास्तैव या नेहास्ति कदाचन ॥ ६१ ॥
परं परे परापूर्णमिदं देहादिकं स्थितम् ।
इति सत्यं वयं भद्रे पश्यामो नाभिपश्यसि ॥ ६२ ॥
आदिसर्गे भवेच्चित्त्वं कल्पनाकल्पितं यदा ।
तदा ततः प्रभृत्येकसत्त्वं दृश्यमवेक्षते ॥ ६२ ॥

लीलोवाच ।
एकस्मिन्नेव संशान्ते दिक्कालाद्यविभागिनि ।
विद्यमाने परे तत्त्वे कलनावसरः कुतः ॥ ५४ ॥

श्रीदेव्युवाच ।
कटकत्वं यथा हेम्नि तरङ्गत्वं यथाम्भसि ।
सत्यत्वं च यथा स्वप्नसंकल्पनगरादिषु ॥ ६५ ॥
नास्त्येव सत्यनुभवे तथा नास्त्येव ब्रह्मणि ।
कल्पनाव्यतिरिक्तात्मतत्स्वभावादनामयात् ॥ ६६ ॥
यथा नास्त्यम्बरे पांसुः परे नास्ति तथा कला ।
अकलाकलनं शान्तमिदमेकमजं ततम् ॥ ६७ ॥
यदिदं भासते किंचित्तत्तस्येव निरामयम् ।
कचनं काचकस्येव कान्तस्याऽतिमणेरिव ॥ ६८ ॥

३.२१.५८–६१ 
देवी सरस्वती बोलीं:
जो वस्तु वास्तव में है, उसी में उत्पत्ति और नाश का क्रम होता है। लेकिन जो वास्तव में है ही नहीं, उसके लिए नाश कैसा?  
रस्सी में साँप की भ्रांति सत्य ज्ञान से नष्ट हो जाने पर, हे सुते, साँप न तो नष्ट हुआ और न अनष्ट। फिर उसकी क्या कथा है?  
जैसे सत्य के सही ज्ञान न होने से रस्सी में साँप नहीं दिखता, वैसे ही अतिवाहिक (सूक्ष्म) ज्ञान से आधिभौतिक (स्थूल) शरीर नहीं दिखता।  
कल्पना भी यदि किसी द्वारा त्याग दी जाए तो वह निवृत्त हो जाती है। वह ऐसी शिला है जो यहाँ कभी थी ही नहीं और पूरी तरह हटा दी गई।

३.२१.६२–६४
यह देह आदि पर से परे, पूर्ण परमें स्थित है। हे भद्रे, यह सत्य हम देखते हैं, तुम नहीं देखतीं।  
आदि सर्ग में जब चित्त कल्पना से कल्पित होकर उत्पन्न होता है, तब से एक सत्ता वाला दृश्य देखा जाता है।
लीला बोलीं :
एक ही में सब शांत होकर, दिक्-काल आदि के विभाग रहित पर तत्त्व में विद्यमान होने पर कल्पना का अवसर कहाँ?

३.२१.६५–६८
देवी सरस्वती बोलीं:
जैसे सोने में कंकणत्व, जल में तरंगत्व, स्वप्न और संकल्प नगर आदि में सत्यत्व;  
सत्य अनुभव में वैसा बिल्कुल नहीं है। ब्रह्म में भी कल्पना से अलग, उसके स्वभाव से जो अनामय है, वैसा बिल्कुल नहीं है।  
जैसे आकाश में धूल नहीं, परे में कल्पना नहीं। अकला कलन से शांत, यह एक अजन्मा, व्याप्त है।  
यहाँ जो कुछ भी भासता है, वह उसी निरामय का है—काच में काचक की भाँति, अतिमणि की कान्ति की तरह।

शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
ये योगवाशिष्ठ के श्लोक लीला और ज्ञान की देवी (सरस्वती) के संवाद का भाग हैं, जो अद्वैत वेदांत की गहन शिक्षा देते हैं कि जगत मिथ्या है और ब्रह्म ही सत्य है।

पहले श्लोकों (५८-६१) में रस्सी-सर्प भ्रम का उदाहरण देकर बताया गया है कि सच्ची वस्तु (ब्रह्म) में जन्म-मृत्यु नहीं होता, केवल भासमान वस्तुओं में। सर्प भ्रम कभी था ही नहीं, इसलिए उसका नाश भी नहीं। ज्ञान से भ्रम मिटता है, स्थूल जगत सूक्ष्म मन की कल्पना मात्र है, और कल्पना को असत्य जानकर त्यागने से वह समाप्त हो जाती है।

अगले श्लोकों (६२-६४) में ज्ञानी लोग देह और जगत को परम पूर्ण ब्रह्म में ही स्थित देखते हैं, जबकि अज्ञानी नहीं। सृष्टि के आदि में मन की कल्पना से जगत एक सत्ता वाला लगता है। लीला का प्रश्न है कि जब सब एक अविभाजित ब्रह्म में शांत है, तो कल्पना कहाँ से आए?

देवी जवाब देती हैं (६५-६८) कि सोने में कंगन, जल में तरंग, स्वप्न में नगर की सत्यता जैसे इस जगत की सत्यता कल्पना मात्र है, वास्तविक अनुभव में नहीं। ब्रह्म कल्पना से परे, रोगरहित है। आकाश में धूल नहीं जैसे परम में कल्पना नहीं। सब जो दिखता है, वह उसी एक अजन्मा, शांत ब्रह्म का भास है।

कुल मिलाकर ये शिक्षाएँ बताती हैं कि जगत मन की कल्पना है, ब्रह्म पर प्रतिबिंबित। ज्ञान से कल्पना त्यागकर ब्रह्म में विश्रांति ही मुक्ति है। यह अद्वैत दृष्टि देह, जगत और अहंकार की कठोरता को मिटाकर शांति देती है।

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