योगवशिष्ट ३.२०.१३–२१
(पुरानी स्मृति मिट जाती है और नई स्मृति जाग जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे एक स्वप्न से जागकर दूसरा स्वप्न शुरू हो जाता है)
श्रीदेव्युवाच ।
नाहं मिथ्या वदामीदं यथावच्छृणु सुन्दरि ।
भेदनं नियतीनां हि क्रियते नास्मदादिभिः ॥ १३ ॥
विभिद्यमानामन्येन स्थापयाम्यहमेव याम् ।
मर्यादां तां मया भिन्नां कोऽपरः पालयिष्यति ॥ १४ ॥
सग्रामद्विजजीवात्मा तस्मिन्नेव स्वसद्मनि ।
व्योम्न्येवेदं महाराष्ट्रं व्योमात्मैव प्रपश्यति ॥ १५ ॥
प्राक्तनी सा स्मृतिर्लुप्ता युवयोरुदितान्यथा ।
स्वप्ने जाग्रत्स्मृतिर्यद्वदेतन्मरणमङ्गने ॥ १६ ॥
यथा स्वप्ने त्रिभुवनं संकल्पे त्रिजगद्यथा।
यथा कथार्थसंग्रामो मरुभूमौ जलं यथा ॥ १७ ॥
तस्य ब्राह्मणगेहस्य सशैलवनपत्तना ।
इयमन्तः स्थिता भूमिः संकल्पादर्शयोरिव ॥ १८ ॥
असत्यैवेयमाभाति सत्येव घनसर्गता ।
तस्मात्सत्यावभासस्य चिद्व्योम्नः कोशकोटरे ॥ १९ ॥
असत्याद्यत्समुत्पन्नं स्मृत्या नाम तदप्यसत् ।
मृगतृष्णातरङ्गिण्यां तरङ्गोऽपि न सद्यतः ॥ २० ॥
इदं त्वदीयं सदनं तद्गेहाकाशकोशगम्।
विद्धि मां त्वां च सर्वं च तच्चिद्व्योमैव केवलम् ॥ २१ ॥
३.२०.१३
श्री देवी बोलीं − हे सुन्दरी, मैं झूठ कुछ भी नहीं बोल रही हूँ। ठीक से सुनो। नियति की सीमाएँ न मैं तोड़ती हूँ, न मेरे जैसे कोई और।
३.२०.१४
जब कोई दूसरी शक्ति नियति को तोड़ने की कोशिश करती है, उसी सीमा को मैं स्वयं ही फिर से स्थापित कर देती हूँ। मैंने जिसे तोड़ा और फिर जोड़ा, उसे दूसरा कौन बचा सकता है?
३.२०.१५
उस ब्राह्मण की आत्मा अपने ग्राम और सभी लोगों सहित अपने ही घर में रहती है और प्रदेश को खाली आकाश की तरह चैतन्य आकाश में ही देखती है।
३.२०.१६
तुम दोनों की पुरानी स्मृति लुप्त हो गई और नई स्मृति दूसरी तरह जाग गई। हे अंगेने, यह ठीक वैसा ही है जैसे स्वप्न से जागना − इसे ही मृत्यु समझो।
३.२०.१७
जैसे स्वप्न में तीनों लोक दिखते हैं, जैसे संकल्प में तीनों जगत् बन जाते हैं, जैसे कहानी में युद्ध दिखता है, जैसे मरुस्थल में जल दिखता है −
३.२०.१८
उसी प्रकार उस ब्राह्मण के घर के भीतर ही यह सारी पर्वत-वन-नगर वाली पृथ्वी दर्पण में प्रतिबिम्ब की तरह स्थित है।
३.२०.१९
यह जगत् असत्य होते हुए भी दिखता है और सत्य-सा घना लगता है। इसलिए जो चेतना-आकाश सत्य की तरह चमकता है, उसके कोष में −
३.२०.२०
जो कुछ भी असत् से उत्पन्न हुआ है, स्मृति में आने पर वह भी असत् ही है। मृगतृष्णा की नदी में उठने वाली तरंग भी सत्य नहीं होती।
३.२०.२१
तेरा यह महल, उस ब्राह्मण के घर का भीतरी आकाश, तू, मैं, और सब कुछ − केवल चिदाकाश ही है, ऐसा जान ले।
उपदेश का विस्तृत सारांश:
देवी, रानी चूड़ाला और राजा शिखिध्वज को अद्वैत का सर्वोच्च तत्त्व समझा रही हैं। वे कहती हैं कि मैं कभी झूठ नहीं बोलती। नियति की सीमाएँ कोई नहीं तोड़ सकता, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। अगर कोई शक्ति नियति को तोड़ने की कोशिश करती है तो मैं स्वयं ही उसे फिर से स्थापित कर देती हूँ। इससे स्पष्ट होता है कि सारा खेल एक ही चैतन्य में हो रहा है, उसके बाहर कुछ भी नहीं।
फिर देवी बताती हैं कि यह सारा प्रदेश, पर्वत, जंगल, नगर, राजमहल − सब कुछ बहुत पहले के एक ब्राह्मण के चित्त में ही बना हुआ है। जैसे स्वप्न में नगर दिखते हैं, जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब बनता है, ठीक वही यह जगत् है − केवल चित्त की कल्पना।
पुरानी स्मृति मिट जाती है और नई स्मृति जाग जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे एक स्वप्न से जागकर दूसरा स्वप्न शुरू हो जाता है। जो हम अभी सत्य मान रहे हैं, वह भी एक स्वप्न ही है और पुराना स्वप्न मर चुका है। स्वप्न के तीन लोक, कहानी का युद्ध, मरुओं में जल − ये सब उदाहरण हैं कि दिखने वाली चीज़ सत्य नहीं होती।
अंत में देवी कहती हैं कि असत् से जो कुछ भी पैदा हुआ, वह स्मृति में आने पर भी असत् ही रहता है। मृगतृष्णा की नदी में लहर भी सचमुच जल नहीं होती। इसलिए यह महल, वह ब्राह्मण का घर, तुम, मैं, सारा जगत् − केवल एक चिदाकाश ही है।
इस उपदेश से द्वैत का अंतिम अंश भी मिट जाता है। न कोई सच्चा जगत् है, न अलग नियति है, न अलग व्यक्ति हैं − केवल एक चमकता हुआ खाली चैतन्य-आकाश है जो अनगिनत रूपों में अपने आप को देख रहा है।
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