योगवशिष्ट ३.२०.३१–४१
(स्वप्न की भांति, द्रष्टा तथा दृष्ट संसार दोनों चेतना मात्र हैं)
श्रीदेव्युवाच ।
अनुभूय क्षणं जीवो मिथ्यामरणमूर्च्छनम् ।
विस्मृत्य प्राक्तनं भावमन्यं पश्यति सुव्रते ॥ ३१ ॥
तदेवोन्मेषमात्रेण व्योम्न्येव व्योमरूप्यपि ।
आधेयोऽयमिहाधारे स्थितोऽहमिति चेतति ॥ ३२ ॥
हस्तपादादिमान्देहो ममायमिति पश्यति ।
यदेव चेतति वपुस्तदेवेदं स पश्यति ॥ ३३ ॥
एतस्याहं पितुः पुत्रो वर्षाण्येतानि सन्ति मे ।
इमे मे बान्धवा रम्या ममेदं रम्यमास्पदम् ॥ ३४ ॥
जातोऽहमभवं बालो वृद्धिं यातोऽहमीदृशः ।
बान्धवाश्चास्य मे सर्वे तथैव विचरन्त्यमी ॥ ३५ ॥
चित्ताकाशघनैकत्वात्स्वेऽप्यन्येऽपि भवन्ति ते ।
एवं नामोदितेऽप्यस्य चित्ते संसारखण्डके ॥ ३६ ॥
न किंचिदप्यभ्युदितं स्थितं व्योमैव निर्मलम् ।
स्वप्ने द्रष्टरि यद्वच्चित्तद्वद्दृश्ये चिदेव सा ॥ ३७ ॥
सर्वगैकतया यस्मात्सा स्वप्ने दृष्टदर्शना ।
यथा स्वप्ने तथोदेति परलोकदृगादिभिः ॥ ३८ ॥
परलोके यथोदेति तथैवेहाभ्युदेति सा ।
तत्स्वप्नपरलोकेह लोकानामसतां सताम् ॥ ३९ ॥
न मनागपि भेदोऽस्ति वीचीनामिव वारिणि ।
अतो जातमिदं विश्वमजातत्वादनाशि च ॥ ४० ॥
स्वरूपत्वात्तु नास्त्येव यच्च भाति चिदेव सा ।
यथैव चेत्यनिर्हीणा परमव्योमरूपिणी ॥ ४१ ॥
देवी सरस्वती आगे बोलीं:
३.२०.३१
जीव क्षण भर के लिए मिथ्या मृत्यु और मूर्च्छा का अनुभव करता है, पूर्व भाव को भूल जाता है और दूसरा देखता है, हे सुव्रते।
३.२०.३२
उसी उन्मेष मात्र से, आकाश में आकाश रूप के समान, यह चिंतन करता है कि मैं यह आधेय इस आधार में स्थित हूँ।
३.२०.३३–३५
हाथ-पैर आदि वाला यह देह मेरा है ऐसा देखता है। जो वपु चिंतन करता है, वही यह देखता है। मैं इस पिता का पुत्र हूँ, मेरे ये इतने वर्ष हैं, ये मेरे रमणीय बांधव हैं, यह मेरा रमणीय निवास है। मैं जन्मा, बालक हुआ, इस प्रकार बड़ा हुआ। मेरे सभी बांधव भी इसी तरह व्यवहार करते हैं।
३.२०.३६–३७
चित्त-आकाश की घनता से एकत्व के कारण अपने में भी दूसरे हो जाते हैं। इस प्रकार इसके चित्त नामक संसार खंड में उदित होने पर भी, कुछ भी उदित नहीं हुआ, केवल निर्मल व्योम ही स्थित है। स्वप्न में द्रष्टा के लिए जैसे चित्त, वैसे ही दृश्य में वह चेतना ही है।
३.२०.३८
सर्वगत एकता से वह स्वप्न में दृष्ट का दर्शक है। स्वप्न जैसे उदित होता है वैसे परलोक दृश्य आदि से उदित होता है।
३.२०.३९–४१
परलोक में जैसे उदित होता है वैसे ही यहाँ उदित होता है। इसलिए स्वप्न, परलोक और इस लोक में लोकों के असत् और सत् में, जल में तरंगों जैसा भी थोड़ा भेद नहीं है। इसलिए यह विश्व अजात होने से अनाशी है। स्वरूप से तो अस्तित्व ही नहीं है, जो भासता है वह चेतना ही है, जैसे चैत्य रहित परम व्योम रूपिणी।
शिक्षाओं का विस्तृत सारांश
ये योगवासिष्ठ के श्लोक देवी सरस्वती द्वारा कहे गए हैं, जो पुनर्जन्म और संसार की मिथ्या प्रकृति की व्याख्या करते हैं तथा सब कुछ शुद्ध चेतना से उत्पन्न होने पर बल देते हैं, ठीक स्वप्न की तरह।
प्रथम भाग में जीव (व्यक्तिगत आत्मा) क्षणिक मिथ्या मृत्यु का अनुभव करता है, पूर्व अस्तित्व भूल जाता है और तुरंत नए शरीर तथा जीवन से तादात्म्य कर लेता है। वह हाथ-पैर, परिवार, आयु और संपत्ति को अपना मानकर व्यक्तिगत इतिहास तथा संबंधों की भावना बनाता है जो वास्तविक लगते हैं किंतु प्रत्येक बार नई कल्पना मात्र हैं।
यह तादात्म्य नए अवस्था में 'जागरण' पर तुरंत होता है, जैसे खाली आकाश में रूप प्रकट होना। मन घन होने से सगे-संबंधी तथा संसार को अपने विस्तार के रूप में प्रक्षेपित करता है, किंतु वास्तव में कुछ नया उत्पन्न नहीं होता—अधिष्ठान आकाश (चेतना) शुद्ध एवं अपरिवर्तित रहता है।
श्लोक इसे स्वप्न से तुलना करते हैं: द्रष्टा तथा दृष्ट संसार दोनों चेतना मात्र हैं। स्वप्न, परलोक तथा इस जागृत जीवन के अनुभवों में मूलभूत भेद नहीं—सब एक अविभाजित चेतना में भासमान हैं।
अंत में संसार का वास्तविक जन्म नहीं अतः विनाश नहीं; वह भासता तो है किंतु अस्तित्व नहीं, उसका सार विचार-शून्य अनंत चेतना मात्र है। यह अद्वैत सत्य सिखाता है जहाँ प्रकट बहुलता माया है। सच्ची मुक्ति इसी पहचान से है: प्रकट व्यक्तिगत जीवन चक्र मिथ्या प्रक्षेप है, शुद्ध जागरूकता में विश्रांति से माया का चक्र समाप्त हो जाता है।
No comments:
Post a Comment