Thursday, December 11, 2025

अध्याय ३.२०, श्लोक १–१२

योगवशिष्ट ३.२०.१–१२
(यह जीव कुछ नहीं, केवल चेतना का आकाश है जिस पर भ्रम की परत चढ़ी हुई है)

श्रीदेव्युवाच ।
स ते भर्ताद्य संपन्नो द्विजो भूपत्वमागतः ।
या सावरुन्धती नाम ब्राह्मणी सा त्वमङ्गने ॥ १ ॥
इहेमौ कुरुतो राज्यं तौ भवन्तौ सुदम्पती ।
चक्रवाकाविव नवौ भुवि जातौ शिवाविव ॥ २ ॥
एष ते कथितः सर्वः प्राक्तनः संसृतिक्रमः ।
भ्रान्तिमात्रकमाकाशमेवं जीवस्वरूपधृक् ॥ ३ ॥
भ्रमादस्माच्चिदाकाशे भ्रमोऽयं प्रतिबिम्बितः ।
असत्य एव वा सत्यो भवतोर्भवभङ्गदः ॥ ४ ॥
तस्माद्भान्तिमयः कः स्यात्कोवा भ्रान्त्युज्झितो भवेत् सर्गो निरर्गलानर्थबोधान्नान्यो विजृम्भते ॥ ५॥

श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्याकर्ण्य चिरं चारु विस्मयोत्फुल्ललोचना ।
भूत्वोवाच वचो लीला लीलालसपदाक्षरम् ॥ ६ ॥

लीलोवाच ।
देवि भोस्त्वद्वचो मिथ्या कथं संपन्नमीदृशम् ।
क्व विप्रजीवः स्वगृहे क्वेमे वयमिह स्थिताः ॥ ७ ॥
तादृग्लोकान्तरं सा भूस्ते शैलास्ता दिशो दश ।
कथं भान्ति गृहस्यान्तर्मद्भर्ता येष्ववस्थितः ॥ ८ ॥
मत्त ऐरावतो बद्धः सर्षपस्येव कोटरे।
मशकेन कृतं युद्धं सिंहौघैरणुकोटरे ॥ ९॥
पद्माक्षे स्थापितो मेरुर्निगीर्णो भृङ्गसूनुना ।
स्वप्नाब्दगर्जितं श्रुत्वा चित्रं नृत्यन्ति बर्हिणः ॥ १० ॥
असमंजसमेवैतद्यथा सर्वेश्वरेश्वरि।
तथा गृहान्तः पृथिवी शैलाश्चेत्यसमञ्जसम् ॥ ११ ॥
यथावदेतद्देवेशि कथयामलया धिया ।
प्रसादानुगृहीते हि नोद्विजन्ते महौजसः ॥ १२ ॥

३.२०.१  
देवी सरस्वती बोलीं − हे सुंदरी! तुम्हारा पति पहले ब्राह्मण था, अब राजा बन गया है। जो सावरुंधती नाम की ब्राह्मणी थी, वही अब तुम हो।

३.२०.२  
तुम दोनों इस राज्य में एक-दूसरे के साथ सुखी दंपति बनकर राज कर रहे हो, जैसे पृथ्वी पर नया चक्रवाक जोड़ा या जैसे शिव-पार्वती।

३.२०.३  
मैंने तुम्हें तुम्हारा सारा पुराना जन्म-क्रम बता दिया। यह जीव कुछ नहीं, केवल चेतना का आकाश है जिस पर भ्रम की परत चढ़ी हुई है।

३.२०.४  
चेतना के आकाश में भ्रम के कारण यह संसार प्रतिबिंबित हो रहा है। उसे असत्य कहो या सत्य, तुम दोनों के लिए यह बार-बार जन्म-मृत्यु देने वाला ही है।

३.२०.५  
इसलिए भ्रान्ति से बना यह सर्ग कौन वास्तविक कह सकता है और भ्रान्ति छोड़ने पर कौन कह सकता है कि कुछ बचा है? निरर्थक ज्ञान के सिवा और कुछ फैलता ही नहीं।

३.२०.६  
महर्षि वसिष्ठ बोले − ये बातें बहुत देर तक सुनकर लीला के नेत्र आश्चर्य से खिल उठे और उसने लीलामय, मनोहर वचन कहे।

३.२०.७  
लीला बोली − हे देवि! तुम्हारी बात झूठी कैसे हो सकती है, पर यह कैसे संभव हुआ? वह ब्राह्मण अपने छोटे से घर में कहाँ और हम यहाँ कहाँ खड़े हैं?

३.२०.८  
वह दूसरी पृथ्वी, वे पर्वत, दसों दिशाएँ मेरे पति के जिस घर के भीतर हैं, वे यहाँ कैसे दिखाई दे रही हैं?

३.२०.९  
जैसे सरसों के दाने में ऐरावत हाथी बाँध दिया जाए या मच्छर ने परमाणु में सिंहों की सेना से युद्ध किया हो!

३.२०.१०  
कमल की पंखुड़ी में मेरु पर्वत रख दिया जाए या कीड़े ने उसे निगल लिया हो, या स्वप्न के बादल गरजे और मोर नाचने लगें!

३.२०.११  
हे सर्वेश्वरी! यह सब सर्वथा असंभव और तर्क-विरुद्ध है − ठीक वैसे ही जैसे एक छोटे से घर में पूरी पृथ्वी और पर्वत समा जाएँ।

३.२०.१२  
हे देवेशि! इसे अपनी निर्मल बुद्धि से ठीक-ठीक समझाओ, क्योंकि तुम्हारी कृपा प्राप्त महापुरुष कभी विचलित नहीं होते।

शिक्षा का विस्तृत सारांश:
देवी लीला को बता रही हैं कि उसका पति पहले एक साधारण ब्राह्मण था और वह स्वयं अरुंधती थी; अब वही चेतना राजा-रानी के रूप में प्रकट हुई है। इससे शिक्षा मिलती है कि सभी स्थितियाँ और पहचानें अस्थायी हैं, एक ही चेतना विभिन्न रूप धारण करती रहती है।

यह सारा दिखने वाला विशाल विश्व − राज्य, पर्वत, आकाश − केवल चैतन्य आकाश में भ्रम का प्रतिबिंब मात्र है। उसे सत्य मानो या असत्य, जब तक भ्रम है तब तक जन्म-मृत्यु का चक्कर चलता रहता है।

लीला हँसते हुए असंभव उदाहरण देती है − सरसों में हाथी, परमाणु में सिंह-युद्ध, स्वप्न में मोर नृत्य − ताकि दिखा सके कि साधारण बुद्धि से यह बात नामुमकिन लगती है कि छोटे से कमरे में सारे लोक समा जाएँ। यही योगवाशिष्ठ की गहरी शिक्षा है कि चेतना असीम है, उसमें कुछ भी असंभव नहीं।

सृष्टि केवल “भ्रान्तिमय” है − भ्रम से बनी हुई। भ्रम के अलावा और कुछ वास्तव में उत्पन्न नहीं होता। जब यह ज्ञान गुरु या देवी की कृपा से स्पष्ट हो जाता है, तब बड़े-से-बड़ा आश्चर्य भी मन को डिगा नहीं पाता।

अंत में लीला विनम्रता से स्पष्ट व्याख्या माँगती है। यह दर्शाता है कि सच्चा शिष्य असंभव लगने पर भी शिक्षा को अस्वीकार नहीं करता, बल्कि श्रद्धा और समर्पण के साथ और गहराई माँगता है − तभी मुक्ति का द्वार खुलता है।

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