योगवशिष्ट ३.२१.८–१६
(मोक्ष को विश्व की पूर्ण विस्मृति बताया गया है, जहाँ कोई इच्छा-अनिच्छा नहीं रहती)
श्रीदेव्युवाच ।
कदाचित्स्मृतितां त्यक्त्वा प्रतिभामात्रमेव सत् ।
भाति प्रथमसर्गेषु रूपेण तदनुक्रमात् ॥ ८ ॥
दृश्यं त्रिभुवनादीदमनुभूतं स्मृतौ स्थितम् ।
केषांचित्तन्वि केषांचिन्नानुभूतं स्मृतौ स्थितम् ॥ ९ ॥
प्रतिभासत एवेदं केषांचित्सरणं विना ।
चिदणूनां प्रजेशत्वं काकतालीयवद्यतः ॥ १० ॥
अत्यन्तविस्मृतं विश्वं मोक्ष इत्यभिधीयते ।
ईप्सितानीप्सिते तत्र न स्तः काचन कस्यचित् ॥ ११ ॥
अत्यन्ताभावसंपत्तिं विनाहन्ताजगत्स्थितेः ।
अनुत्पादमयी ह्येषा नोदेत्येव विमुक्तता ॥ १२ ॥
रज्ज्वां सर्पभ्रमः सर्पशब्दार्थासंभवं स्थितम् ।
अनुत्पादमयं त्यक्त्वा शान्तोऽपि हि न शाम्यति ॥ १३ ॥
अर्धशान्तो न शान्तोऽसौ समेत्यर्थतया पुनः ।
उदेत्येकपिशाचान्ते पिशाचोऽन्यो ह्यधीमतः ॥ १४ ॥
संसारश्चायमाभोगी परमेवेति निश्चयः ।
कारणाभावतो भाति यदिहाभातमेव तत् ॥ १५ ॥
लीलोवाच ।
ब्राह्मणब्राह्मणीरूपे सर्गे कारणसंस्मृतिः।
कथमभ्युत्थिता सास्य स्मरणीयमिदं विना ॥ १६ ॥
देवी सरस्वती आगे बोलीं:
३.२१.८
कभी-कभी स्मृति को त्यागकर केवल प्रतिभा मात्र ही सत् रूप में चमकता है। प्रथम सर्गों में रूप से भासित होता है, फिर क्रमशः अनुक्रम से।
३.२१.९
तीन लोकों से शुरू होने वाला यह दृश्य जगत कुछ लोगों द्वारा अनुभव किया गया है और स्मृति में स्थित है; कुछ के लिए सूक्ष्म है, कुछ के लिए अनुभव नहीं किया गया लेकिन स्मृति में स्थित है।
३.२१.१०
कुछ चित् कणों के लिए केवल प्रतिभास से ही, बिना किसी क्रम के, प्रजा के ईश्वरत्व की प्राप्ति होती है, जैसे कौए और ताड़ के फल का संयोग संयोगवश।
३.२१.११
विश्व की अत्यन्त विस्मृति को मोक्ष कहा जाता है। उसमें किसी के लिए कोई इष्ट या अनिष्ट नहीं रहता।
३.२१.१२
अहंता और जगत की स्थिति के बिना अत्यन्त अभाव की संपत्ति ही यह मुक्ति है, जो अनुत्पादमयी है, इसलिए उदय नहीं होती।
३.२१.१३
रस्सी में सर्प की भ्रान्ति सर्प शब्द के अर्थ की संभावना रहते तक रहती है। अनुत्पादमय को त्यागकर शान्त होने पर भी वह पूरी तरह शान्त नहीं होती।
३.२१.१४
वह अर्धशान्त है, पूर्ण शान्त नहीं। अर्थ से मिलने पर फिर उदय होता है, जैसे एक पिशाच के अंत में बुद्धिमान के मन में दूसरा पिशाच उठता है।
३.२१.१५
यह संसार ही परम भोगी है ऐसा निश्चय। कारण के अभाव से जो यहां भासित है वह वास्तव में भासित नहीं है।
महारानी लीला बोलीं:
३.२१.१६
ब्राह्मण और ब्राह्मणी रूप वाले इस सर्ग में उसके लिए कारण की संस्मृति कैसे उठी, बिना किसी स्मरणीय के।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश:
पहले श्लोक समूह (८-१०) में सृष्टि की प्रकृति को समझाया गया है कि आदि सृष्टियाँ बिना पूर्व स्मृति के केवल शुद्ध प्रतिभा (भास) से उत्पन्न होती हैं। जगत का अनुभव जीवों के अनुसार भिन्न होता है—कुछ के लिए स्पष्ट स्मृति में, कुछ के लिए सूक्ष्म या बिना अनुभव के भी स्मृति में। कुछ चेतन कणों को संयोग से ही सृष्टि का स्वामित्व मिल जाता है, जो संयोगमात्र है।
श्लोक ११-१२ में मोक्ष को विश्व की पूर्ण विस्मृति बताया गया है, जहाँ कोई इच्छा-अनिच्छा नहीं रहती। मोक्ष कोई प्राप्त करने वाली वस्तु नहीं, बल्कि अहंता और जगत के अभाव की स्वाभाविक स्थिति है, जो उत्पत्तिरहित होने से कभी उदित नहीं होती।
श्लोक १३-१४ में रज्जु-सर्प भ्रम का उदाहरण देकर बताया गया कि जगत भ्रम आंशिक शान्ति के बाद भी अर्थ से जुड़कर पुनः उठ सकता है, जैसे एक भ्रम के बाद दूसरा।
श्लोक १५ में संसार को परम तत्त्व ही बताया, लेकिन कारणहीन होने से उसका भासना वास्तव में अभासना है—जो दिखता है वह है नहीं।
अंतिम श्लोक (१६) में लीला का प्रश्न है कि ब्राह्मणी रूप में कारण स्मृति कैसे जागी बिना स्मरणीय वस्तु के, जो भ्रम की निराधार निरंतरता की ओर इशारा करता है।
कुल मिलाकर ये श्लोक जगत और अहंकार की स्मृति-आधारित मायामय प्रकृति, सृष्टि की संयोगमयता और मोक्ष को अनुत्पत्ति स्वरूप निराधार शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति बताते हैं।
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